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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

६/८-१२ ] महाविष्णु मायाकी इन दो वृत्तियोंमें दो रूपोंसे विराजमान हैं। महाविष्णु एक स्वरूपसे प्रकृतिमें स्थित होकर जगत्के निमित्त कारण हैं, वही विष्णुरूप है। दूसरे स्वरूपसे वे प्रधानमें स्थित होकर रुद्ररूपमें 'श्रीअद्वैत' हैं। इसलिये उन पुरुषसे श्रीअद्वैतका कुछ भी भेद नहीं है, केवल शरीरका भेद है॥१०॥ जगत्-उपादान प्रधानके अधिष्ठातृदेवता :- सहाय करेन ताँर लइया 'प्रधान'। कोटि ब्रह्माण्ड करेन इच्छाय निर्माण॥११॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य प्रधानको लेकर सृष्टिकार्यमें महाविष्णुकी सहायता करते हैं। वे अपनी इच्छासे उपादान रूपमें 'प्रधान'के द्वारा कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचनामें सहायता करते हैं॥११॥ मङ्गलमय श्रीअद्वैत :- जगत्-मङ्गल अद्वैत, मङ्गल-गुणधाम। मङ्गल-चरित्र सदा, 'मङ्गल' याँर नाम॥१२॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य जगत्के मङ्गलस्वरूप हैं, क्योंकि वे सभी मङ्गलमय गुणोंके आधार हैं। उनका चरित्र अथवा लीला भी सदा सबके लिये मङ्गलमय है और उनका नाम भी 'मङ्गल' है अथवा उनका नाम ग्रहण करनेसे जीवका सब प्रकारसे मङ्गल होता है॥१२॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्य महाविष्णु हैं और वे आचार्य हैं। विष्णुके सभी कार्य मङ्गलमय होते हैं। उनकी लीलाएँ मङ्गलमय हैं और उनमें माङ्गल्यका दर्शन करनेपर जीवका मङ्गल होता है। वे सभी मङ्गलके मूल हैं। उनका सेवोनमुख आचरण जगत्में सबके मङ्गलका विधान करता है। कुछ लोग कहते हैं कि श्रीअद्वैत प्रभुका दूसरा नाम 'मङ्गल' था। जगत्के जञ्जालमें फंसे लोग इस शुद्ध, नित्य, पूर्ण और मुक्त (सेवारूप) मङ्गलको ना समझकर आत्मवृत्ति 'भक्ति' से दूर हो जाते हैं। चिन्मयगुणशाली श्रीअद्वैताचार्यने कभी भी सकाम कर्मानुष्ठान अथवा निर्विशेष-मुक्तिलाभादि अमङ्गलका उपदेश नहीं किया। उनको अद्वय-विष्णुतत्त्व ना समझकर, भक्तिहीन और केवलाद्वैतवादि-ज्ञानसे जिन सभी मायामोहित असुरस्वभाव जीवोंने उनके अनुगमन करनेका दिखावामात्र किया था, अपनी मायाके द्वारा उनके स्वार्थ-पोषणरूपी छलके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यने उन अभक्तोंको जो दण्ड विधान किया, वह भी उनका मङ्गलाचरण ही था। विष्णुवस्तु अन्वय और व्यतिरेकभाव (अर्थात् पक्षपात और दण्ड), दोनोंके द्वारा जीवोंके मङ्गलका ही विधान करते हैं। अमङ्गलको मङ्गलके रूपमें प्रतिष्ठित करके विष्णुमायाके उपादानके मूल श्रीअद्वैताचार्यको नहीं जाना जा सकता। वे नैमित्तिक अवताररूपमें प्रकृतिमें उपादान-शक्तिका सञ्चार करते हैं। वे कोई अमङ्गलमय प्राकृत वस्तु नहीं हैं और वे अमङ्गलमय प्राकृत गुणोंके आश्रय नहीं हैं। उनके चरित्रका अनुकरण करनेसे ही जीवोंके मङ्गलका उदय होता है। उनका नाम श्रवण और कीर्तन करनेसे जीवोंके सब अमङ्गल विनष्ट हो जाते हैं। विष्णु-वस्तुमें किसी प्रकार अकल्याणकारी, खण्डित, निर्विशेष-धर्मका आरोप नहीं करना चाहिये। उनकी जो छठा अध्याय ३३३

[ ६/१२-१५ वास्तविक सत्ता है, उस विषयमें अप्राकृत ज्ञान लाभ करनेपर ही जीवका परम मङ्गल होता है॥१२॥ असंख्य वैभव लेकर पुरुषके द्वारा सृष्टि :- कोटि अंश, कोटि शक्ति, कोटि अवतार। एत लञा सुजे पुरुष सकल संसार ॥१३॥ अनुवाद-आदिपुरुष महाविष्णु करोड़ों अंशों, करोड़ों शक्तियों और करोड़ों अवतारोंको लेकर इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं॥१३॥ मायाके दो रूप :- माया यैछे दुइ अंश—'निमित्त', 'उपादान'। 'माया'—निमित्त-हेतु, उपादान—'प्रधान' ॥ १४॥ दो मूर्तियोंसे कारणोदशायीके द्वारा सृष्टि :- पुरुष ईश्वर ऐछे द्विमूर्त्ति हइया। विश्व-सृष्टि करे 'निमित्त', 'उपादान' लञा ॥ १५॥ अनुवाद-मायाके जैसे दो अंश 'निमित्त' और 'उपादान' हैं, जिसमें गुणमयी माया 'निमित्त' है और 'प्रधान' उपादान। वैसे ही पुरुष अर्थात् महाविष्णु 'निमित्त' और ईश्वर अर्थात् श्रीअद्वैत 'उपादान'-दो रूप धारण करते हैं॥१४-१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार प्रकृतिमें 'निमित्त' और 'उपादान'-दो भाग होते हैं, उसी प्रकार पुरुष, 'महाविष्णु' रूपमें निमित्त और 'अद्वैत' रूपमें उपादान-ये दो मूर्तियाँ होकर विश्वकी सृष्टि करते हैं॥१५॥ अनुभाष्य-मध्य, २०/२७१ पयार द्रष्टव्य है। इस जगत्के मूलकारणके निर्णय करनेमें दो प्रकारकी विचार प्रणालियाँ दिखायी देती हैं। एक प्रकारका मत यह है—'सच्चिदानन्द-वस्तुसे गौणरूपमें इस जगत्की सृष्टि हुई है और मुख्यरूपमें परिकर-सहित गोलोक-वैकुण्ठादिका प्रकाश हुआ है।' दूसरा मत यह है-'असत्, अचित् और निरानन्द जगत्का मूल दुर्ज्ञेय, अव्यक्त और वस्तु-अभाव है।' प्रथम मत वेदोंके चरमफल वेदान्तमें व्यक्त है; और सांख्यादि स्मृतियोंने वस्तुवादके विरोधके उद्देश्यसे उसके विपरीत दूसरे मतको प्रकाश किया है। इस जगत्में अधिकांश ही अचित्की प्रतीति होती है। प्राणियोंमें जो चिदाभास-धर्म है, वह गुणमाया-रचित विश्वके साथ संलग्न है और उस प्रकार चेतनधर्म भी प्रकृतिके गुणोंसे उत्पन्न हुआ है-इस विचारसे उपादान-कारणके विषयमें कोई-कोई वेदान्त-मतके साथ भेद स्थापित करते हैं। सर्वकारण-कारण मूल वस्तु अर्थात् भगवान् ही शक्तिमान्-तत्त्व हैं और शक्ति भी शक्तिमान्में अवस्थित है। यह जगत् जिस प्रकारकी शक्तिसे प्रकट हुआ है, उससे भिन्न शक्तिसमूह भी उस बृहद्-पालक वस्तुमें नित्य अवस्थित है। जो लोग जगत्के विषयोंकी सेवामें आबद्ध हैं, वे जागतिक शक्तिकी उपलब्धि करके उसे ही केवल शक्तिमान् कहकर भगवान् मान लेते हैं। वे ऐसा अपसिद्धान्त करते हैं—एकमात्र शक्तिसे ही शक्तिमान्की उत्पत्ति होती है और खण्ड-शक्तिमान् वस्तुओंको प्राकृत ज्ञानसे अखण्ड-शक्तिमान् (भगवान्) मानकर उसे प्रकृतिसे ३३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ]

उत्पन्न हुआ कहते हैं। जागतिक इन्द्रियज्ञानसे जो सत्-असत् (कार्य-कारण) ज्ञेयरूपमें निर्दिष्ट हुआ है, उसीको 'मूल' मानकर विचार करनेपर यह कहा जा सकता है कि अचित्से ही चेतन वस्तु उत्पन्न होती है, किन्तु वास्तविक सत्य यह है कि सृष्टि करनेवाली शक्ति वास्तव-वस्तुमें ही अधिष्ठित है। जो वस्तु देश-काल-पात्रकी सृष्टि करती है, उस वस्तुको मूल-कारणरूपमें निर्देश ना करके बहु-विचित्रतावाली असंख्य वस्तुओंको पहले ग्रहण करके, तब उनमेंसे अपने अनुमानके अनुसार एककी ओर अग्रसर होनेकी पद्धतिको 'अधिरोह-वाद' कहते हैं। 'अवरोह-विचार'से वस्तु (भगवान्) ही सर्वकारण-कारण है और उनमें अनन्तशक्ति विद्यमान होनेके कारण वे सविशेष-तत्त्व हैं। उनका निर्विशेषत्व भी असंख्य सविशेष-विचारोंमेंसे एक है। अचित्-वस्तुकी धारणा लेकर उसके कार्यज्ञानसे उसके कारणका अनुसन्धान करनेपर मादकद्रव्यके सङ्गसे जनित बुद्धिके समान बुद्धि उत्पन्न होती है। 'जड़ प्रकृति ही जगत्का मूल कारण है'-ऐसी धारणा सत्य नहीं है। वास्तवमें यह जगत् अनन्तशक्तिमान् परमेश्वरकी ईक्षण-शक्तिसे ही अव्यक्त और अचित्-शक्तिकी परिणति है। प्रकृति सर्वशक्तिमान्से शक्ति प्राप्त करके जीवकी जड़ेन्द्रियोंके अनुभव योग्य काल-देशकी सीमाओंमें बद्ध जगत्की रचना करती है। बद्धजीवको भगवान्की अनुभूति उनकी जगत्-निर्माणकी शक्तिके द्वारा ही होती है-ऐसी विचार-भ्रान्ति भगवान्का उनकी शक्तियोंके साथ सम्बन्धको ना जाननेके कारण होती है। जब तक भगवद्विमुख जीवके हृदयमें सत्यका प्रकाश नहीं होता है, तब तक वह इस जगत्में विचरण करते हुए सत्यवस्तुको नहीं समझ पाता। श्रील बलदेव विद्याभूषण गोविन्दभाष्यमें (ब्रः सूः, द्वितीय अध्याय, द्वितीय पाद)— “सांख्याचार्यः कपिलस्तत्त्वानि सञ्चग्राह, - सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः। प्रकृतेर्महान्, महतोऽहङ्कारः, अहङ्कारात् पञ्चतन्मात्राणि, उभयमिन्द्रियं, स्थूलभूतानि, पुरुष इति पञ्चविंशतिर्गण इति। साम्येनावस्थितानि पुरुषसत्त्वादीनि प्रकृतिः। तानि च सुखदुःखमोहात्मकानि क्रमाद्बोध्यानि,—तत्कार्ये जगति सुखादिरूपत्वदर्शनात्। तथाहि तरुणी रत्या पत्युः सुखदेति सात्त्विकी भवति, मानेन दुःखदेति राजसी, विरहेण मोहदेति तामसी चेत्येवं सर्वे भावा द्रष्टव्याः। उभयमिन्द्रियमिति दश बाह्येन्द्रियाण्येकस्त्वरिन्द्रियं मन इत्येकादशेत्यर्थः। नित्या विभ्वी च प्रकृतिः। मूले मूलाभावादमूलं मूलम्। न परिच्छिन्नं सर्वोपादानम्। “सर्वत्र कार्यदर्शनात् विभुत्वम्” इति सूत्रेभ्यः। महदहङ्कार-पञ्चतन्मात्राणि सप्त प्रकृतिविकृतयः। अहमादेः प्रकृतयः, प्रधानादेस्तु विकृतय इति। एकादशेन्द्रियाणि पञ्चभूतानि चेति षोड़श विकृतय एव। पुरुषस्तु निष्परिणामत्वान्न कस्यापि प्रकृतिर्न च विकृतिरिति। सा खलु प्रकृतिर्नित्यविकारा स्वयमचेतनाऽप्यनेकचेतन-भोगापवर्ग-हेतुरत्यन्तातीन्द्रियापि तत्कार्येणानुमीयते। एकैव विषमगुणा सती परिणामशक्त्या महदादिविचित्ररचनं जगत् प्रसूते इति जगन्निमित्तोपादानभूता सेति। पुरुषस्तु निष्क्रियो निर्गुणो विभुचित् प्रतिकायं भिन्नः सङ्घातपरार्थानुमेयश्च सः। विकारक्रिययोर्विरहात् कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्विरहः। एवं स्थिते प्रकृति-पुरुषयोस्तत्त्वे सन्निधिमात्रात् तयोर्मिंथोधर्मविनिमयः—प्रकृतौ चैतन्यं पुरुषे तु कर्तृत्व-भोक्तृत्वयोरध्यासो भवति। इत्थमविवेकात् भोगः, विवेकात् तु अपवर्गः। प्रकृत्यौदासीन्यवपुरित्येवमादीनर्थान् सोपपत्तिकैः सूत्रैर्निबबन्ध। अस्यां प्रक्रियायां प्रत्यक्षानुमानागमान् प्रमाणानि मेने। त्रिविधं प्रमाणं, तत्सिद्धौ सर्वसिद्धेर्नाधिक्यसिद्धिरिति। तत्र प्रत्यक्षागमसिद्धेष्वर्थेषु नातीव विसंवादः। यत्तु “परिणामात्”, “समन्वयात्”, “शक्तितश्च” इत्यादि सूत्रैः प्रधानं जगत्कारणमनुमितं, तन्नििरस्यं भवति,—तेनैव सर्वतन्मत-निरासात्। तत्र प्रधानं जगन्निमित्तोपादानं भवेत् न वेति संशये, प्रधानमेव तथा जगतः सात्त्विकादिरूपत्वात् प्रधानस्यैव सत्त्वादिंरूपस्य तदुपादानत्वेनानुमानात्। घटादिकार्यस्योपादानं खलु तत्-सजातीयं मृदाद्येव दृष्टम्। फलति वृक्षश्चलति जलमितिवत् जड़स्यापि तस्य कर्तृत्वञ्च। तस्मात् प्रधानमेव जगदुपादानं जगत्कर्तृ चेत्येवं प्राप्ते, (ब्रः सूः द्वितीय अध्याय, द्वितीय पाद)—

छठा अध्याय | ३३५

[ ६/१४-१५ “रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्”॥ १॥ अनुमीयते जगद्धेतुतयेत्यनुमानं जडं प्रधानम्। तन्न जगदुपादानं, न च तन्निमित्तम्। कुतः?—रचनेति। विचित्रजगद्रचनायाश्चेतनानधिष्ठितेन जड़ेन तेनासिद्धेरित्यर्थः। न खलु चेतनानधिष्ठितैरिष्टकादिभिः प्रासादादिरचना सिद्धा लोके। च-शब्देनान्वयानुपपत्ति समुच्चिता। न हि बाह्य घटादयः सुखादिरूपतयान्विताः। सुखादीनामान्तरत्वात् घटादीनां सुखादिहेतुत्वात् तद्रूपत्वाप्रतीतेश्च॥ १॥ “प्रवृत्तेश्च”॥ २॥ जड़स्य चेतनाधिष्ठितत्वे सतीति शेषः। यस्मिन्नधिष्ठातरि सति जड़ं प्रवर्त्तते, तस्यैव सा प्रवृत्तिरिति निश्चितं रथसूतादौ। ईत्थञ्च फलतीत्यादिकं प्रत्युक्तम्। तत्रापि चेतनाधिष्ठितत्वात् तच्चान्तर्यामिब्राह्मणात्। एतत् परत्र स्फुटीभावि। चोऽवधारणे। अहं करोमीति चेतनस्यैव प्रवृत्तिदर्शनात् जड़स्य कर्तृत्वं नेति वा। ननु प्रकृति-पुरुषयोः सन्निधिमात्रेण मिथो धर्माध्यासात् जगद्-रचनोपपत्तिरिति चेदुच्यते, —अध्यासहेतुः सन्निधिः किं तयोः सद्भावः किंवा प्रकृतिपुरुषगतः कश्चिद्विकार इति? नाद्यः—मुक्तानामप्यध्यासप्रसङ्गात् अन्त्योऽपि न, -तावत् प्रकृति-गतो विकारः अध्यास-कार्यतयाभिमतस्य तस्याध्यासहेतुत्वायोगात्; न च पुरुषगतः, अस्वीकारात्॥ २॥ ननु पयो यथा दधिभावेन स्वतः परिणमते, यथा चाम्बु वारिदमुक्तमेकरसमपि तालचूतादिषु मधुराम्लादि- विचित्र-रसरूपेण, तथा प्रधानमपि पुरुषकर्मवैचित्र्यात् तनुभुवनादिरूपेणेति चेत् तत्राह, — “पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि”॥ ३॥ तयोः पयोऽम्बुनोरपि चेतनाधिष्ठितयोरेव प्रवृत्तिः, न तु स्वतः रथादिदृष्टान्तेन तथानुमानात्। तयोस्तदधिष्ठितत्वं चान्तर्यामिब्राह्मणात् सिद्धम्॥ ३॥ “व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात्”॥ ४॥ अप्यर्थे च-कारः। सृष्टेः प्राक् प्रधानव्यतिरेकेण हेत्वन्तरानवस्थितेरनपेक्षत्वान्न केवलस्य प्रधानस्य स्वपरिणामकर्त्तृत्वम्। प्रधानव्यतिरिक्तस्तत्प्रवर्त्तकस्तन्निवर्त्तको वा हेतुरादिसर्गात् पूर्वं नावतिष्ठते इति यत् स्वीकृतं, तस्यापि पुनरपेक्षणात्, —चैतन्यसन्निधेर्हेत्वन्तरस्याङ्गीकारादिति यावत्; तथा च केवलजड़ककर्तृत्ववादभङ्गः। किञ्च, व्यतिरिक्तहेत्वभावात् सन्निधिसत्त्वाच्च प्रलयेऽपि कार्योदयप्रसङ्गः। न च तदादृष्टोद्बोधाभावात् कार्याभावस्तदुद्बोधस्यापि तदैवापाद्यमानत्वात्॥ ४॥ ननु लतातृणपल्लवादि विनैव हेत्वन्तरं स्वभावादेव क्षीराकारेण परिणमते, तथा प्रधानमपि महदाद्याकारेणेति चेत्तत्राह— “अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत्”॥ ५॥ अवधृतौ च-शब्दः। नैतच्चतुरस्रम्। कुतः?— अन्यत्राभावात्। वलीबर्द्दादिभक्षिते तृणादिके क्षीराकारपरिणामाभावादित्यर्थः। यदि स्वभावादेव तृणादि क्षीरात्मना परिणमते, तर्हि चत्वरादिपतितेऽपि तथा स्यान्न चैवमस्त्यतो न स्वभावमात्रं हेतुः; किन्तु व्यक्तिविशेषसम्बन्धात् सर्वेशसङ्कल्प एव तथेति॥ ५॥ प्रधानस्य जाड्यात् स्वतःप्रवृत्तिर्न समस्तीत्यापादितम्। अथ त्वन्मुखोल्लासाय ताञ्चेदभ्युपगच्छामस्तथापि न किञ्चित्तवाभीष्टं सिद्ध्येदित्याह— “अभ्युपगमेष्वर्थाभावात्”॥ ६॥ चतुर्षु नेत्यनुवर्त्तते। पुरुषो मां भुक्त्वा मह्दोषाननुभूय मदौदसीन्यलक्षणं मोक्षं प्राप्स्यतीति तद्भोगापवर्गार्थं प्रधानप्रवृत्तिं मन्यते। प्रधानप्रवृत्ति परार्था, स्वतोऽप्यभोक्तृत्वादुष्ट्र मन्यते। अकर्त्तुरपि फलोपभोगोऽत्रादवदिति। सैषा प्रवृत्तिर्न युक्ता मन्तम्। कुतः?—तस्याः स्वीकारे फलाभावात्। पुरुषस्य प्रकृतिदर्शनरूपो भोगस्तदौदासीन्यरूपो मोक्षश्च प्रवृत्तेः फलम्। तत्र भोगस्तावन्न सम्भवति, प्रवृत्तेः प्राक् चैतन्यमात्रस्य निर्विकारस्याकर्त्तुः पुरुषस्य तद्दर्शनरूपविकारायोगात्। न चापवर्गः, प्रागपि प्रवृत्तेस्तस्य सिद्धत्वेन तद्वैयर्थ्यात्। सन्निधिमात्रस्य भोगहेतुत्वे तु मुक्तानामपि तदापत्तिः, तस्य नित्यत्वात्॥ ६॥ ३३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ] ननु यथा गतिशक्तिरहितस्य दृक्शक्तिसहितस्य पङ्गुपुरुषस्य सन्निधानाद् गतिशक्तिमान् दृक्शक्तिरहितोऽप्यन्धः प्रवर्त्तते, यथा चायस्कान्ताश्मनः सन्निधानाज्जड़मप्ययश्चलति, एवं चिन्मात्रस्य पुंसः सन्निधानादचेतनापि प्रकृतिस्तच्छायाया चेतनेव तदर्थे सर्गे प्रवर्त्ततेति चेत्तत्राह- “पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि” ॥ ७ ॥ तथापि तेनापि प्रकारेण जड़स्य स्वतः प्रवृत्त्तिर्न सिद्ध्यति। पङ्गोर्गतिवैकल्येऽपि वर्त्मदर्शन-तदुपदेशा- दयोऽन्धस्य दृक्शक्तिविरहेऽपि तदुपदेश-ग्रहादयो विशेषाः सन्ति। अयस्कान्तमणेश्चायःसामीप्यादयः। पुरुषस्य तु नित्यनिष्क्रियस्य निर्धर्म्मकस्य न कोऽपि विकारः। सन्निधिमात्रेण तस्मिन् स्वीकृते तस्य नित्यत्वान्नित्यं सर्गो मोक्षाभावश्च प्रसज्येत। किञ्च, पंग्वन्धावुभौ चेतनौ अयस्कान्तायसी च द्वे जड़े इति दृष्टान्तवैषम्यं विस्फुटम् ॥ ७ ॥ यत्तु गुणानामुत्कर्षापकर्षवशेऩाङ्गाभावाद्भिन्नसृष्टिरिति मन्यते, तन्नि॒रस्यति- “अङ्गित्त्वानुपपत्तेश्च” ॥ ८ ॥ सत्त्वादीनां साम्येनावस्थितिः प्रधानावस्था। तस्यां च निरपेक्षस्वरूपाणां तेषां कस्यचिदेकस्याङ्गित्त्वं नोपपद्यते, इतरयोस्तत्समत्वेन गुणीभावासम्भवात्। तथा च गुणानामङ्गाङ्गिभावासिद्धिः। न चेश्वरः कालो तत्कृत, अस्वीकारात्। यथाह कपिलः- ईश्वरासिद्धेः मुक्तबद्धयोरन्यतराभावात्र तत्सिद्धिरिति। दिक्कालाकाशादिभ्य इति च। न च पुरुषस्तत्कृत् तस्य तत्रौदासीन्यात्। तथाच गुणवैषम्यहेतुकः सर्गो नेति। किञ्चैवं हेत्वभावात् प्रतिसर्गेऽपि ते वैषम्यं भजेरन्। आदिसर्गे तु न भजेरन्निति ॥ ८ ॥ ननु कार्यानुरोधेन गुणा विचित्रस्वभावा भवन्तीत्यनुमेयम्, तेन नोक्तदोषावकाश इति चेत्तत्राह- “अन्यथानुमितौ च ज्ञ-शक्तिवियोगात्” ॥ ९॥ विचित्रशक्तिकतया गुणानामनुमानेऽपि न दोषात्रिस्तारः। कुतः ?-ज्ञेति। ज्ञातृत्वविरहादित्यर्थः। इदमहमेवञ्च सृजामीति विमर्शाभावादिति यावत्। ज्ञानशून्याज्जड़ात्र सृष्टिदृष्टिकादेर्निवर्त्तते चेतनाधिष्ठानादिति।” श्रील बलदेव विद्याभूषणके गोविन्द-भाष्यमें (ब्रः सूः, द्वितीय अध्याय, द्वितीय पाद)—सांख्याचार्य कपिलने इस प्रकार तत्त्वोंका संग्रह किया है। उनके मतमें-“सत्त्व, रजः और तमः, इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है। प्रकृतिसे महत्तत्त्व, उससे अहङ्कार, अहङ्कारसे पञ्चतन्मात्राएँ, उनसे ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ एवं पञ्चमहाभूत तथा पुरुष-ये कुल पच्चीस तत्त्व हैं। साम्यरूपमें अवस्थित सत्त्वादि तीन गुण ही प्रकृति हैं। इन तीन गुणोंको क्रमशः सुख-दुःख-मोहात्मक समझना चाहिये, क्योंकि प्रकृतिके द्वारा रचित जगत्में सुखादि भाव ही दिखायी देते हैं। उदाहरण स्वरूप-सुन्दर युवती रतिके द्वारा पतिके लिये सुखप्रद है-यहाँ सात्त्विक भावका प्रकाश है; वही युवती बादमें क्रोधादि प्रकाश करनेपर दुःखदायिनी होती है-यहाँ राजसिक भावका प्रकाश है, और यदि वह युवती पतिका त्याग कर दे, तो वह उसके मोहका कारण होती है-यहाँ तामसिक भावका प्रकाश है। 'उभय इन्द्रियाँ' अर्थात् दस बाह्येन्द्रियाँ और एक अन्तरेन्द्रिय मन, कुल ये ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। प्रकृति नित्य और विभुत्वशालिनी है। प्रारम्भमें मूलके (चेतनके) अभावयुक्त होनेके कारण मूल (प्रधान) अमूल अर्थात् कारणान्तर-रहित है। यह प्रधान व्यापक और सबका उपादान है-‘सर्वत्र कार्यदर्शनात् विभुत्वम्’ आदि सूत्रसे यह उपलब्धि होती है। महत्तत्त्व, अहङ्कारतत्त्व और पाँच तन्मात्राएँ-ये प्रकृतिके सात विकार हैं और अहङ्कारादिकी प्रकृति भी प्रधानका विकार है; ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत,-ये सोलह विकार हैं। पुरुषको परिणामहीन कहा गया है, इसलिये वह किसीकी भी प्रकृति और विकार भी नहीं है। यह प्रकृति ही नित्य छठा अध्याय | ३३७

[ ६/१४-१५ विकारको प्राप्त होती है और यह स्वयं अचेतन होकर भी अनेक चेतन जीवोंके भोगका और मोक्षका कारण है एवं प्रकृति इन्द्रियातीत होनेपर भी इसके कार्यसे इसके विषयमें अनुमान किया जा सकता है। प्रकृति स्वयं एक होनेपर भी तीन गुणोंमें असमानता होनेपर परिणामशक्तिके द्वारा महत्तत्त्वादि विचित्र रचनामय जगत्की सृष्टि करती है। इस प्रकार प्रकृति ही जगत्का निमित्त और उपादान रूपिणी है। पुरुष निष्क्रिय, निर्गुण है और प्रभु है। वह चित्-स्वरूप है, प्रत्येक देहमें वह भिन्न रूपसे अवस्थित है और प्रधानके सञ्चालनसे उसके विषयमें अनुमान लगाया जा सकता है तथा विकार और क्रियाके अभावमें वह कर्त्ता और भोक्ताके भावसे रहित है। प्रकृति और पुरुषका तत्त्व इस प्रकार है कि दोनोंके सान्निध्यमात्रसे परस्परके धर्मका विनिमय (आदान-प्रदान) होता है—प्रकृतिमें चैतन्यका और पुरुषमें कर्त्ता-भोक्ताके भावका आरोपण हो जाता है। इस प्रकार विवेकके अभावसे ही पुरुषके द्वारा भोग और विवेकसे ही उसका मोक्ष होता है। प्रकृतिके प्रति पुरुषके उदासीनतामय धर्मादि विषयसमूह सोपपत्तिक सूत्रोंके द्वारा निबद्ध किये गये हैं। इस प्रक्रियामें सांख्यकार, —'प्रत्यक्ष', 'अनुमान' और 'आगम', इन तीन प्रमाणोंको मानते हैं और इनके द्वारा जो सिद्ध होता है, वही प्रमाण है। (उपमानादि उन्हींके अन्तर्गत हैं, ये अतिरिक्त प्रमाण नहीं हैं।) 'प्रत्यक्षसिद्ध' और 'आगमसिद्ध' अर्थोंके विषयमें अधिक नहीं कहना है। परन्तु 'परिणामात्', 'समन्वयात्', 'शक्तितः' आदि सूत्रोंके द्वारा जो प्रधानको जगत्का कारण 'अनुमान' किया गया है, उसका खण्डन करना ही हमारा प्रयोजन है। क्योंकि उक्त मतके खण्डनसे सांख्यके सम्पूर्ण मतका ही खण्डन हो जायेगा। इस विषयमें यह संशय है कि 'प्रधान' जगत्का निमित्त और उपादान है अथवा नहीं। पूर्वपक्षने प्रधानका निमित्तत्व और उपादानत्व, दोनों ही स्वीकार किये हैं। पूर्वपक्षका कहना है कि उन्होंने जगत्के उपादानरूपसे ही सत्त्वादिरूप प्रधानका अनुमान किया है। उपादान-कार्यके सजातीय ही होता है, जैसे घड़ेके कार्यमें (निर्माणमें) उपादानरूपसे मिट्टी आदिको ही समजातीय देखा गया है। जड़ वृक्षसे फलकी उत्पत्ति और उसी प्रकार जलको चलते देखकर जड़ अथवा अचेतन प्रधानका भी जगत्कर्त्तृत्व स्थिर होता है। 'प्रधान ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है'—पूर्वपक्षके इस सिद्धान्तके खण्डनके लिये पहले सूत्रकी अवतारणा कर रहे हैं— (प्रथम सूत्र)—"प्रधान अचेतन है, इसलिये जड़-प्रधान जगत्का उपादान और निमित्त कारण नहीं है, क्योंकि इस जगत्की विचित्र रचना देखकर चेतनके आश्रयके बिना जड़-प्रधानके द्वारा परिदृश्यमान जगत्की रचना सिद्ध नहीं होती अथवा ऐसा अनुमान करना भी सङ्गत नहीं है। इस जगत्में चेतनके आश्रयके बिना ईंटों आदिके द्वारा कभी भी भवनका निर्माण सिद्ध नहीं होता है। सूत्रमें उक्त 'च'-शब्दके द्वारा अन्वयकी असङ्गति उचित है। बाह्य घटादि पदार्थसमूहका कभी भी सुखादि स्वरूपसे अन्वय नहीं हो सकता अर्थात् वे सुखादिका अनुभव नहीं कर सकते, क्योंकि सुखादि सभी विषय आन्तरिक धर्म हैं, इसलिये बाह्यवस्तुसे उसका अन्वय सम्भव नहीं है। विशेषतः घटादि पदार्थ उक्त सुखादिके कारण नहीं हैं और सुखादि रूपमें भी उनकी प्रतीति नहीं है॥"१॥ ३३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ]

(द्वितीय सूत्र)—“प्रवृत्ति देखकर भी प्रधानको जगत्का कारण मानना सङ्गत नहीं है। चेतनके द्वारा अधिष्ठित जड़में ही प्रवृत्ति दिखायी देती है। जिसका अधिष्ठान होनेपर ही जड़की प्रवृत्ति होती है, उसकी ही यह प्रवृत्ति है—यह निश्चित है। रथ और सारथी इसके उत्तम दृष्टान्त हैं। इसी प्रकार ‘वृक्षके द्वारा फलकी उत्पत्ति होती है’ आदि उदाहरणोंमें प्रधानका कारणता-सम्बन्धीय दृष्टान्त उक्त हुआ है। इस स्थानपर भी चेतनका आश्रय स्वीकृत हुआ है, क्योंकि अन्तर्यामी ब्राह्मणमें उसका उल्लेख हुआ है। इस भाष्यमें इसका बादमें विस्तारसे वर्णन होगा। सूत्रोक्त च-शब्द अवधारणमें है। ‘मैं करता हूँ’ इस दृष्टान्तमें भी चेतनकी ही प्रवृत्ति दिखायी देती है, इसलिये जड़का कर्त्तृत्व सङ्गत नहीं है। यदि कहें—प्रकृति और पुरुषकी परस्पर सन्निधिमात्रसे परस्परके धर्मके विनिमयके कारण ही जगत्की रचना हुई है? उत्तर—यह भी नहीं कह सकते। अच्छा, जो सन्निधि परस्परके धर्मके विनिमयका कारण है, वह सन्निधि क्या प्रकृति और पुरुष, दोनोंका ही सद्भाव है अथवा प्रकृति-पुरुषगत कोई विकार? उत्तर—वह दोनोंका सद्भाव तो नहीं ही है, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेसे सभी मुक्त-पुरुषोंके साथ भी प्रकृतिके धर्मका विनिमय मानना होगा। यह सन्निधि—प्रकृतिगत विकार भी नहीं है, क्योंकि विनिमयको ‘कार्यरूप’में स्वीकार करनेपर इस प्रकृतिगत विकारकी विनिमयके ‘कारणरूप’में होनेकी सम्भावना नहीं है (कार्य और कारण एक नहीं हो सकते)। इसी प्रकार, यह पुरुषगत विकार भी नहीं है, क्योंकि पुरुषगत विकार भी अस्वीकार्य है। इसलिये ‘प्रधान’ जगत्का कारण नहीं हो सकता॥ २॥ यदि कहें—दूध जिस प्रकार अपने आप दहीमें परिणत हो जाता है और एक ही मेघसे निकला जल जिस प्रकार एकरस होनेपर भी ताल और आमादि फलोंमें मीठे और खट्टे विभिन्न रसोंमें परिणत हो जाता है, उसी प्रकार एक ही प्रधान, पुरुषके कर्म-वैचित्र्यके अनुसार देह-जगदादिरूपमें परिणत होता है। इसके उत्तरमें कह रहे हैं— (तृतीय सूत्र)—दूध और जलादि अचेतन वस्तुओंकी भी चेतनके द्वारा अधिष्ठित होनेपर ही कार्यमें प्रवृत्ति होती है, अपनेसे ही प्रवृत्तन नहीं हो सकता; क्योंकि रथादि दृष्टान्तसे ऐसा ही अनुमान होता है। अन्तर्यामी ब्राह्मणसे इन दोनों (दूध और जल) जड़ वस्तुओंका चेतन-अधिष्ठतभाव सिद्ध होता है॥ ३॥ (चतुर्थ सूत्र)—प्रधानके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी अनुपस्थिति परित्यक्त होनेसे (अर्थात् अन्य कोई कारण भी उपस्थित हो सकता है) केवलमात्र प्रधानका ही कर्त्तृत्व असङ्गत हुआ है। ‘अपि’-शब्दका अर्थ च-कार अर्थात् समुच्चय है। सृष्टिके पूर्व प्रधानके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी अनुपस्थितिका त्याग हुआ है, ऐसा कहनेसे केवल प्रधानका ही अपने परिणामका कर्त्ता होना निरस्त हुआ है। प्रधानके अतिरिक्त उसका प्रवर्त्तक अथवा निवर्त्तक, अन्य कोई भी कारण ही आदि-सृष्टिसे पूर्व नहीं था,—इस प्रकारका मत उपेक्षित हुआ है; क्योंकि उस समय चेतनकी सन्निधिके कारणको ‘अन्य कारण’ के रूपमें स्वीकार किया गया है। इसलिये केवल जड़कर्त्तृत्ववादका खण्डन हुआ है। विशेषतः इस प्रकार पूर्वपक्षसे प्रलयमें

छठा अध्याय | ३३९

[ ६/१४-१५ भी कार्योत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है; क्योंकि प्रधानके अतिरिक्त अन्य कारणका अभाव और प्रधानकी सन्निधि रहनेके कारण सृष्टिकालकी भाँति प्रलयकालमें भी कार्य-उत्पत्तिका प्रसङ्ग है। अदृष्टके ज्ञानके अभावके कारण प्रलयकालमें कार्यका अभाव भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उस समय उस अदृष्टका ज्ञान भी आकर उपस्थित हो सकता है॥४॥ यदि कहें कि तृण-पल्लवादि जिस प्रकार गायादि (पशु) के द्वारा खाये जानेपर अपने-आप दूधके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रधान भी महत्तत्त्वादि रूपमें परिणत होता है, तो उसके उत्तरमें कह रहे हैं— (पञ्चम सूत्र)—इस उदाहरणके अतिरिक्त अन्यत्र ऐसा दूधके रूपमें परिवर्तन नहीं भी देखा जाता है, इसलिये प्रधानका भी तृणादिके समान स्वभावतः (स्वतः) परिणाम कहना सङ्गत नहीं है। यहाँ च-शब्दका प्रयोग निश्चयके रूपमें है, इस प्रकार पूर्वपक्ष असङ्गत है; क्योंकि अन्यत्र यह नहीं देखा जाता; जैसे बैलादिके द्वारा खाये जानेपर तृणादिका दूध-रूपमें परिणाम नहीं देखा जाता, वैसे यह परिवर्तन स्वाभाविक नहीं है। और भी यदि स्वभावतः ही तृणादि दूधमें परिवर्तित होते हैं, तो आङ्गनमें पड़े तृणादिका दूधमें परिवर्तन नहीं देखा जाता है। जब ऐसा दिखलायी नहीं देता, तब केवल स्वभावको ही परिणामका कारण नहीं कह सकते। ‘तृणादि विशेष प्राणियोंके सम्बन्धसे दूधमें परिवर्तित हो जायँ', ऐसा सर्वेश्वरका सङ्कल्प ही उसका कारण है॥५॥ जड़ होनेके कारण प्रधानका सम्पूर्णरूपसे स्वतः प्रवर्त्तन नहीं है, —यह सिद्ध हुआ है। यदि तुम्हारे सन्तोषके लिये उसे स्वीकार कर भी लें, तो भी उससे तुम्हारा कोई अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा। इसलिये आगे कह रहे हैं— (षष्ठम सूत्र)—प्रधानकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति स्वीकार करनेमें भी कोई सार्थकता नहीं है। चार सूत्रोंमें 'ना'-अर्थ ही पूर्व सूत्रोंके अनुरूप होगा। 'पुरुष मुझे भोगकर मेरे दोषोंको अनुभवकर मुझसे उदासीनता रूप मोक्ष लाभ करेंगे'—इस प्रकार भोग-मोक्षार्थक कहकर प्रधानकी प्रवृत्ति प्रतीत होती है। ऊँट जिस प्रकार केवल दूसरोंके लिये ही कुङ्कुमका भार ढोता है, स्वयं उसका भोग नहीं करता है, प्रधानकी भी प्रवृत्ति उस प्रकार केवल दूसरोंके लिये ही है। और पुरुष भी अकर्त्ता होकर भी भोक्ता प्रतीत होता है। अन्नका कर्त्ता अर्थात् उसको उत्पन्न करनेवाला ना होकर भी अन्न-भोक्ता जिस प्रकार अन्नका भोग करता है, पुरुषका भी उसी प्रकार फलका उपभोग होता है। पूर्वपक्षकी इस प्रधान-प्रवृत्तिको स्वीकार करना युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि इसे स्वीकार करनेपर भी कोई फल दिखायी नहीं देता। पुरुषका प्रकृतिका दर्शनरूप 'भोग' और प्रकृतिके प्रति उदासीनतारूप 'मोक्ष' ही प्रवृत्तिका फल है। प्रधानके द्वारा भोग सम्भव नहीं है, क्योंकि चिन्मात्र, निर्विकार और अकर्त्ता होकर भी पुरुषका प्रकृति-दर्शनरूप सङ्गसे विकारयोगके कारण वह पुरुषका ही भोग है, प्रधानका नहीं। प्रधानका अपवर्ग (मोक्ष) भी सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिकी उत्पत्तिसे पूर्व भी अपवर्ग सिद्ध रहनेपर उसकी व्यर्थता प्रकाशित हो रही है। सन्निधिमात्रको ही भोगका कारण कहनेपर, सन्निधिकी नित्यताके कारण मुक्त लोगोंके द्वारा भी भोग लक्षित होते हैं॥६॥ ३४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ] यदि कहें कि चलनेमें असमर्थ, परन्तु नेत्रोंवाले पङ्गु पुरुषके सङ्गमें अन्धा, परन्तु पैरोंवाला पुरुष भी चलनेके लिये प्रवृत्त होता है और जिस प्रकार चुम्बक-पत्थरके सङ्गमें जड़ लोहा भी चलता है, उस प्रकार चिन्मात्र-पुरुषके सङ्गमें प्रकृति अचेतन होकर भी उसकी छायाके प्रभावसे चेतन वस्तुके समान पुरुषके भोगके लिये सृष्टि आदिमें प्रवृत्त होती है, उसके उत्तरमें कह रहे हैं- (सप्तम सूत्र)—इस उदाहरणमें पुरुष चुम्बकके समान होनेपर भी जड़-प्रधानकी स्वतःप्रवृत्ति नहीं है। इस प्रकार होनेपर भी जड़वस्तुकी स्वतःप्रवृत्ति सिद्ध नहीं होती। पङ्गु व्यक्तिमें चलनेका सामर्थ्य नहीं होनेपर भी मार्ग-प्रदर्शन और निर्देश देनेकी योग्यता एवं अन्धे व्यक्तिमें देखनेका सामर्थ्य नहीं होनेपर भी पङ्गु व्यक्तिके द्वारा दिये निर्देशोंको ग्रहण करनेकी योग्यता विद्यमान है और लोहेका चुम्बकके निकट जाना भी सम्भव हुआ है। किन्तु नित्य निष्क्रिय, निर्धर्मक पुरुषमें कोई भी विकार नहीं होता। सन्निधिमात्रको ही विकार स्वीकार करनेपर, सन्निधिकी नित्यताके कारण नित्य सृष्टिका और मोक्षके अभावका प्रसङ्ग होगा। विशेषतः पङ्गु और अन्धा, दोनों ही चेतन हैं तथा चुम्बक और लोहा, दोनों ही जड़ हैं, इस कारण इन दो दृष्टान्तोंमें विषमता दिखायी देती है॥७॥ अब गुणोंके उत्कर्ष तथा अपकर्षवशतः अङ्ग-अङ्गीभावके कारण जो विश्वकी सृष्टि हुई है, ऐसे विचारका खण्डन कर रहे हैं- (आठवाँ सूत्र)—जब गुणोंका अङ्गत्व ही अप्रमाणित हो रहा है, तब इस प्रकारका पक्ष सङ्गत नहीं हो सकता। सत्त्वादि गुणोंकी साम्याभावसे अवस्थितिका नाम ही 'प्रधानावस्था' है। इस अवस्थामें गुणोंका निरपेक्षस्वरूप होनेके कारण एक गुण दूसरेका अङ्गी है, ऐसा प्रमाणित नहीं होता। क्योंकि तीन गुणोंसे एक को अङ्गी माननेसे, अन्य दो गुणोंकी उसके साथ समता होनेके कारण गुणि-भावकी असम्भावना है। गुणोंका परस्परमें अङ्ग-अङ्गीभाव कभी भी सिद्ध नहीं होता। ईश्वरको अथवा कालको भी उक्त अङ्ग-अङ्गीभावका कर्त्ता नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसे कोई भी स्वीकार नहीं करता। कपिलने ही कहा है—'मुक्त और बद्ध, इन दोनोंमेंसे एकके अभावके कारण अर्थात् प्रमाणके अभावके कारण ईश्वरसिद्धि नहीं होती।' दिशाएँ और काल आकाशादिसे ही उत्पन्न होते हैं,—पुरुष उनके कर्त्ता नहीं हैं, क्योंकि वे कर्तृत्व-विषयमें सम्पूर्ण उदासीन हैं। गुण-वैषम्य भी सृष्टिका कारण नहीं है, क्योंकि कारणके इस प्रकार अभाव होनेपर प्रति सृष्टिमें ही वे गुणसमूह विषमताको प्राप्त करनेपर भी आदिसृष्टिमें वैषम्य प्राप्त नहीं कर सकते॥८॥ यदि कहें कि कार्यके अनुरोधसे गुणोंमें यह विचित्र-स्वभाव है, इस प्रकार अनुमान करनेपर उसमें पूर्वोक्त दोषोंकी सम्भावना नहीं होगी, तो इसके उत्तरमें कह रहे हैं,- (नवम सूत्र)—इस प्रकारके अनुमानमें भी जड़की स्वतःप्रवृत्ति नहीं है अर्थात् गुणोंको उस प्रकार विचित्रशक्तियुक्त अनुमान करनेसे भी दोषका निस्तार नहीं होता है। क्योंकि गुण तो अचेतन हैं अर्थात् उनमें 'यह मैं हूँ और मैं इस प्रकार सृष्टि कर रहा हूँ', इस प्रकारके विचारका ही अभाव देखा जाता है। ज्ञानशून्य जड़पदार्थोंसे कभी भी सृष्टि सम्भव नहीं है। ईंट, लकड़ी आदि अचेतन वस्तुएँ जिस प्रकार चेतनके अधिष्ठानके बिना कार्य नहीं कर छठा अध्याय | ३४१

[ ६/१४-१५

सकतीं, उसी प्रकार अचेतन गुण भी चेतन-परमेश्वरकी शक्तिके अधिष्ठानके बिना कोई भी कार्य नहीं कर सकते। (द्वितीय अध्याय, प्रथम पाद) - “स्मृतिः खलु कर्मकाण्डोदितान्यग्निहोत्रादि-कर्माणि यथावत् स्वीकुर्वता 'ऋषिं प्रसूतं कपिलम्' इत्यादिश्रुताप्तभावेन परमर्षिणा कपिलेन मोक्षेप्सूना ज्ञानकाण्डार्थोपबृंहणाय प्रणीता। “अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थ”, “न दृष्टार्थात्सिद्धिनिर्वृत्तिदर्शनात्" इत्यादिभिस्तत्र ह्यचेतनं प्रधानमेव स्वतन्त्रं जगत्कारणामित्यादि निरूप्यते- “विमुक्तमोक्षर्थम्”, “स्वार्थं वा प्रधानस्य”, “अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य”, इत्यादिभिः। स च ब्रह्मकारणतापरिग्रहे निर्विषया स्यात्, कृतस्नायास्तत्त्वप्रतिपत्तिमार्तविषयत्वात्। अतः परमाप्तकपिलस्मृत्यविरोधेन वेदान्ता व्याख्येयाः। न चैवं मन्वादिस्मृतीनां निर्विषयता- तासां धर्मप्रतिपादनद्वारा कर्मकाण्डोपबृंहणे सति सविषयत्वादित्येवं, प्राप्ते, ब्रूते- “स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्” ॥ १ ॥ अवकाशस्याभावोऽनवकाशः निर्विषयतेत्यर्थः । समन्वयानानुराधेन वेदान्तेषु व्याख्यातेषु सांख्यस्मृतिनिर्विषयता-दोषापत्तिरतः श्रुतिविपरीतार्थया ते व्याख्येया इति चेन्न। कुतः ?- अन्येत्याद्येः। तथा सत्यन्यासां मन्वादिस्मृतीनां वेदान्तानुसारिणीनां ब्रह्मैर-कारणतापराणां निर्विषयता महान् दोष प्रसज्येत । तासु हि सर्वेश्वरो जगदुत्पत्त्यादिहेतुः प्रतिपाद्यते, न तु कापिलोक्तप्रकारान्तरत्वसङ्गतिः। तत्र श्रीमन्मनुः- “आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ततः स्वयम्भुर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥ योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः । सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एष स्वयमुद्बभौ ॥ सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्। तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः॥” इत्यादि। श्रीपराशरः - “विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगतत्तै्रव च स्थितम्। स्थितिसंयम-कर्त्तासौ जगतोऽस्य जगच्च सः॥ यथोर्णनाभिहृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्ततः। तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं जनार्द्दनः ॥” इत्यादि। एवमन्येऽपि। न चासां स्मृतीनां कर्मकाण्डार्थोपबृंहणेन सावकाशता, ब्रह्मज्ञानोदयर्थिं चित्तशुद्धिमृद्दिश्य धर्मान् विदधतीनां तासां ज्ञानकाण्डार्थोपबृंहण एव वृत्तेः। चित्तशोधकता चैषां दृश्यते- “तमेतं वेदानुवचनेन” इत्यादौ-श्रुतौ। यत्तु तेषां वृष्टिपूत्रस्वर्गादि-फलकत्वं क्वापि क्वापि वीक्ष्यतेऽनुभाव्यते च, तदपि शास्त्रविश्रम्भोत्पादनेन तत्रैव च विश्रान्तं, “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति" इत्यादेः, “नारायणपरावरवेदाः” इत्यादेश्च। न च सांख्यस्मृत्या वेदान्तार्थोपबृंहणं शक्यं कर्तुं, श्रुतिविरुद्धार्थ-प्रतिपादनात्। श्रुतिसंवादार्थस्पष्टीकरणं ह्युपबृंहणम्। न च तस्यामिदमस्ति। तस्मात्-श्रुतिविरुद्धा सांख्यस्मृतिः स्वकपोल-कल्पितानापेति न तद्व्यर्थतादोषाद् विभीमः । न चाप्तत्वव्यपाश्रयकल्पनया तत्स्मृतिपक्षपातो युक्तः, तत्त्वेन व्याख्यातानां बहूनां स्मृतिषु विभिन्नाथार्सु पक्षपाते सति वास्तवार्थानवस्थितिप्रसङ्गात्। स्मृत्योर्विप्रतिपत्तौ सत्यां श्रुतिव्यापाश्रयादन्यो निर्णयहेतुर्न भवेदतः श्रुत्यनुसारिण्येवादरणीयेति । स्मृतिबलेनाक्षेप्सून् स्मृतिबलेनैव निराकरिष्याम इत्यन्यस्मृत्यनवकाशात् दोषोपन्यासः। यत्तुः “ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्ने ज्ञानैर्विभर्त्ति" इति श्वेताश्वतरश्रुतेराप्तत्वं तस्येति, तन्न; तस्या अन्यपरत्वात्, श्रुत्यर्थ-वैपरीत्यवक्तृतया तदभावाच्च। मनोराप्तत्वं तु तैत्तिरीयाः पठन्ति- "यद्वै किञ्चन मनुरवदत्तद्भेषजम्” इति। श्रीपराशरो हि पुलस्त्यवशिष्ठप्रसादादेव देवतापरमार्थधियं प्रापेति स्मर्यते। वेदविरुद्धस्मृतिप्रवर्त्तकः कपिलो ह्यग्निवंशजो जीवविशेष एव मायया विमोहितः, न तु कर्द्दमोद्भूतो वासुदेवः। “कपिलो वासुदेवाख्यः सांख्यं तत्त्वं जगाद ह। ब्रह्मादिभ्यश्च देवेभ्यो भृग्वादिभ्यस्तथैव च ॥ तथैवासुरये सर्वं वेदार्थैरुपबृंहितम्। सर्ववेदविरुद्धञ्च कपिलोऽन्यो जगाद ह॥ सांख्यमासुरयेऽन्यस्मै कुतर्कपरिवृंहितम्' इति स्मरणात्। तस्माद्वेदविरुद्धतयानाप्तायाः सांख्यस्मृतेर्व्यर्थता न दोषः ॥ १ ॥ “इतरेषाञ्चानुपलब्धेः” ॥ २॥ इतरेषाञ्च सांख्यस्मृत्युक्तानामर्थानां वेदेऽनुपलम्भात्तस्याः नाप्तत्वम्। ते च विभवश्विन्मात्राः पुरुषास्तेषां बद्धमोक्षौ प्रकृतिरेव करोति। तौ पुनः प्राकृतादेव। सर्वेश्वरः पुरुषविशेषो नास्ति। कालस्तत्त्वं न भवति। प्राणादयः पञ्च करणवृत्तिरूपा भवन्तीत्येवमादयस्तस्यामेव द्रष्टव्याः ॥ २ ॥

३४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ] (मर्मानुवाद)—श्रुतिमें ‘कपिल’ नामक एक सिद्ध ऋषिका उल्लेख देखा जाता है। उन्होंने वेदोंमें कहे गये कर्मकाण्डोंको यथावत् स्वीकार किया है। इन्हीं कपिल ऋषिने ही ज्ञानकाण्डके विस्तारके लिये सांख्यस्मृतिकी रचना की थी। सांख्यस्मृतिके मतानुसार,—‘अथ त्रिविधदुःखात्यन्त-निवृत्तिरत्यन्त-पुरुषार्थः’ आदि सूत्रोंमें आध्यात्मिकादि तीन प्रकारके दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्तिको ही ‘अत्यन्त-पुरुषार्थ अथवा मोक्ष’ कहा है। इसमें अचेतन प्रधानको ही स्वतन्तरूपसे जगत्का कारण कहकर निरूपण किया गया है। केवल ब्रह्मको ही यदि जगत्का एकमात्र कारण कहा जाय, तो सांख्यस्मृति निर्विषय (विषयरहित) हो जायेगी, क्योंकि आदिसे अन्ततक सांख्यस्मृतिका एकमात्र प्रतिपाद्य विषय तत्त्व-संख्यामात्र ही है। इसलिये परमसिद्ध कपिल-ऋषिके मतोंका विरोध न करते हुए ही वेदान्त-समूहका व्याख्यान करना उचित है। इससे मनु आदिके द्वारा प्रचारित स्मृतियोंकी भी निर्विषयता नहीं होगी, क्योंकि धर्मके प्रतिपादनके द्वारा कर्मकाण्डकी वृद्धि होनेपर इन सभी स्मृतियोंकी सविषयता ही होगी। इसका खण्डन करनेके लिये (“स्मृत्यनवकाश-दोषप्रसङ्ग” आदि) प्रथमसूत्रकी अवतारणा कर रहे हैं— (प्रथम सूत्र)—अवकाशका अभाव ही अनवकाश है। ‘अनवकाश’ शब्दका अर्थ निर्विषयता है। समन्वयके अनुरोधसे वेदान्तकी व्याख्या होनेपर सांख्यस्मृतिपर निर्विषयताका दोष आता है। इसलिये यदि कहें, श्रुतिके विपरीत अर्थके द्वारा वेदान्तकी व्याख्या करना क्या उचित है? उत्तर—वह असम्भव है, क्योंकि इस प्रकार व्याख्या करनेपर, ब्रह्मको ही एकमात्र कारण माननेवाले वेदान्तानुगत मनु आदि स्मृतियोंपर निर्विषयतारूप महान् दोष आ जाता है। इन सभी स्मृतियोंमें सर्वेश्वरको ही जगत्की उत्पत्ति आदिका कारण कहकर प्रतिपादन किया गया है। परन्तु कपिलमुनिने जिस प्रकार तत्त्वोंका वर्णन किया है, उस प्रकारसे इन सब स्मृतियोंमें नहीं कहा गया है। श्रीम call—श्रीम call? श्रीम call? नहीं, श्रीमनुने कहा है—“सृष्टिसे पहले सभी तमोमय, अज्ञात, अलक्षित, अतर्क्य, अविज्ञेय और सुप्तकी भाँति अवस्थित थे। उसके बाद स्वयंभू भगवान्ने स्वयं अव्यक्त होकर भी इस संसारको व्यक्त करनेके लिये महाभूतादि शक्तिसे समन्वित होकर प्रादुर्भूत होकर पूर्वोक्त तमोरशिको दूर किया। वे अतीन्द्रिय, अग्राह्य, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सर्वभूतमय और अचिन्त्यस्वरूप हैं। उन्होंने स्वयं प्रादुर्भूत होकर मन-ही-मन अपने शरीरसे विभिन्न प्रकारकी प्रजाकी सृष्टिकी अभिलाषा की और सर्वप्रथम जलकी सृष्टि की। तत्पश्चात् परमेश्वरने इस जलमें वीर्यको स्थापित किया। इस वीर्यसे सहस्र सूर्योंकी भाँति प्रभायुक्त सुवर्णमय अण्डा उत्पन्न हुआ। इस अण्डेमें ही सर्वलोक-पितामह स्वयं ब्रह्मा उत्पन्न हुए।” पराशर ऋषिने भी कहा है—“परिदृश्यमान जगत् भगवान् विष्णुसे ही उत्पन्न हुआ है और उनके आश्रयमें ही अवस्थित है। वे ही इसके पालनकर्त्ता और संहारकर्त्ता हैं, यह जगत् उनकी ही शक्तिविशेष है। मकड़ी जिस प्रकार अपने मुखसे जाल निकालकर उसके सहारे विहार करके बादमें स्वयं ही उसको मुखमें ग्रास करती है, उसी प्रकार भगवान् विष्णु भी अपनी शक्तिसे जगत्-प्रपञ्चकी सृष्टि करके बादमें पुनः उसे अपनी शक्तिमें ही विलीन कर देते हैं।” अन्य-अन्य ऋषिगण भी इस प्रकार कहते हैं। छठा अध्याय | ३४३

[ ६/१४-१५ कर्मकाण्डके विस्तारके द्वारा ही सांख्यस्मृतियोंकी सविषयता सिद्ध होगी, इस प्रकार भी नहीं कह सकते, क्योंकि कर्मकाण्डादि ब्रह्मज्ञानोदयके लिये चित्तशुद्धिके उद्देश्यसे धर्मविधानमें प्रवृत्त हैं। इसलिये इन स्मृतिशास्त्रोंकी प्रवृत्ति ज्ञानकाण्डके विस्तारके निमित्त ही कही जायेगी। इन सभी धर्मोंमें चित्तशोधकता भी दिखाई देती है—'तमेतं वेदानुवचनेन' आदि श्रुतिवाक्य ही इसका प्रमाण हैं। 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' एवं 'नारायणपरा वेदाः' आदि श्रुतियोंने भी इस प्रकारका अभिप्राय ही व्यक्त किया है। इस प्रकारसे सांख्यस्मृतिकी ज्ञानकाण्डके विस्तारके निमित्त ही प्रवृत्ति है, ऐसा अनुमान करनेपर भी उसके द्वारा वेदान्तके अर्थके विस्तारको स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सांख्यस्मृतियोंमें श्रुति-विरुद्धार्थ ही प्रतिपादित हुआ है। श्रुति-संवादसमूहके अर्थोंका स्पष्टीकरण ही उनका विस्तार है। किन्तु सांख्यस्मृतियोंमें श्रुति-संवादके अर्थोंका स्पष्टीकरण दिखाई नहीं देता, इसलिये उसको श्रुतिविरुद्ध ही कहा जायेगा। जो श्रुतिविरुद्ध है, वह स्वकपोलकल्पित (मनघड़न्त) होनेके कारण अप्रमाणिक है। इसलिये इस अप्रमाणिक सांख्यस्मृतिका व्यर्थता-दोष अपरिहार्य (अनिवार्य) हो जाता है। किसी एक स्मृतिको अप्रमाणित करनेके लिये अन्य स्मृतियोंका पक्षपात उचित नहीं है। क्योंकि विभिन्न अर्थ बतलानेवाली स्मृतियोंके प्रति पक्षपाती होनेपर, विभिन्न प्रकारसे व्याख्याकारी (गौतमादि) अनेक व्यक्तियोंके बहुत सारे मत-दर्शनसे उनके वास्तव अर्थका निर्णय नहीं हो सकता है। दो स्मृतियोंका परस्पर विरोध उपस्थित होनेपर, श्रुतिके अतिरिक्त अन्य किसी निर्णायक प्रमाणका आश्रय ग्रहण करना असम्भव है। जिसका आश्रय ग्रहण किया जाय, वह अवश्य ही श्रुति-अनुगत होना चाहिये। श्रुतिके अनुसार ना होनेपर, वह आदरणीय नहीं हो सकता। जो लोग स्मृतिके बलपर ही निन्दा करते हैं, उनका उसी स्मृतिके द्वारा ही निराकरण करना होगा, उससे दूसरी स्मृतियोंका निर्विषयतारूप दोषका उल्लेख अवश्यम्भावी है। श्वेताश्वतर उपनिषदमें 'ऋषिं प्रसूतं कपिलम्' आदि वाक्योंमें निश्चय ही एक सिद्ध कपिल ऋषिका उल्लेख हुआ है, किन्तु वे कपिल ये सांख्यकार कपिल नहीं हैं, वे अन्य कपिल ऋषि हैं। इसलिये इन सांख्यकार-कपिलको 'अप्रमाणिक' कहना श्रुतिका भी असम्मान नहीं है। मनु और पराशरकी सिद्धि श्रुति-स्मृति प्रसिद्ध है। वेदविरुद्ध सांख्यस्मृतिके प्रवर्त्तक कपिल और कर्दम ऋषिके पुत्र भगवान् कपिल—एक नहीं हैं। सांख्यकार कपिल अग्निवंशमें उत्पन्न मायामोहित जीव हैं और कर्द्दमनन्दन कपिल वासुदेवके ही अवतार हैं। पद्मपुराणमें कहा गया है कि 'भगवान् वासुदेव कर्द्दम-ऋषिसे कपिलके रूपमें अवतीर्ण होकर ब्रह्मादि देवताओंको, भृगु आदि ऋषियोंको और आसुरि नामक ब्राह्मणको सांख्यतत्त्वका उपदेश करते हैं; उनके द्वारा कही गई सांख्यस्मृतिकी वेदार्थके द्वारा पुष्टि होती है। अन्य एक कपिलने भी इन्हीं आसुरिको ही कुतर्कपूर्ण स्वकपोलकल्पित एक सांख्यका उपदेश किया था।' इसलिये वेदविरुद्ध दूसरे कपिल द्वारा रचित अप्रमाणिक सांख्यस्मृतिको व्यर्थ कहनेमें कोई भी दोष नहीं है। (द्वितीय सूत्र)—विशेषतः उक्त सांख्यस्मृतियोंमें इस प्रकार कुछ विषयोंका वर्णन हुआ है, जो वेदोंमें प्राप्त नहीं होता है। इसी कारणसे भी उक्त सांख्यस्मृतिको 'अप्रमाणिक' कहा जा सकता है। ये विषय इस प्रकार हैं—'पुरुष अर्थात् जीवात्माएँ चिन्मात्र और विभु हैं, प्रकृति ३४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-२१ ]

ही इनको बन्धन और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। 'बन्धन' और 'मोक्ष', दोनों ही प्राकृत हैं। 'सर्वेश्वर' नामक कोई एक पुरुष नहीं है। 'काल' तत्त्व ही नहीं है, प्राणादि पाँच प्रकार इन्द्रियोंकी ही वृत्ति हैं।” आदि कुछ वेदान्तविरुद्ध विषय इस सांख्यस्मृतिमें दिखलायी देते हैं॥ १५॥ स्वयं-निमित्त और श्रीअद्वैतप्रभु-'उपादान'-कारण :- आपने पुरुष-विश्वेर 'निमित्त'-कारण। अद्वैत-रूपे 'उपादान' हन नारायण॥ १६॥ ईक्षणकर्त्तारूपमें निमित्त और श्रीअद्वैतप्रभुरूपमें उपादानरूपी स्रष्टा :- 'निमित्तांश' करे तँहो मायाते ईक्षण। 'उपादान' अद्वैत करेन ब्रह्माण्ड-सृजन ॥ १७॥ सांख्य-मत-खण्डन :- यद्यपि सांख्य माने, 'प्रधान'-कारण। जड़ हइते कभु नहे जगत्-सृजन ॥ १८॥ भगवान्‌की शक्तिसे ही प्रकृति क्रियाशील :- निज सृष्टिशक्ति प्रभु सञ्चारि' प्रधाने। ईश्वरेर शक्त्ये तबे हये त' निर्माणे ॥ १९॥ अनुवाद-कारणोदशायी नारायण जगत्‌के 'निमित्त' कारण होकर 'निमित्तांश' रूपमें मायापर दृष्टिपात करते हैं और वे श्रीअद्वैतरूपमें 'उपादान' कारण होकर 'उपादानांश' रूपमें ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं। यद्यपि सांख्यवादी लोग 'प्रधान' को जगत्का कारण कहते हैं, तथापि जड़ वस्तु प्रधानसे कभी भी जगत्‌की सृष्टि सम्भव नहीं है। भगवान् विष्णु अपनी सृजन करनेकी शक्ति प्रधानमें सञ्चारित करते हैं और तब वह उस ईश्वरकी शक्तिसे जगत्‌की सृष्टि करनेमें समर्थ होता है॥ १६-१९॥ अनुभाष्य-आदिलीला ५/५८-६६ संख्या; मध्यलीला २०/२५९-२६१, २७१, २७६ संख्या द्रष्टव्य हैं॥ १८-१९॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी दो मूर्तियाँ :- अद्वैत-आचार्य-कोटिब्रह्माण्डर कर्त्ता। आर एक एक मूर्त्ये ब्रह्माण्डर भर्त्ता॥ २०॥ भगवान्‌के अङ्ग अथवा अंशस्वरूप श्रीअद्वैतप्रभु :- सेइ नारायणेर मुख्य अङ्ग,-अद्वैत। 'अङ्ग'-शब्दे अंश करि' कहे भागवत ॥ २१॥ अनुवाद-कारणोदशायी नारायण श्रीअद्वैताचार्य रूपसे करोड़ों ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं और उतने ही गर्भोदशायी विष्णुरूपोंमें अपना विस्तार करके एक-एक ब्रह्माण्डका पालन करते हैं। वे श्रीअद्वैताचार्य नारायणके मुख्य अङ्ग हैं। भागवतके अनुसार 'अङ्ग' शब्दका अर्थ 'अंश' होता है॥ २०-२१॥

छठा अध्याय | ३४५

[ ६/२०-२६ अनुभाष्य—आदिलीला ३/६७ द्रष्टव्य है॥२१॥ श्रीमद्भागवतम् (१०/१४/१४)— नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना- त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥२२॥ अनुवाद—[ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा]—हे अधीश! आप सभी लोकोंके साक्षी हैं। जब आप प्रत्येक जीवकी आत्मा अर्थात् अत्यन्त प्रिय वस्तु हैं, तब क्या आप मेरे पिता नारायण नहीं हैं? 'नरजात जल' अर्थात् नरसे जलकी सृष्टि हुई, इसलिये उसे नार कहा जाता है और उसमें जो अयन अर्थात् शयन करते हैं, वे नारायण हैं। वे आपके अङ्ग अर्थात् अंश हैं। आपके अंश स्वरूप कारणाब्धिशायी, क्षीरोदशायी और गर्भोदशायी कोई भी मायाके अधीन नहीं हैं। वे सब मायाधीश और मायासे अतीत परमसत्य वस्तु हैं॥२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥२२॥ अङ्ग या अंश होनेपर भी मायातीत :- ईश्वरेर 'अङ्ग', अंश—चिदानन्दमय। मायार सम्बन्ध नाहि, एड् श्लोके कय॥२३॥ 'अंश' ना कहकर 'अङ्ग' कहनेका तात्पर्य :- 'अंश' ना कहिया, केने कह ताँरे 'अङ्ग'। 'अंश' हैते 'अङ्ग', याते हय अन्तरङ्ग॥२४॥ अनुवाद—ईश्वरके अङ्ग अर्थात् अंश सभी चिदानन्दमय हैं और उनका मायासे कोई सम्बन्ध नहीं है—उपरोक्त श्लोकमें यह कहा गया है। श्रीअद्वैतको 'अंश' ना कहकर 'अङ्ग' क्यों कहा गया है? इसका कारण यह है कि 'अङ्ग' कहनेसे अधिक अन्तरङ्ग होना सूचित होता है॥२३-२४॥ अनुभाष्य—आदिलीला ३/६९-७० द्रष्टव्य हैं॥२३॥ 'अद्वैत' नामकी सार्थकता :- महाविष्णुर अंश—अद्वैत गुणधाम। ईश्वरे अभेद, तेञि 'अद्वैत' पूर्ण नाम॥२५॥ अनुवाद—महाविष्णुके अंश श्रीअद्वैत समस्त गुणोंके धाम हैं और वे उनसे अभिन्न हैं, इसीमें अद्वैत नामकी सार्थकता है॥२५॥ आचार्य-नामकी सार्थकता :- पूर्वे यैछे कैल सर्व-विश्वेर सृजन। अवतरि' कैल एबे भक्ति-प्रवर्त्तन॥२६॥ अनुवाद—सृष्टिके प्रारम्भमें जैसे उन्होंने समस्त जगत्की सृष्टि की थी, वैसे अब अर्थात् इस कलियुगमें अवतार लेकर उन्होंने जगत्को भक्ति-धर्ममें प्रवृत्त किया है॥२६॥ ३४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/२६-३२ ] अद्वैतावतारमें श्रीकृष्णभक्ति-प्रचार ही उनका कार्य :- जीव निस्तारिल कृष्णभक्ति करि' दान। गीता-भागवते कैल भक्तिर व्याख्यान ॥ २७ ॥ भक्ति-उपदेश बिनु ताँर नाहि कार्य। अतएव नाम हैल 'अद्वैत-आचार्य' ॥ २८ ॥ अनुवाद-उन्होंने श्रीकृष्णभक्ति प्रदानकर जीवोंका उद्धार किया और गीता-भागवतकी व्याख्यामें भक्ति-धर्मका ही प्रचार किया। उन्होंने केवल भक्तिका उपदेश और आचरण किया, इसलिये उनका नाम 'श्रीअद्वैत-आचार्य' है॥ २७-२८॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैतप्रभु सेव्य विष्णुत्तत्त्व होनेपर भी जीवोंके मङ्गलविधान-कार्यरूप सेवा-प्रवृत्ति दान करनेके अतिरिक्त उनका और कोई आचरण नहीं है। केवल सेव्यके रूपमें अपनी लीलाका प्रचार करनेसे जगत्के भोगी लोग उसका अनुकरणकर निरीश्वर केवलाद्वैतवादी या अहंग्रहोपासक हो जायेंगे,—यह देखकर भगवान् विष्णुके सेवकके रूपमें लीला प्रकटकर इस आचार्यत्वका प्रदर्शन करना भी एक कार्य है। आचार्यका कृष्णसेवोन्मुखतारूप आचरणके अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं है। सेव्यके सेवरूपमें आचरण ही आचार्यत्वका हेतु है—यही नैमित्तिक अवतारकी लीलाविशेष है। आचार्यके पवित्र पद और वेशको कलुषितकर जो दुराचारी व्यक्ति भगवत्सेवाको छोड़कर अपने इन्द्रियतर्पणके ताण्डव नृत्यका प्रदर्शन करते हैं, श्रीअद्वैताचार्य उनका सम्पूर्ण रूपसे तिरस्कार करते हैं॥ २६-२८॥ वैष्णवेर गुरु तेंहो जगतेर आर्य। दुइनाम-मिलने हैल 'अद्वैत-आचार्य' ॥ २९ ॥ अनुवाद-वे सभी वैष्णवोंके गुरु और जगद्वासियोंके पूजनीय हैं। दोनों नामोंके मिलनेसे उनका नाम श्रीअद्वैत-आचार्य है॥ २९॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्य वैष्णव-जगत्के गुरु और सभीके सम्मानीय हैं। उनके चरणकमलोंके आश्रयमें भगवद्भक्त वैष्णव उनके आचरणका अनुसरण करके हरिसेवा करते हैं॥ २९॥ 'कमलाक्ष'-नामकी सार्थकता :- कमलनयनेर तेंहो, याते 'अङ्ग', 'अंश'। 'कमलाक्ष' बलि' धरे नाम अवतंस ॥ ३० ॥ वैकुण्ठमें विष्णु और वैष्णवोंका सारूप्य :- ईश्वर-सारूप्य पाय पार्षदगण। चतुर्भुज, पीतवास, यैछे नारायण ॥ ३१ ॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी गुण-महिमा :- अद्वैत-आचार्य-ईश्वरेर अंशवर्य। ताँर तत्त्व-नाम-गुण, सकलि आश्चर्य ॥ ३२ ॥ अनुवाद-वे कमलनयन भगवान्के अङ्ग और अंश हैं, इसलिये उनका नाम 'कमलाक्ष' भी है। भगवान्के परिकर सारूप्य अर्थात् उन्हींकी भाँति रूप प्राप्त करते हैं। वैकुण्ठमें नारायणके छठा अध्याय | ३४७

[ ६/३०-३९ परिकर उनके समान ही चतुर्भुजरूप हैं और वे भी पीताम्बर धारण करते हैं। श्रीअद्वैताचार्य नारायणके श्रेष्ठ अंश हैं, इसलिये उनके तत्त्व-नाम-गुण सभी अद्भुत और अलौकिक हैं॥ ३०-३२॥ श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा महाप्रभुको अवतीर्ण कराना :- याँहार तुलसीदले, याँहार हुङ्कारे। स्वगण सहिते चैतन्येर अवतारे ॥ ३३॥ याँर द्वारा कैल प्रभु कीर्त्तन प्रचार। याँर द्वारा कैल प्रभु जगत् निस्तार ॥ ३४॥ आचार्य गोसाञिर गुण-महिमा अपार। जीवकीट कोथाय पाइबेक तार पार॥ ३५॥ अनुवाद- जिन्होंने गङ्गाजल और तुलसीदल अर्पणकर श्रीकृष्णकी आराधना की और अवतरणके लिये सप्रेम-हुङ्कारसे श्रीकृष्णका आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण श्रीचैतन्यरूपमें अपने परिकरों सहित अवतरित हुए तथा जिनके द्वारा महाप्रभुने सङ्कीर्त्तनका प्रचार करवाया और जगत्का उद्धार किया, उन श्रीअद्वैताचार्यकी गुण-महिमा अपार है। अतः क्षुद्र जीव उसे कैसे समझ सकता है ? ॥ ३३-३५॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/९१, ९५-१०८ संख्या द्रष्टव्य हैं॥ ३३-३४॥ श्रीगौरके एक अङ्ग-श्रीअद्वैत और दूसरे अङ्ग-श्रीनिताइ :- आचार्य गोसाञि चैतन्येर मुख्य अङ्ग। आर एक अङ्ग ताँर प्रभु नित्यानन्द ॥ ३६ ॥ उपाङ्गरूप अस्त्र-श्रीवासादि भक्त :- प्रभुर उपाङ्ग-श्रीवासादि भक्तगण। हस्तमुखनेत्र-अङ्ग चक्राद्यस्त्र-सम ॥ ३७॥ अङ्ग-उपाङ्गको लेकर श्रीगौरके द्वारा नाम-प्रेम-प्रचार :- ए़सब लइया चैतन्यप्रभुर विहार। ए़सब लइया करेन वाञ्छित प्रचार ॥ ३८ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक मुख्य अङ्ग श्रीअद्वैताचार्य हैं और दूसरे मुख्य अङ्ग श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। महाप्रभुके उपाङ्ग श्रीवासादि भक्त हैं। ये अङ्ग और उपाङ्ग उनके हाथ-मुख-नेत्रके समान मुख्य अङ्ग तथा चक्रादिके समान उनके अस्त्र हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने इन सबके साथ लीला की और इनको साथ लेकर नाम-सङ्कीर्त्तन तथा श्रीकृष्णप्रेमका प्रचार किया ॥ ३६-३८ ॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/७१-७४ संख्या द्रष्टव्य है॥ ३६-३८॥ लौकिक रीतिके अनुसार श्रीअद्वैतके प्रति महाप्रभुका गुरुतुल्य व्यवहार :- माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य, एइ ज्ञाने। आचार्य-गोसाञिरे प्रभु गुरु करि' माने ॥ ३९ ॥ ३४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/३९-४१ ] लौकिक-लीलाते धर्ममर्यादा-रक्षण। स्तुति-भक्त्ये करे ताँर चरण-वन्दन॥४०॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी महाप्रभुके प्रति प्रभु-बुद्धि— चैतन्यगोसाञिके आचार्य करे प्रभु-ज्ञान। आपनाके करेन ताँर 'दास'-अभिमान॥४१॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यको अपने परम गुरुदेव श्रील माधवेन्द्रपुरीका शिष्य जानकर महाप्रभु उनको अपने गुरुके रूपमें मानते हैं। लौकिक लीलाकी मर्यादाकी रक्षा करते हुए, वे उनकी भक्तिपूर्वक स्तुति और चरण-वन्दना करते हैं। किन्तु श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको अपना प्रभु (स्वामी) मानते हैं और स्वयंमें उनके दास होनेका अभिमान रखते हैं॥३९-४१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभु-श्रील माधवेन्द्रपुरीके शिष्य हैं और उनके गुरुभाई श्रीईश्वरपुरी महाप्रभुके गुरु हैं। इस सम्बन्धसे महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यको 'गुरु' मानते हैं। वास्तवमें श्रीचैतन्य गोसाईं सर्वेश्वर हैं और श्रीअद्वैतप्रभु उनके दास। इस सम्बन्धसे श्रीअद्वैताचार्य प्रभु अपनेमें 'दास' अभिमान करते हैं॥३९-४१॥ अनुभाष्य—श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीमध्वाचार्य-सम्प्रदायके एक गुरु हैं। श्रीईश्वरपुरी और श्रीअद्वैतप्रभु दोनों श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य हैं। श्रीमध्व-परम्पराके अन्तर्गत श्रीगौड़ीय-वैष्णव-शाखाका वर्णन 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका', 'प्रमेयरत्नावली' में और श्रीगोपालगुरु गोस्वामीके ग्रन्थमें हुआ है। श्रीभक्तिरत्नाकरमें भी इसका उल्लेख देखा जाता है। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकामें श्रीमध्वशाखाका इस प्रकारसे वर्णन है— “परव्योमेश्वरस्यासीच्छिष्यो ब्रह्मा जगत्पतिः। तस्य शिष्यो नारदोऽभूत् व्यासस्तस्याप शिष्यताम्॥ शुको व्यासस्य शिष्यत्वं प्राप्तो ज्ञानावरोधनात्। व्यासाल्लब्धकृष्णदीक्षो मध्वाचार्यो महायशाः॥ तस्य शिष्योऽभवत् पद्मनाभाचार्य-महाशयः। तस्य शिष्यो नरहरिस्तच्छिष्यो माधवद्विजः। अक्षोभ्यस्तस्य शिष्योऽभूत्तच्छिष्यो जयतीर्थकः। तस्य शिष्यो ज्ञानसिन्धुः तस्य शिष्यो महानिधिः। विद्यानिधिस्तस्य शिष्यो राजेन्द्रस्तस्य सेवकः। जयधर्म मुनिस्तस्य शिष्यो यद्गणमध्यतः॥ श्रीमद्विष्णुपुरी यस्तु भक्तिरत्नावलीकृतिः। जयधर्मस्य शिष्योऽभूद्ब्रह्मण्यः पुरुषोत्तमः॥ व्यासतीर्थस्तस्य शिष्यो यश्चक्रे विष्णुसंहिताम्। श्रीमान् लक्ष्मीपतिस्तस्य शिष्यो भक्तिरसाश्रयः॥ तस्य शिष्यो माध् वेन्द्रो यद्धर्मोऽयं प्रवर्त्तितः। तस्य शिष्योऽभवत् श्रीमानीश्वराख्यपुरी यतिः॥ कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः। अद्वैतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे॥ ईश्वराख्यपुरीं गौर उरीकृत्य गौरवे। जगदाप्लावयामास प्राकृताप्राकृतात्मकम्॥” अर्थात् परव्योमेश्वर श्रीनारायणके शिष्य जगत्पति ब्रह्मा, ब्रह्माके शिष्य नारद और नारदके शिष्य श्रीवेदव्यास हुए। (शुष्क) ज्ञानके अवरोधन (अर्थात् श्रीलवेदव्यासके शिष्योंके मुखसे भगवान्के नाम, रूप, गुण और लीला सम्बन्धी श्लोकोंको श्रवण करनेके उपरान्त पालन किये जा रहे शुष्क ज्ञानपथमें बाधा पड़ने अर्थात् उसके प्रति अरुचि उत्पन्न होने) के कारण शुकदेवने श्रीव्यासदेवका शिष्यत्व स्वीकार किया। महायशस्वी मध्वाचार्यने भी श्रीव्यासदेवसे कृष्णमन्त्रकी दीक्षा प्राप्त की। श्रीमध्वाचार्यके शिष्य महाशय पद्मनाभाचार्य, पद्मनाभके नरहरि, नरहरिके माधव-द्विज, माधवके प्रिय अक्षोभ्य, अक्षोभ्यके जयतीर्थ, जयतीर्थके ज्ञानसिन्धु, ज्ञानसिन्धुके महानिधि, महानिधिके विद्यानिधि, विद्यानिधिके राजेन्द्र, राजेन्द्रके शिष्य जयधर्म मुनि हैं। जयधर्मके अनुगत शिष्योंमें श्रीविष्णुपुरी एक प्रधान आचार्य हुए हैं और इन्होंने 'भक्ति-रत्नावली' छठा अध्याय | ३४९

[ ६/३९-४४ नामक ग्रन्थकी रचना भी की है। जयधर्मके (एक अन्य) शिष्य पुरुषोत्तम, पुरुषोत्तमके शिष्य ब्रह्मण्यतीर्थ, ब्रह्मण्यतीर्थके शिष्य वे व्यासतीर्थ हुए, जिन्होंने 'विष्णुसंहिता' की रचना की। व्यासतीर्थके शिष्य भक्तिरसके आश्रय लक्ष्मीपति, लक्ष्मीपतिके शिष्य वे श्रीमाधवेन्द्रपुरी हैं, जिनसे प्रेम-भक्तिरूप धर्मका प्रवर्तन हुआ है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य यति श्रीईश्वरपुरीने उस कल्पवृक्षके शृङ्गार फलस्वरूप होकर शृङ्गाररसको प्रकाशित किया। इन्हीं श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य श्रीअद्वैताचार्यने दास्य और सख्य नामक दो फलोंको प्रकाशित किया। श्रीगौरचन्द्रने ईश्वरपुरीको गौरवसहित (गुरुरूपमें) वरणकर प्राकृत और अप्राकृतमय जगत्को प्रेममें प्लावित कर दिया॥३९॥ कृष्णदास-अभिमानसे भक्तिका प्रचार :- सेइ अभिमान-सुखे आपना पासरे। 'कृष्णदास हओ'-जीवे उपदेश करे॥४२॥ अनुवाद-इस दास-अभिमानके आनन्दमें डूबकर श्रीअद्वैताचार्य स्वयंको भूल जाते हैं और जीवोंको श्रीकृष्णके दास बननेका उपदेश करते हैं॥४२॥ अनुभाष्य-भक्तभावको अङ्गीकारकर महाविष्णु अपने स्वरूप-अभिमानका परित्यागकर भगवत्-दास्यको ही अपना आनुष्ठानिक कार्य मानकर आनन्दका अनुभव करते हैं। इस सेवानन्दके द्वारा महाविष्णुका अपना स्वरूपज्ञान शिथिल हो जाता है अर्थात् उन्हें स्वयं भोक्ता होनेके ज्ञानकी विस्मृतिसी हो जाती है। वे स्वयं आचरण करके जीवोंको अनुक्षण श्रीकृष्णसेवा करनेकी प्रवृत्ति प्रदान करते हैं। संख्या २७-२८ द्रष्टव्य है॥४२॥ कृष्णदास्यमें वैकुण्ठ-आनन्द :- कृष्णदास-अभिमाने ये आनन्दसिन्धु। कोटी ब्रह्मसुख नहे तार एकबिन्दु॥४३॥ श्रीअद्वैतप्रभु एवं श्रीनित्यानन्द प्रभुका गौरदास्यमें ही सुख :- मुञि ये चैतन्यदास, आर नित्यानन्द। दास-भाव-सम नहे अन्यत्र आनन्द॥४४॥ अनुवाद-(श्रीअद्वैताचार्य कहते हैं)-श्रीकृष्णदास-अभिमानसे जिस आनन्दके समुद्रकी प्राप्ति होती है, करोड़ों ब्रह्मसुखकी तुलना उसके एक बिन्दुसे भी नहीं की जा सकती है। मैं और नित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके दास हैं। इस दास-भावके समान आनन्द और कहीं भी नहीं है॥४३-४४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'ब्रह्मसुख'-'मैं ब्रह्म हूँ', इस अभेद-बुद्धिमें जो सुख है॥४३॥ अनुभाष्य-आदिलीला ७/८५, ९७-९८ संख्या द्रष्टव्य हैं। भःरःसिः पूर्व-लहरीमें- “ब्रह्मानन्दो भवेदेष चेत् पराद्धर्गुणीकृत। नैति भक्तिसुखाम्भोघेः परमाणुतुलामपि॥” अर्थात् “यदि ब्रह्मानन्दको परार्द्ध (ब्रह्माजीकी आयुके आधेकालमें जितने दिन हैं, उतने) गुणा कर दिया जाय, तो वह आनन्द भगवत्सेवानन्द समुद्रके एक परमाणुके बराबर भी नहीं है।” ३५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/४३-४४ ] भावार्थदीपिकामें— “त्वत्कथामृत-पाथोधौ विहरन्तो महामुदः। कुर्वन्ति कृतिनः केचिच्चतुर्वर्गं तृणोपमम् ॥” अर्थात् “आपके कथामृतके समुद्रमें विचरण करनेवाले परमानन्दमें मग्न हुए भक्त धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, इन चार पुरुषार्थोंको तृणके समान समझते हैं।” “तत्रापि च विशेषेण गतिमण्वीमन्विच्छतः। भक्तिहृतमनःप्राणान् प्रेम्णा तान् कुरुते जनान्॥ श्रीकृष्णचरणाम्भोजसेवा-निर्वृतचेतसाम्। एषां मोक्षाय भक्तानां न कदाचित् स्पृहा भवेत्॥” अर्थात् “जीवोंमेंसे विशेष रूपसे जो सूक्ष्म गति अर्थात् मुक्ति नहीं चाहते, ऐसे भक्तोंके मन और प्राणको भक्ति प्रेमके द्वारा हरण कर लेती है। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके सेवासुखमें निमग्न-चित्त भक्तोंको कभी भी मुक्तिकी इच्छा नहीं होती।” पद्मपुराणमें कार्तिक-माहात्म्यमें— “वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा, न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह। इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं, सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः॥” अर्थात् “हे देव! आप सब प्रकारके वर देनेमें समर्थ हैं। तो भी मैं आपसे चतुर्थ पुरुषार्थरूप मोक्ष अथवा मोक्षकी चरम सीमा वैकुण्ठादि लोक भी नहीं चाहता हूँ। ना ही मैं श्रवण-कीर्तनादि नवधाभक्तिके द्वारा प्राप्त किये जानेवाला कोई दूसरा वरदान ही आपसे माँगता हूँ। हे नाथ! आपका यह बाल-गोपालरूप मेरे हृदयमें सदा विराजमान रहे। मुझे और दूसरे वरदानसे कोई प्रयोजन नहीं है।” तथा “कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्तैव यद्वत्, तया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च। तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ, न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह॥” अर्थात् “हे दामोदर ! जिस प्रकार आपने अपने दामोदर रूपसे माता यशोदाके द्वारा ओखलमें बँधे रहकर भी नलकूबेर और मणिग्रीव नामक कुबेरके पुत्रोंका नारदके शापसे प्राप्त वृक्ष योनिसे उद्धारकर उन्हें परम प्रयोजनरूप अपनी भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये, यही मेरा एकमात्र आग्रह है। किसी भी प्रकार अन्य प्रकारके मोक्षके लिये मेरा तनिक भी आग्रह नहीं है।” हयशीर्षमें श्रीनारायणव्यूह स्तवमें— “न धर्मं काममर्थं वा मोक्षं वा वरदेश्वर। प्रार्थये तब पादाब्जे दास्यमेवाभिकामये॥ पुनः पुनर्वरान् दित्सुर्विष्णुर्मुक्तिं न याचितः। भक्तिरेव वृता येन प्रह्लादं तं नमाम्यहम्॥ यदृच्छया लब्धमपि विष्णोर्दाशरथेस्तु यः। नैच्छन्मोक्षं बिना दास्यं तस्मै हनुमते नमः॥” अर्थात् “हे वरदेनेवालोंमें श्रेष्ठ! आप धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान कर सकते हैं, परन्तु मैं इन्हें नहीं चाहता हूँ। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंका दास बनकर सेवा करना चाहता छठा अध्याय | ३५१

[ ६/४३-४४ हूँ। भगवान् नृसिंहदेवके बार-बार देनेपर भी प्रह्लादने किसी भी वर को स्वीकार नहीं किया और केवल उनकी भक्तिकी ही कामना की, मैं उन प्रह्लादके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। इसी प्रकार श्रीहनुमानके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, जो श्रीरामचन्द्रके दास्यके बिना मोक्षकी भी कामना नहीं करते हैं।” श्रीहनुमद्वाक्यमें— “भवबन्धच्छिन्दे तस्मै स्पृहयामि न मुक्तये। भवान् प्रभुरहं दास इति यत्र विलुप्यते॥” अर्थात् “मैं ऐसी मुक्ति नहीं चाहता हूँ और ना ही ब्रह्ममें लीन होना चाहता हूँ, जहाँ प्रभु-दासभाव विलुप्त हो जाय।” श्रीनारदपञ्चरात्रमें जितन्त-स्तोत्रमें— “धर्मार्थ-काम-मोक्षेषु नेच्छा मम कदाचन। त्वत्पादपङ्कजस्याधो जीवितं दीयतां मम॥ मोक्ष-सालोक्य-सारूप्यान् प्रार्थये न धराधर। इच्छामि हि महाभाग कारुण्यं तव सुव्रत॥” अर्थात् “धर्म-अर्थ-काम-मोक्षकी मेरी कभी भी इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंका दासत्व ही चाहता हूँ। हे जगत्पते! मैं सालोक्य-सारूप्यादि मुक्तिकी भी प्रार्थना नहीं करता, मैं तो केवल आपकी कृपाकी अभिलाषा करता हूँ।” राजाकुलशेखर-कृत “मुकुन्दमाला” स्तोत्रमें— “नाहं वन्दे पदकमलयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्व-हेतोः, कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्। रम्या-रामा-मृदुतनुलता-नन्दने नाभिरन्तुं, भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम्॥” अर्थात् “हे भगवन्! मैं ना तो संसारके द्वन्द्वों अर्थात् जन्म-मरण, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःखसे और ना ही कुम्भीपाक नरकके भीषण कष्टोंसे निदान पानेके लिये आपके चरणकमलोंकी वन्दना कर रहा हूँ। ना ही मैं स्वर्गमें नन्दनवनमें वास करनेवाली कोमलाङ्गी रमणियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, मैं तो केवल आपके चरणकमलोंमें यह प्रार्थना करता हूँ कि जन्म-जन्मान्तर मैं अपने हृदयमें आपका स्मरण करता रहूँ।” श्रीमद्भागवतमें—३/२५/३६, ३/४/१५, ३/२५/३४, ४/१/२२, ४/९/१०, ४/२०/२४, ५/१४/४३, ६/११/२५, ६/१७/२८, ६/१८/७४, ७/६/२५, ७/८/४२, ८/३/२०, ९/४/४९, ९/२१/१२, १०/१६/३७, १०/८७/२१, ११/१४/१४, ११/२०/३४, १२/३/६ आदि अनेक श्लोक द्रष्टव्य हैं॥४४॥ अमृतानुकणिका—जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका चित्कण अंश और श्रीकृष्णदास है। इसलिये श्रीकृष्णदास होनेका अभिमान जीवके पक्षमें स्वरूपगत और स्वाभाविक है। जैसे दाहिका शक्तिसे अग्निको पृथक् नहीं किया जा सकता, वैसे ही श्रीकृष्णदास अभिमानसे जीवको विच्छिन्न नहीं किया जा सकता। अग्निमें चन्द्रकान्तमणि अथवा महौषधविशेष डालनेसे जिस प्रकार अग्निकी ३५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत