भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

[ ६/१४-१५ कर्मकाण्डके विस्तारके द्वारा ही सांख्यस्मृतियोंकी सविषयता सिद्ध होगी, इस प्रकार भी नहीं कह सकते, क्योंकि कर्मकाण्डादि ब्रह्मज्ञानोदयके लिये चित्तशुद्धिके उद्देश्यसे धर्मविधानमें प्रवृत्त हैं। इसलिये इन स्मृतिशास्त्रोंकी प्रवृत्ति ज्ञानकाण्डके विस्तारके निमित्त ही कही जायेगी। इन सभी धर्मोंमें चित्तशोधकता भी दिखाई देती है—'तमेतं वेदानुवचनेन' आदि श्रुतिवाक्य ही इसका प्रमाण हैं। 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' एवं 'नारायणपरा वेदाः' आदि श्रुतियोंने भी इस प्रकारका अभिप्राय ही व्यक्त किया है। इस प्रकारसे सांख्यस्मृतिकी ज्ञानकाण्डके विस्तारके निमित्त ही प्रवृत्ति है, ऐसा अनुमान करनेपर भी उसके द्वारा वेदान्तके अर्थके विस्तारको स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सांख्यस्मृतियोंमें श्रुति-विरुद्धार्थ ही प्रतिपादित हुआ है। श्रुति-संवादसमूहके अर्थोंका स्पष्टीकरण ही उनका विस्तार है। किन्तु सांख्यस्मृतियोंमें श्रुति-संवादके अर्थोंका स्पष्टीकरण दिखाई नहीं देता, इसलिये उसको श्रुतिविरुद्ध ही कहा जायेगा। जो श्रुतिविरुद्ध है, वह स्वकपोलकल्पित (मनघड़न्त) होनेके कारण अप्रमाणिक है। इसलिये इस अप्रमाणिक सांख्यस्मृतिका व्यर्थता-दोष अपरिहार्य (अनिवार्य) हो जाता है। किसी एक स्मृतिको अप्रमाणित करनेके लिये अन्य स्मृतियोंका पक्षपात उचित नहीं है। क्योंकि विभिन्न अर्थ बतलानेवाली स्मृतियोंके प्रति पक्षपाती होनेपर, विभिन्न प्रकारसे व्याख्याकारी (गौतमादि) अनेक व्यक्तियोंके बहुत सारे मत-दर्शनसे उनके वास्तव अर्थका निर्णय नहीं हो सकता है। दो स्मृतियोंका परस्पर विरोध उपस्थित होनेपर, श्रुतिके अतिरिक्त अन्य किसी निर्णायक प्रमाणका आश्रय ग्रहण करना असम्भव है। जिसका आश्रय ग्रहण किया जाय, वह अवश्य ही श्रुति-अनुगत होना चाहिये। श्रुतिके अनुसार ना होनेपर, वह आदरणीय नहीं हो सकता। जो लोग स्मृतिके बलपर ही निन्दा करते हैं, उनका उसी स्मृतिके द्वारा ही निराकरण करना होगा, उससे दूसरी स्मृतियोंका निर्विषयतारूप दोषका उल्लेख अवश्यम्भावी है। श्वेताश्वतर उपनिषदमें 'ऋषिं प्रसूतं कपिलम्' आदि वाक्योंमें निश्चय ही एक सिद्ध कपिल ऋषिका उल्लेख हुआ है, किन्तु वे कपिल ये सांख्यकार कपिल नहीं हैं, वे अन्य कपिल ऋषि हैं। इसलिये इन सांख्यकार-कपिलको 'अप्रमाणिक' कहना श्रुतिका भी असम्मान नहीं है। मनु और पराशरकी सिद्धि श्रुति-स्मृति प्रसिद्ध है। वेदविरुद्ध सांख्यस्मृतिके प्रवर्त्तक कपिल और कर्दम ऋषिके पुत्र भगवान् कपिल—एक नहीं हैं। सांख्यकार कपिल अग्निवंशमें उत्पन्न मायामोहित जीव हैं और कर्द्दमनन्दन कपिल वासुदेवके ही अवतार हैं। पद्मपुराणमें कहा गया है कि 'भगवान् वासुदेव कर्द्दम-ऋषिसे कपिलके रूपमें अवतीर्ण होकर ब्रह्मादि देवताओंको, भृगु आदि ऋषियोंको और आसुरि नामक ब्राह्मणको सांख्यतत्त्वका उपदेश करते हैं; उनके द्वारा कही गई सांख्यस्मृतिकी वेदार्थके द्वारा पुष्टि होती है। अन्य एक कपिलने भी इन्हीं आसुरिको ही कुतर्कपूर्ण स्वकपोलकल्पित एक सांख्यका उपदेश किया था।' इसलिये वेदविरुद्ध दूसरे कपिल द्वारा रचित अप्रमाणिक सांख्यस्मृतिको व्यर्थ कहनेमें कोई भी दोष नहीं है। (द्वितीय सूत्र)—विशेषतः उक्त सांख्यस्मृतियोंमें इस प्रकार कुछ विषयोंका वर्णन हुआ है, जो वेदोंमें प्राप्त नहीं होता है। इसी कारणसे भी उक्त सांख्यस्मृतिको 'अप्रमाणिक' कहा जा सकता है। ये विषय इस प्रकार हैं—'पुरुष अर्थात् जीवात्माएँ चिन्मात्र और विभु हैं, प्रकृति ३४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत