श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/१४-२१ ]
ही इनको बन्धन और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। 'बन्धन' और 'मोक्ष', दोनों ही प्राकृत हैं। 'सर्वेश्वर' नामक कोई एक पुरुष नहीं है। 'काल' तत्त्व ही नहीं है, प्राणादि पाँच प्रकार इन्द्रियोंकी ही वृत्ति हैं।” आदि कुछ वेदान्तविरुद्ध विषय इस सांख्यस्मृतिमें दिखलायी देते हैं॥ १५॥ स्वयं-निमित्त और श्रीअद्वैतप्रभु-'उपादान'-कारण :- आपने पुरुष-विश्वेर 'निमित्त'-कारण। अद्वैत-रूपे 'उपादान' हन नारायण॥ १६॥ ईक्षणकर्त्तारूपमें निमित्त और श्रीअद्वैतप्रभुरूपमें उपादानरूपी स्रष्टा :- 'निमित्तांश' करे तँहो मायाते ईक्षण। 'उपादान' अद्वैत करेन ब्रह्माण्ड-सृजन ॥ १७॥ सांख्य-मत-खण्डन :- यद्यपि सांख्य माने, 'प्रधान'-कारण। जड़ हइते कभु नहे जगत्-सृजन ॥ १८॥ भगवान्की शक्तिसे ही प्रकृति क्रियाशील :- निज सृष्टिशक्ति प्रभु सञ्चारि' प्रधाने। ईश्वरेर शक्त्ये तबे हये त' निर्माणे ॥ १९॥ अनुवाद-कारणोदशायी नारायण जगत्के 'निमित्त' कारण होकर 'निमित्तांश' रूपमें मायापर दृष्टिपात करते हैं और वे श्रीअद्वैतरूपमें 'उपादान' कारण होकर 'उपादानांश' रूपमें ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं। यद्यपि सांख्यवादी लोग 'प्रधान' को जगत्का कारण कहते हैं, तथापि जड़ वस्तु प्रधानसे कभी भी जगत्की सृष्टि सम्भव नहीं है। भगवान् विष्णु अपनी सृजन करनेकी शक्ति प्रधानमें सञ्चारित करते हैं और तब वह उस ईश्वरकी शक्तिसे जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ होता है॥ १६-१९॥ अनुभाष्य-आदिलीला ५/५८-६६ संख्या; मध्यलीला २०/२५९-२६१, २७१, २७६ संख्या द्रष्टव्य हैं॥ १८-१९॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी दो मूर्तियाँ :- अद्वैत-आचार्य-कोटिब्रह्माण्डर कर्त्ता। आर एक एक मूर्त्ये ब्रह्माण्डर भर्त्ता॥ २०॥ भगवान्के अङ्ग अथवा अंशस्वरूप श्रीअद्वैतप्रभु :- सेइ नारायणेर मुख्य अङ्ग,-अद्वैत। 'अङ्ग'-शब्दे अंश करि' कहे भागवत ॥ २१॥ अनुवाद-कारणोदशायी नारायण श्रीअद्वैताचार्य रूपसे करोड़ों ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं और उतने ही गर्भोदशायी विष्णुरूपोंमें अपना विस्तार करके एक-एक ब्रह्माण्डका पालन करते हैं। वे श्रीअद्वैताचार्य नारायणके मुख्य अङ्ग हैं। भागवतके अनुसार 'अङ्ग' शब्दका अर्थ 'अंश' होता है॥ २०-२१॥
छठा अध्याय | ३४५