भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ६/२०-२६ अनुभाष्य—आदिलीला ३/६७ द्रष्टव्य है॥२१॥ श्रीमद्भागवतम् (१०/१४/१४)— नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना- त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥२२॥ अनुवाद—[ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा]—हे अधीश! आप सभी लोकोंके साक्षी हैं। जब आप प्रत्येक जीवकी आत्मा अर्थात् अत्यन्त प्रिय वस्तु हैं, तब क्या आप मेरे पिता नारायण नहीं हैं? 'नरजात जल' अर्थात् नरसे जलकी सृष्टि हुई, इसलिये उसे नार कहा जाता है और उसमें जो अयन अर्थात् शयन करते हैं, वे नारायण हैं। वे आपके अङ्ग अर्थात् अंश हैं। आपके अंश स्वरूप कारणाब्धिशायी, क्षीरोदशायी और गर्भोदशायी कोई भी मायाके अधीन नहीं हैं। वे सब मायाधीश और मायासे अतीत परमसत्य वस्तु हैं॥२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥२२॥ अङ्ग या अंश होनेपर भी मायातीत :- ईश्वरेर 'अङ्ग', अंश—चिदानन्दमय। मायार सम्बन्ध नाहि, एड् श्लोके कय॥२३॥ 'अंश' ना कहकर 'अङ्ग' कहनेका तात्पर्य :- 'अंश' ना कहिया, केने कह ताँरे 'अङ्ग'। 'अंश' हैते 'अङ्ग', याते हय अन्तरङ्ग॥२४॥ अनुवाद—ईश्वरके अङ्ग अर्थात् अंश सभी चिदानन्दमय हैं और उनका मायासे कोई सम्बन्ध नहीं है—उपरोक्त श्लोकमें यह कहा गया है। श्रीअद्वैतको 'अंश' ना कहकर 'अङ्ग' क्यों कहा गया है? इसका कारण यह है कि 'अङ्ग' कहनेसे अधिक अन्तरङ्ग होना सूचित होता है॥२३-२४॥ अनुभाष्य—आदिलीला ३/६९-७० द्रष्टव्य हैं॥२३॥ 'अद्वैत' नामकी सार्थकता :- महाविष्णुर अंश—अद्वैत गुणधाम। ईश्वरे अभेद, तेञि 'अद्वैत' पूर्ण नाम॥२५॥ अनुवाद—महाविष्णुके अंश श्रीअद्वैत समस्त गुणोंके धाम हैं और वे उनसे अभिन्न हैं, इसीमें अद्वैत नामकी सार्थकता है॥२५॥ आचार्य-नामकी सार्थकता :- पूर्वे यैछे कैल सर्व-विश्वेर सृजन। अवतरि' कैल एबे भक्ति-प्रवर्त्तन॥२६॥ अनुवाद—सृष्टिके प्रारम्भमें जैसे उन्होंने समस्त जगत्की सृष्टि की थी, वैसे अब अर्थात् इस कलियुगमें अवतार लेकर उन्होंने जगत्को भक्ति-धर्ममें प्रवृत्त किया है॥२६॥ ३४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत