श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/२६-३२ ] अद्वैतावतारमें श्रीकृष्णभक्ति-प्रचार ही उनका कार्य :- जीव निस्तारिल कृष्णभक्ति करि' दान। गीता-भागवते कैल भक्तिर व्याख्यान ॥ २७ ॥ भक्ति-उपदेश बिनु ताँर नाहि कार्य। अतएव नाम हैल 'अद्वैत-आचार्य' ॥ २८ ॥ अनुवाद-उन्होंने श्रीकृष्णभक्ति प्रदानकर जीवोंका उद्धार किया और गीता-भागवतकी व्याख्यामें भक्ति-धर्मका ही प्रचार किया। उन्होंने केवल भक्तिका उपदेश और आचरण किया, इसलिये उनका नाम 'श्रीअद्वैत-आचार्य' है॥ २७-२८॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैतप्रभु सेव्य विष्णुत्तत्त्व होनेपर भी जीवोंके मङ्गलविधान-कार्यरूप सेवा-प्रवृत्ति दान करनेके अतिरिक्त उनका और कोई आचरण नहीं है। केवल सेव्यके रूपमें अपनी लीलाका प्रचार करनेसे जगत्के भोगी लोग उसका अनुकरणकर निरीश्वर केवलाद्वैतवादी या अहंग्रहोपासक हो जायेंगे,—यह देखकर भगवान् विष्णुके सेवकके रूपमें लीला प्रकटकर इस आचार्यत्वका प्रदर्शन करना भी एक कार्य है। आचार्यका कृष्णसेवोन्मुखतारूप आचरणके अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं है। सेव्यके सेवरूपमें आचरण ही आचार्यत्वका हेतु है—यही नैमित्तिक अवतारकी लीलाविशेष है। आचार्यके पवित्र पद और वेशको कलुषितकर जो दुराचारी व्यक्ति भगवत्सेवाको छोड़कर अपने इन्द्रियतर्पणके ताण्डव नृत्यका प्रदर्शन करते हैं, श्रीअद्वैताचार्य उनका सम्पूर्ण रूपसे तिरस्कार करते हैं॥ २६-२८॥ वैष्णवेर गुरु तेंहो जगतेर आर्य। दुइनाम-मिलने हैल 'अद्वैत-आचार्य' ॥ २९ ॥ अनुवाद-वे सभी वैष्णवोंके गुरु और जगद्वासियोंके पूजनीय हैं। दोनों नामोंके मिलनेसे उनका नाम श्रीअद्वैत-आचार्य है॥ २९॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्य वैष्णव-जगत्के गुरु और सभीके सम्मानीय हैं। उनके चरणकमलोंके आश्रयमें भगवद्भक्त वैष्णव उनके आचरणका अनुसरण करके हरिसेवा करते हैं॥ २९॥ 'कमलाक्ष'-नामकी सार्थकता :- कमलनयनेर तेंहो, याते 'अङ्ग', 'अंश'। 'कमलाक्ष' बलि' धरे नाम अवतंस ॥ ३० ॥ वैकुण्ठमें विष्णु और वैष्णवोंका सारूप्य :- ईश्वर-सारूप्य पाय पार्षदगण। चतुर्भुज, पीतवास, यैछे नारायण ॥ ३१ ॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी गुण-महिमा :- अद्वैत-आचार्य-ईश्वरेर अंशवर्य। ताँर तत्त्व-नाम-गुण, सकलि आश्चर्य ॥ ३२ ॥ अनुवाद-वे कमलनयन भगवान्के अङ्ग और अंश हैं, इसलिये उनका नाम 'कमलाक्ष' भी है। भगवान्के परिकर सारूप्य अर्थात् उन्हींकी भाँति रूप प्राप्त करते हैं। वैकुण्ठमें नारायणके छठा अध्याय | ३४७