श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६/३०-३९ परिकर उनके समान ही चतुर्भुजरूप हैं और वे भी पीताम्बर धारण करते हैं। श्रीअद्वैताचार्य नारायणके श्रेष्ठ अंश हैं, इसलिये उनके तत्त्व-नाम-गुण सभी अद्भुत और अलौकिक हैं॥ ३०-३२॥ श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा महाप्रभुको अवतीर्ण कराना :- याँहार तुलसीदले, याँहार हुङ्कारे। स्वगण सहिते चैतन्येर अवतारे ॥ ३३॥ याँर द्वारा कैल प्रभु कीर्त्तन प्रचार। याँर द्वारा कैल प्रभु जगत् निस्तार ॥ ३४॥ आचार्य गोसाञिर गुण-महिमा अपार। जीवकीट कोथाय पाइबेक तार पार॥ ३५॥ अनुवाद- जिन्होंने गङ्गाजल और तुलसीदल अर्पणकर श्रीकृष्णकी आराधना की और अवतरणके लिये सप्रेम-हुङ्कारसे श्रीकृष्णका आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण श्रीचैतन्यरूपमें अपने परिकरों सहित अवतरित हुए तथा जिनके द्वारा महाप्रभुने सङ्कीर्त्तनका प्रचार करवाया और जगत्का उद्धार किया, उन श्रीअद्वैताचार्यकी गुण-महिमा अपार है। अतः क्षुद्र जीव उसे कैसे समझ सकता है ? ॥ ३३-३५॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/९१, ९५-१०८ संख्या द्रष्टव्य हैं॥ ३३-३४॥ श्रीगौरके एक अङ्ग-श्रीअद्वैत और दूसरे अङ्ग-श्रीनिताइ :- आचार्य गोसाञि चैतन्येर मुख्य अङ्ग। आर एक अङ्ग ताँर प्रभु नित्यानन्द ॥ ३६ ॥ उपाङ्गरूप अस्त्र-श्रीवासादि भक्त :- प्रभुर उपाङ्ग-श्रीवासादि भक्तगण। हस्तमुखनेत्र-अङ्ग चक्राद्यस्त्र-सम ॥ ३७॥ अङ्ग-उपाङ्गको लेकर श्रीगौरके द्वारा नाम-प्रेम-प्रचार :- ए़सब लइया चैतन्यप्रभुर विहार। ए़सब लइया करेन वाञ्छित प्रचार ॥ ३८ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक मुख्य अङ्ग श्रीअद्वैताचार्य हैं और दूसरे मुख्य अङ्ग श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। महाप्रभुके उपाङ्ग श्रीवासादि भक्त हैं। ये अङ्ग और उपाङ्ग उनके हाथ-मुख-नेत्रके समान मुख्य अङ्ग तथा चक्रादिके समान उनके अस्त्र हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने इन सबके साथ लीला की और इनको साथ लेकर नाम-सङ्कीर्त्तन तथा श्रीकृष्णप्रेमका प्रचार किया ॥ ३६-३८ ॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/७१-७४ संख्या द्रष्टव्य है॥ ३६-३८॥ लौकिक रीतिके अनुसार श्रीअद्वैतके प्रति महाप्रभुका गुरुतुल्य व्यवहार :- माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य, एइ ज्ञाने। आचार्य-गोसाञिरे प्रभु गुरु करि' माने ॥ ३९ ॥ ३४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत