श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/३९-४१ ] लौकिक-लीलाते धर्ममर्यादा-रक्षण। स्तुति-भक्त्ये करे ताँर चरण-वन्दन॥४०॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी महाप्रभुके प्रति प्रभु-बुद्धि— चैतन्यगोसाञिके आचार्य करे प्रभु-ज्ञान। आपनाके करेन ताँर 'दास'-अभिमान॥४१॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यको अपने परम गुरुदेव श्रील माधवेन्द्रपुरीका शिष्य जानकर महाप्रभु उनको अपने गुरुके रूपमें मानते हैं। लौकिक लीलाकी मर्यादाकी रक्षा करते हुए, वे उनकी भक्तिपूर्वक स्तुति और चरण-वन्दना करते हैं। किन्तु श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको अपना प्रभु (स्वामी) मानते हैं और स्वयंमें उनके दास होनेका अभिमान रखते हैं॥३९-४१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभु-श्रील माधवेन्द्रपुरीके शिष्य हैं और उनके गुरुभाई श्रीईश्वरपुरी महाप्रभुके गुरु हैं। इस सम्बन्धसे महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यको 'गुरु' मानते हैं। वास्तवमें श्रीचैतन्य गोसाईं सर्वेश्वर हैं और श्रीअद्वैतप्रभु उनके दास। इस सम्बन्धसे श्रीअद्वैताचार्य प्रभु अपनेमें 'दास' अभिमान करते हैं॥३९-४१॥ अनुभाष्य—श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीमध्वाचार्य-सम्प्रदायके एक गुरु हैं। श्रीईश्वरपुरी और श्रीअद्वैतप्रभु दोनों श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य हैं। श्रीमध्व-परम्पराके अन्तर्गत श्रीगौड़ीय-वैष्णव-शाखाका वर्णन 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका', 'प्रमेयरत्नावली' में और श्रीगोपालगुरु गोस्वामीके ग्रन्थमें हुआ है। श्रीभक्तिरत्नाकरमें भी इसका उल्लेख देखा जाता है। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकामें श्रीमध्वशाखाका इस प्रकारसे वर्णन है— “परव्योमेश्वरस्यासीच्छिष्यो ब्रह्मा जगत्पतिः। तस्य शिष्यो नारदोऽभूत् व्यासस्तस्याप शिष्यताम्॥ शुको व्यासस्य शिष्यत्वं प्राप्तो ज्ञानावरोधनात्। व्यासाल्लब्धकृष्णदीक्षो मध्वाचार्यो महायशाः॥ तस्य शिष्योऽभवत् पद्मनाभाचार्य-महाशयः। तस्य शिष्यो नरहरिस्तच्छिष्यो माधवद्विजः। अक्षोभ्यस्तस्य शिष्योऽभूत्तच्छिष्यो जयतीर्थकः। तस्य शिष्यो ज्ञानसिन्धुः तस्य शिष्यो महानिधिः। विद्यानिधिस्तस्य शिष्यो राजेन्द्रस्तस्य सेवकः। जयधर्म मुनिस्तस्य शिष्यो यद्गणमध्यतः॥ श्रीमद्विष्णुपुरी यस्तु भक्तिरत्नावलीकृतिः। जयधर्मस्य शिष्योऽभूद्ब्रह्मण्यः पुरुषोत्तमः॥ व्यासतीर्थस्तस्य शिष्यो यश्चक्रे विष्णुसंहिताम्। श्रीमान् लक्ष्मीपतिस्तस्य शिष्यो भक्तिरसाश्रयः॥ तस्य शिष्यो माध् वेन्द्रो यद्धर्मोऽयं प्रवर्त्तितः। तस्य शिष्योऽभवत् श्रीमानीश्वराख्यपुरी यतिः॥ कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः। अद्वैतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे॥ ईश्वराख्यपुरीं गौर उरीकृत्य गौरवे। जगदाप्लावयामास प्राकृताप्राकृतात्मकम्॥” अर्थात् परव्योमेश्वर श्रीनारायणके शिष्य जगत्पति ब्रह्मा, ब्रह्माके शिष्य नारद और नारदके शिष्य श्रीवेदव्यास हुए। (शुष्क) ज्ञानके अवरोधन (अर्थात् श्रीलवेदव्यासके शिष्योंके मुखसे भगवान्के नाम, रूप, गुण और लीला सम्बन्धी श्लोकोंको श्रवण करनेके उपरान्त पालन किये जा रहे शुष्क ज्ञानपथमें बाधा पड़ने अर्थात् उसके प्रति अरुचि उत्पन्न होने) के कारण शुकदेवने श्रीव्यासदेवका शिष्यत्व स्वीकार किया। महायशस्वी मध्वाचार्यने भी श्रीव्यासदेवसे कृष्णमन्त्रकी दीक्षा प्राप्त की। श्रीमध्वाचार्यके शिष्य महाशय पद्मनाभाचार्य, पद्मनाभके नरहरि, नरहरिके माधव-द्विज, माधवके प्रिय अक्षोभ्य, अक्षोभ्यके जयतीर्थ, जयतीर्थके ज्ञानसिन्धु, ज्ञानसिन्धुके महानिधि, महानिधिके विद्यानिधि, विद्यानिधिके राजेन्द्र, राजेन्द्रके शिष्य जयधर्म मुनि हैं। जयधर्मके अनुगत शिष्योंमें श्रीविष्णुपुरी एक प्रधान आचार्य हुए हैं और इन्होंने 'भक्ति-रत्नावली' छठा अध्याय | ३४९