श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६/३९-४४ नामक ग्रन्थकी रचना भी की है। जयधर्मके (एक अन्य) शिष्य पुरुषोत्तम, पुरुषोत्तमके शिष्य ब्रह्मण्यतीर्थ, ब्रह्मण्यतीर्थके शिष्य वे व्यासतीर्थ हुए, जिन्होंने 'विष्णुसंहिता' की रचना की। व्यासतीर्थके शिष्य भक्तिरसके आश्रय लक्ष्मीपति, लक्ष्मीपतिके शिष्य वे श्रीमाधवेन्द्रपुरी हैं, जिनसे प्रेम-भक्तिरूप धर्मका प्रवर्तन हुआ है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य यति श्रीईश्वरपुरीने उस कल्पवृक्षके शृङ्गार फलस्वरूप होकर शृङ्गाररसको प्रकाशित किया। इन्हीं श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य श्रीअद्वैताचार्यने दास्य और सख्य नामक दो फलोंको प्रकाशित किया। श्रीगौरचन्द्रने ईश्वरपुरीको गौरवसहित (गुरुरूपमें) वरणकर प्राकृत और अप्राकृतमय जगत्को प्रेममें प्लावित कर दिया॥३९॥ कृष्णदास-अभिमानसे भक्तिका प्रचार :- सेइ अभिमान-सुखे आपना पासरे। 'कृष्णदास हओ'-जीवे उपदेश करे॥४२॥ अनुवाद-इस दास-अभिमानके आनन्दमें डूबकर श्रीअद्वैताचार्य स्वयंको भूल जाते हैं और जीवोंको श्रीकृष्णके दास बननेका उपदेश करते हैं॥४२॥ अनुभाष्य-भक्तभावको अङ्गीकारकर महाविष्णु अपने स्वरूप-अभिमानका परित्यागकर भगवत्-दास्यको ही अपना आनुष्ठानिक कार्य मानकर आनन्दका अनुभव करते हैं। इस सेवानन्दके द्वारा महाविष्णुका अपना स्वरूपज्ञान शिथिल हो जाता है अर्थात् उन्हें स्वयं भोक्ता होनेके ज्ञानकी विस्मृतिसी हो जाती है। वे स्वयं आचरण करके जीवोंको अनुक्षण श्रीकृष्णसेवा करनेकी प्रवृत्ति प्रदान करते हैं। संख्या २७-२८ द्रष्टव्य है॥४२॥ कृष्णदास्यमें वैकुण्ठ-आनन्द :- कृष्णदास-अभिमाने ये आनन्दसिन्धु। कोटी ब्रह्मसुख नहे तार एकबिन्दु॥४३॥ श्रीअद्वैतप्रभु एवं श्रीनित्यानन्द प्रभुका गौरदास्यमें ही सुख :- मुञि ये चैतन्यदास, आर नित्यानन्द। दास-भाव-सम नहे अन्यत्र आनन्द॥४४॥ अनुवाद-(श्रीअद्वैताचार्य कहते हैं)-श्रीकृष्णदास-अभिमानसे जिस आनन्दके समुद्रकी प्राप्ति होती है, करोड़ों ब्रह्मसुखकी तुलना उसके एक बिन्दुसे भी नहीं की जा सकती है। मैं और नित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके दास हैं। इस दास-भावके समान आनन्द और कहीं भी नहीं है॥४३-४४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'ब्रह्मसुख'-'मैं ब्रह्म हूँ', इस अभेद-बुद्धिमें जो सुख है॥४३॥ अनुभाष्य-आदिलीला ७/८५, ९७-९८ संख्या द्रष्टव्य हैं। भःरःसिः पूर्व-लहरीमें- “ब्रह्मानन्दो भवेदेष चेत् पराद्धर्गुणीकृत। नैति भक्तिसुखाम्भोघेः परमाणुतुलामपि॥” अर्थात् “यदि ब्रह्मानन्दको परार्द्ध (ब्रह्माजीकी आयुके आधेकालमें जितने दिन हैं, उतने) गुणा कर दिया जाय, तो वह आनन्द भगवत्सेवानन्द समुद्रके एक परमाणुके बराबर भी नहीं है।” ३५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत