श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 393, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें६/४३-४४ ] भावार्थदीपिकामें— “त्वत्कथामृत-पाथोधौ विहरन्तो महामुदः। कुर्वन्ति कृतिनः केचिच्चतुर्वर्गं तृणोपमम् ॥” अर्थात् “आपके कथामृतके समुद्रमें विचरण करनेवाले परमानन्दमें मग्न हुए भक्त धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, इन चार पुरुषार्थोंको तृणके समान समझते हैं।” “तत्रापि च विशेषेण गतिमण्वीमन्विच्छतः। भक्तिहृतमनःप्राणान् प्रेम्णा तान् कुरुते जनान्॥ श्रीकृष्णचरणाम्भोजसेवा-निर्वृतचेतसाम्। एषां मोक्षाय भक्तानां न कदाचित् स्पृहा भवेत्॥” अर्थात् “जीवोंमेंसे विशेष रूपसे जो सूक्ष्म गति अर्थात् मुक्ति नहीं चाहते, ऐसे भक्तोंके मन और प्राणको भक्ति प्रेमके द्वारा हरण कर लेती है। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके सेवासुखमें निमग्न-चित्त भक्तोंको कभी भी मुक्तिकी इच्छा नहीं होती।” पद्मपुराणमें कार्तिक-माहात्म्यमें— “वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा, न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह। इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं, सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः॥” अर्थात् “हे देव! आप सब प्रकारके वर देनेमें समर्थ हैं। तो भी मैं आपसे चतुर्थ पुरुषार्थरूप मोक्ष अथवा मोक्षकी चरम सीमा वैकुण्ठादि लोक भी नहीं चाहता हूँ। ना ही मैं श्रवण-कीर्तनादि नवधाभक्तिके द्वारा प्राप्त किये जानेवाला कोई दूसरा वरदान ही आपसे माँगता हूँ। हे नाथ! आपका यह बाल-गोपालरूप मेरे हृदयमें सदा विराजमान रहे। मुझे और दूसरे वरदानसे कोई प्रयोजन नहीं है।” तथा “कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्तैव यद्वत्, तया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च। तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ, न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह॥” अर्थात् “हे दामोदर ! जिस प्रकार आपने अपने दामोदर रूपसे माता यशोदाके द्वारा ओखलमें बँधे रहकर भी नलकूबेर और मणिग्रीव नामक कुबेरके पुत्रोंका नारदके शापसे प्राप्त वृक्ष योनिसे उद्धारकर उन्हें परम प्रयोजनरूप अपनी भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये, यही मेरा एकमात्र आग्रह है। किसी भी प्रकार अन्य प्रकारके मोक्षके लिये मेरा तनिक भी आग्रह नहीं है।” हयशीर्षमें श्रीनारायणव्यूह स्तवमें— “न धर्मं काममर्थं वा मोक्षं वा वरदेश्वर। प्रार्थये तब पादाब्जे दास्यमेवाभिकामये॥ पुनः पुनर्वरान् दित्सुर्विष्णुर्मुक्तिं न याचितः। भक्तिरेव वृता येन प्रह्लादं तं नमाम्यहम्॥ यदृच्छया लब्धमपि विष्णोर्दाशरथेस्तु यः। नैच्छन्मोक्षं बिना दास्यं तस्मै हनुमते नमः॥” अर्थात् “हे वरदेनेवालोंमें श्रेष्ठ! आप धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान कर सकते हैं, परन्तु मैं इन्हें नहीं चाहता हूँ। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंका दास बनकर सेवा करना चाहता छठा अध्याय | ३५१