भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ६/४३-४४ हूँ। भगवान् नृसिंहदेवके बार-बार देनेपर भी प्रह्लादने किसी भी वर को स्वीकार नहीं किया और केवल उनकी भक्तिकी ही कामना की, मैं उन प्रह्लादके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। इसी प्रकार श्रीहनुमानके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, जो श्रीरामचन्द्रके दास्यके बिना मोक्षकी भी कामना नहीं करते हैं।” श्रीहनुमद्वाक्यमें— “भवबन्धच्छिन्दे तस्मै स्पृहयामि न मुक्तये। भवान् प्रभुरहं दास इति यत्र विलुप्यते॥” अर्थात् “मैं ऐसी मुक्ति नहीं चाहता हूँ और ना ही ब्रह्ममें लीन होना चाहता हूँ, जहाँ प्रभु-दासभाव विलुप्त हो जाय।” श्रीनारदपञ्चरात्रमें जितन्त-स्तोत्रमें— “धर्मार्थ-काम-मोक्षेषु नेच्छा मम कदाचन। त्वत्पादपङ्कजस्याधो जीवितं दीयतां मम॥ मोक्ष-सालोक्य-सारूप्यान् प्रार्थये न धराधर। इच्छामि हि महाभाग कारुण्यं तव सुव्रत॥” अर्थात् “धर्म-अर्थ-काम-मोक्षकी मेरी कभी भी इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंका दासत्व ही चाहता हूँ। हे जगत्पते! मैं सालोक्य-सारूप्यादि मुक्तिकी भी प्रार्थना नहीं करता, मैं तो केवल आपकी कृपाकी अभिलाषा करता हूँ।” राजाकुलशेखर-कृत “मुकुन्दमाला” स्तोत्रमें— “नाहं वन्दे पदकमलयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्व-हेतोः, कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्। रम्या-रामा-मृदुतनुलता-नन्दने नाभिरन्तुं, भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम्॥” अर्थात् “हे भगवन्! मैं ना तो संसारके द्वन्द्वों अर्थात् जन्म-मरण, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःखसे और ना ही कुम्भीपाक नरकके भीषण कष्टोंसे निदान पानेके लिये आपके चरणकमलोंकी वन्दना कर रहा हूँ। ना ही मैं स्वर्गमें नन्दनवनमें वास करनेवाली कोमलाङ्गी रमणियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, मैं तो केवल आपके चरणकमलोंमें यह प्रार्थना करता हूँ कि जन्म-जन्मान्तर मैं अपने हृदयमें आपका स्मरण करता रहूँ।” श्रीमद्भागवतमें—३/२५/३६, ३/४/१५, ३/२५/३४, ४/१/२२, ४/९/१०, ४/२०/२४, ५/१४/४३, ६/११/२५, ६/१७/२८, ६/१८/७४, ७/६/२५, ७/८/४२, ८/३/२०, ९/४/४९, ९/२१/१२, १०/१६/३७, १०/८७/२१, ११/१४/१४, ११/२०/३४, १२/३/६ आदि अनेक श्लोक द्रष्टव्य हैं॥४४॥ अमृतानुकणिका—जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका चित्कण अंश और श्रीकृष्णदास है। इसलिये श्रीकृष्णदास होनेका अभिमान जीवके पक्षमें स्वरूपगत और स्वाभाविक है। जैसे दाहिका शक्तिसे अग्निको पृथक् नहीं किया जा सकता, वैसे ही श्रीकृष्णदास अभिमानसे जीवको विच्छिन्न नहीं किया जा सकता। अग्निमें चन्द्रकान्तमणि अथवा महौषधविशेष डालनेसे जिस प्रकार अग्निकी ३५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत