भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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६/४३-४७ ] दाहिका शक्ति स्तम्भित हो जाती है, उसी प्रकार देह-आवेशादिजनित अन्य अभिमानके फलसे मायाबद्ध जीवका श्रीकृष्णदास-अभिमान स्तम्भित अथवा ढक जाता है। अन्य अभिमान दूर होनेपर श्रीकृष्णदास अभिमान जाग्रत होता है और क्रमशः उज्ज्वलताको धारण करता है। तब यह श्रीकृष्णदास अभिमान ही विभु-चैतन्य श्रीकृष्णके साथ अणुचैतन्य जीवका संयोग स्थापन करता है, जीवके चित्तमें श्रीकृष्णसेवावासना जाग्रत होती है तथा आनन्दघनविग्रह अखिलरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके प्रेमसेवामृत समुद्रमें निमज्जित होकर जीव अनन्त रसवैचित्रीकी आस्वादन चमत्कारिता अनुभव करता है। यही श्रीकृष्णदास अभिमानका स्वाभाविक फल है। निर्विशेष ब्रह्मानुसन्धानमूलक साधनके फलसे जिस ब्रह्मानन्दका आस्वादन प्राप्त होता है, उसमें स्वरूपशक्तिका विलास नहीं होनेके कारण आनन्दकी तरङ्ग और वैचित्री नहीं है, आस्वादनकी चमत्कारिता नहीं है। जीवका श्रीकृष्णदास अभिमान तब भी जीव-स्वरूपविरोधी भावविशेषसे ढका होनेके कारण श्रीकृष्णसेवा-वासना उनके चित्तमें जाग्रत नहीं हो पाती। रसतरङ्ग-वैचित्रीके आस्वादनसे जो अपूर्व और अनिर्वचनीय आस्वादन-चमत्कारिता उत्पन्न होती है, उसकी तुलनामें ब्रह्मानन्दका आस्वादन अति तुच्छ है। श्रीभगवान्से ध्रुव महाराजने कहा (हरिभक्तिसुधोदय १४/३६)— “त्वंसाक्षात्काराह्लाद-विशुद्धाब्धि-स्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो॥” अर्थात् “हे जगद्गुरु! आपके साक्षात्कारके फलसे जिस अप्राकृत विशुद्ध आनन्द-समुद्रमें मैं निमज्जित हुआ हूँ, उसकी तुलनामें निर्विशेष ब्रह्मानुभवजनित आनन्द भी मुझे गोखुरके समान अति अल्प प्रतीत हो रहा है।”॥४३-४४॥ दृष्टान्तके द्वारा कृष्णदास्यकी सर्वश्रेष्ठताका प्रदर्शन :- (१) लक्ष्मीकी कृष्णदास्यके लिये प्रार्थना :- परमप्रेयसी लक्ष्मी हृदये वसति। तेंहो दास्य-सुख मागे करिया मिनति॥४५॥ (२) विष्णुपार्षदगण और ब्रह्मा, शिव, चतुःसन, नारद तथा शुकादिका भी कृष्णदास्य :- दास्य-भावे आनन्दित पार्षदगण। विधि, भव, नारदादि शुक सनातन॥४६॥ (३) गौरदास्यमें पागल निताइ :- नित्यानन्द अवधूत सबाते आगल। चैतन्येर दास्य-प्रेमे हइला पागल॥४७॥ अनुवाद—नारायणकी परमप्रेयसी लक्ष्मी उनके वक्षस्थलपर वास करती हैं, तो भी वे उनसे दीनतापूर्वक दास्य-सुखकी ही विनती करती हैं। वैकुण्ठमें भगवान् विष्णुके पार्षद, ब्रह्मा, शिव, नारद, शुक और सनातनादि चतुःसन भी दास्य-भावमें आनन्दका अनुभव करते हैं। अवधूत श्रीनित्यानन्द प्रभु तो महाप्रभुके दासोंमें अग्रणी हैं और दास्य-प्रेममें वे उन्मत्त रहते हैं॥४५-४७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘आगल’—अग्रगण्य॥४७॥ छठा अध्याय | ३५३