भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ६/४८-५२ (४) श्रीवासादि महाजनगण, सभी गौरदास :- श्रीवास, हरिदास, रामदास, गदाधर। मुरारि, मुकुन्द, चन्द्रशेखर, वक्रेश्वर ॥४८॥ एसब पण्डितलोक परम-महत्त्व। चैतन्येर दास्ये सबाय करये उन्मत्त ॥ ४९॥ अनुवाद-श्रीवास पण्डित, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीरामदास, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीमुकुन्द दत्त, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीवक्रेश्वर पण्डितादि, इन सब परम विद्वान और महान् व्यक्तियोंको भी महाप्रभुका दास्य-भाव उन्मत्त करता है॥४८-४९॥ अपनेको गौरदास कहकर सभीको गौरदास बननेका ही उपदेश :- एइ मत गाय, नाचे, करे अट्टहास। लोके उपदेशे,–'हओ चैतन्येर दास' ॥ ५०॥ चैतन्यगोसाञि मोरे करे गुरु-ज्ञान। तथापिह मोर हय दास-अभिमान ॥ ५१ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यदास-भावमें उन्मत्त होकर श्रीअद्वैताचार्य कभी गाते, कभी नाचते, कभी अट्टहास करते। वे लोगोंको श्रीचैतन्यका दास होनेका उपदेश करते। वे कहते-श्रीचैतन्य महाप्रभु मुझे गुरु-तुल्य मानते हैं, परन्तु मैं तो उनका दास हूँ॥५०-५१॥ श्रीकृष्णप्रेमका प्रभाव :- कृष्णप्रेमेर एइ एक अपूर्व प्रभाव। गुरु-सम-लघुके कराय दास्यभाव ॥ ५२ ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णप्रेमका एक अपूर्व प्रभाव यह है कि वह बड़े-समान-छोटे, सभीमें दास्य-भाव उत्पन्न करा देता है॥५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'गुरु' - वात्सल्यरसमाश्रित गुरुवर्ग; 'सम' - समान (सख्यरसमाश्रित); 'लघु' - क्षुद्र। श्रीकृष्णप्रेम इन तीनोंको ही दास्यभाव प्रदान करता है। इसलिये श्रीकृष्णचैतन्यके गुरुवर्ग, समानगण और लघुगण-सभी उनके दास हैं॥५२॥ अनुभाष्य-जगत्में गुरुवर्ग अज्ञातरूपसे जो दास्यभावमें सेवा करते हैं, उसे अधिकांशतः ऐश्वर्य-प्रधान बुद्धिसे अथवा मर्यादा-मार्गमें नहीं समझा जा सकता। इसलिये नारायणसेवामें श्रीकृष्णप्रेमकी भाँति चमत्कारिता नहीं है। श्रीकृष्णके गुरुवर्ग दास्यके उत्कर्षमें अवस्थित होनेके लिये ही गुरुपदको ग्रहणकर सेवा करते हैं। समान और लघु-सम्बन्धयुक्त होकर दास्यभाव ऐश्वर्यप्रधान बुद्धिसे समझा जा सकता है, किन्तु गुरु-अभिमानमें दासभावकी प्रबलता एकमात्र श्रीकृष्णसेवामें ही अवस्थित है। सम्पूर्णरूपसे सेवा-प्रवृत्तियुक्त होकर प्रचुर परिमाणमें सेवाभिलाष एकमात्र सर्वसेव्य श्रीकृष्णके प्रति ही सम्भव है। नारायणके सम और लघु बहुतसे सेवक हैं, किन्तु श्रीकृष्णके गुरुवर्ग अपूर्व प्रभाव विस्तारकर आत्यन्तिक सेवा ही करते रहते हैं। श्रीकृष्णके गुरुजन, श्रीकृष्णके सम और श्रीकृष्णके स्नेहपात्र, ये तीनों प्रकारके व्यक्ति ही उनके प्रेमसे युक्त होकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं- यही प्रेमका अद्भुत विक्रम है॥५२॥ ३५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत