भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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६/५३-६० ] सिद्धानुभूति-प्रमाण :- इहार प्रमाण शुन-शास्त्रेर व्याख्यान। महदनुभव, याते सुदृढ़ प्रमाण॥५३॥ अनुवाद-शास्त्रके उपाख्यानसे इसका प्रमाण श्रवण करो, क्योंकि महान् व्यक्तियोंका अनुभव सुदृढ़ प्रमाण होता है॥५३॥ (५) नन्द-महाराजका वात्सल्य-रसमें भी श्रीकृष्णदास्य :- अन्येर का कथा, व्रजे नन्द-महाशय। ताँर सम 'गुरु' कृष्णेर आर केह नय॥५४॥ शुद्धवात्सल्ये ईश्वर-ज्ञान नाहि तार। ताँहाकेइ प्रेमे कराय दास्य-अनुकार॥५५॥ तेंहो रति-मति मागे कृष्णेर चरणे। ताँहार श्रीमुखवाणी ताहते प्रमाणे॥५६॥ “शुन उद्धव, सत्य, कृष्ण-आमार तनय। तेंहो ईश्वर-हेन यदि तोमार मने लय॥५७॥ तथापि ताँहाते रहु मोर मनोवृत्ति। तोमार ईश्वर-कृष्णे हउक मोर मति॥"५८॥ अनुवाद-औरोंके विषयमें क्या कहूँ, व्रजमें नन्द महाराजके समान श्रीकृष्णके गुरु (वन्दनीय) और कोई नहीं हैं। उनमें शुद्धवात्सल्य-भावके कारण श्रीकृष्णके प्रति भगवत्-बुद्धि नहीं है, परन्तु श्रीकृष्णप्रेम उन्हें भी दासके समान बना देता है। वे भी श्रीकृष्णके चरणोंमें रति-मति माँगते हैं, उनके मुखसे निकले वचन ही इसका प्रमाण हैं। वे उद्धवजीसे कहते हैं—'हे उद्धव सुनो! यह सत्य है कि कृष्ण मेरा पुत्र है। यदि तुम्हें लगता है कि वह भगवान् है, तो भी उसके प्रति मेरी पुत्र भावना ही रहेगी। तुम्हारे 'ईश्वर-कृष्ण' में मेरी वात्सल्य मति हो॥"५४-५८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे उद्धव! यद्यपि तुम कृष्णको ईश्वर मानते हो, तथापि उस कृष्णमें मेरी मनोवृत्ति स्थित रहे॥५८॥ श्रीमद्भागवत (१०/४७/६६-६७)- मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः। वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु॥५९॥ कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्वरेच्छया। मङ्गलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्वरे॥६०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५९-६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नन्द महाराज बोले-“हे उद्धव! हमारी समस्त मनोवृत्ति कृष्णके चरणकमलोंका आश्रय करके रहे, हमारी वाणी सदा उनका नाम-कीर्तन करती रहे और हमारा शरीर उनके अभिवादनमें ही प्रयुक्त हो। कर्मफलके अनुसार ईश्वरकी इच्छासे हमारी कोई भी छठा अध्याय | ३५५