श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ६/५९-६० अवस्था क्यों ना हो, दानादि शुभ कर्मोंके द्वारा परम पुरुष कृष्णमें हमारी रति सदा वर्द्धित होती रहे॥५९-६०॥ अनुभाष्य—व्रजवासियोंके साथ भेंट करनेके पश्चात् उन्हें आमन्त्रितकर मथुरा लौटते समय उद्धवजीको नन्दादि गोप श्रीकृष्णके प्रति अनुरागसे कह रहे हैं— नः (अस्माकं) मनसः वृत्तयः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः (कृष्णपादपद्माश्रिताः) स्युः। [अस्माकं] वाचः तु नाम्नां (तन्नाम्नाम्) अभिधायिनीः (कीर्त्तनपरा भवन्तु), कायः (देहः) तत्प्रह्वणादिषु (तस्य कृष्णस्य नमस्कारादिषु) अस्तु। कर्मभिः (पापपुण्यादिभिः फलान्वितैः) ईश्वरेच्छया यत्र क्वापि भ्राम्यमाणानां (चतुरशीतियोनिषु जायमानानां) नः (अस्माकं) मङ्गलाचरितैः दानैः (तज्जनितैः शुभकर्मभिः) ईश्वरे (भगवति) कृष्णे रतिः (अनुरागः) अस्तु। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५९-६०॥ अमृताणुकणिका—उद्धवजी व्रजमें श्रीकृष्णका सन्देश लेकर आये थे, तब उन्होंने नन्दबाबा और यशोदा मैयाको सान्त्वना देनेका प्रयास करते हुए कहा था—“श्रीकृष्ण नारायण हैं, अखिल जगत्के गुरु हैं। सभी उनके पुत्र हैं और आप उनको अपना पुत्र मानकर रो रहे हैं। इस जगत्में, समस्त विश्व ब्रह्माण्डमें आप और माता यशोदा परम सौभाग्यवान् हैं। आपके इस भाग्यको जगत्का कोई भी प्राणी स्पर्श नहीं कर सकता, क्योंकि आप लोगोंमें कृष्णके लिये इतना अनुराग है।” उद्धृत श्लोकोंकी टीकामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती लिखते हैं— “अब उद्धवजीके मथुरा लौटते समय नन्द महाराज उनके ऐश्वर्य-प्रधान मतकी आलोचना करते हुए कह रहे हैं—‘हे आयुष्मन् ! उद्धव ! कृष्णके रूप और गुण समुद्रतुल्य हैं, परन्तु उसके पिता-माता—हम दोनोंमें ही उसके प्रति कठोरता ही थी और अभी भी है। कृष्ण जब व्रजमें था, तब हमने जो स्नेह-ममतादि दिखलायी थी, अब उसपर विचार करता हूँ, तो लगता है कि वह सब कृत्रिम ही थी; अन्यथा उसके विरहमें हम किस प्रकारसे जीवित रह सकते हैं? पिता तो जगत्में एकमात्र महाराज दशरथ थे, जिन्होंने अपने पुत्रके वियोगमें ‘हा-राम! हा-राम!’ कहते ही अपने प्राण छोड़ दिये। हम तो पुत्रके वियोगमें मर भी नहीं रहे हैं। हममें तो कृष्णके लिये प्रेमकी गन्ध भी नहीं है। हम तो उसके पिता-माता होने योग्य नहीं हैं, इसलिये तो कृष्णने हमें छोड़कर देवकी-वसुदेवको माता-पिताके रूपमें अङ्गीकार किया है। परमेश्वर होनेके कारण कृष्णकी यह अचिन्त्य विचित्र लीला है। जो भी हो, कृष्णने हमें अयोग्य पिता-माता जानकर हमारा त्याग किया है। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे समान दुर्भाग्यशाली जगत्में और कोई नहीं है। हमें धिक्कार है।’ इस प्रकार कहते-कहते कृष्णविरहजनित विवशतासे और अपने प्रति श्रीकृष्णकी उदासीन भावनासे नन्दबाबाके मनमें महानुराग-जात महादैन्य उदित हुआ, उसीसे वे बड़े दुःखके साथ आगे कहने लगे—‘यह जन्म तो इसी प्रकार चला गया। यदि भविष्यमें किसी भी जन्ममें कृष्णमें हमारी रति-मति हो, तब हम उसके पिता-माता होने योग्य हो सकेंगे; यही हमारी प्रार्थना है।’ सख्य, वात्सल्य और मधुर भावका स्वभाव ऐसा है कि विरह विवशतासे और अपने प्रति विषयालम्बनकी (श्रीकृष्णकी) उदासीनतासे भक्तके चित्तमें महादैन्य उपस्थित होता है; उसके द्वारा अपने भावका परिवर्तन होकर दास्य भावका उदय होता है। तभी नन्दबाबा उक्तरूपमें ३५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत