श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचिन्ता करते यह 'मनसो वृत्तयो० ०' कह पा रहे हैं, ऐश्वर्यज्ञानसे यह सब नहीं कह रहे हैं।" 'ईश्वरेच्छया'-ईश्वरकी इच्छासे। यहाँ ईश्वर-श्रीकृष्णकी इच्छा नहीं कहकर 'ईश्वर-इच्छासे' यह पृथक् ईश्वर-पदकी जो उक्ति है, वह नन्द महाराजके निजभावके ही अनुरूप है, अर्थात् कर्मफलदाता ईश्वरकी इच्छासे। उद्धवके कहनेके अनुसार नन्द महाराज यदि श्रीकृष्णको वास्तवमें ईश्वर स्वीकार करते, तो वे 'ईश्वर-इच्छासे' नहीं कहकर 'उसकी इच्छासे' अथवा 'कृष्णकी इच्छासे' कहते। 'कर्माभि:'-प्रारब्ध कर्मफलके अनुसार। नन्द महाराज आदि नित्यसिद्ध भगवत्-परिकर शुद्धसत्त्व-विग्रह हैं, उनका कोई भी कर्मादि नहीं है, वे केवल लीलामात्र करते हैं। 'न कर्मबन्धनं जन्म वैष्णवानाञ्च विद्यते।' आदि पद्मपुराण-प्रमाणके अनुसार वैष्णवोंका कर्मफलसे जन्मादि नहीं होता, तब भगवत्-परिकर नन्द महाराजादिका कर्मफल कैसे होगा? वे श्रीकृष्णकी नरलीलाकी पुष्टिके लिये उनके परिकर हैं और लीलाशक्तिकी इच्छासे उनमें साधारण नर अभिमानके कारण वे अपनेको संसारी मनुष्य कहते हैं, इसलिये वे अपने कर्मफलकी बात कह रहे हैं॥५९-६०॥
६) व्रजसखाओंका सख्यरसमें भी श्रीकृष्णदास्य :- श्रीदामादि व्रजे यत सखार निचय। ऐश्वर्यज्ञान-हीन, केवल सख्यमय॥६१॥ कृष्णसङ्गे युद्ध करे, स्कन्धे आरोहण। ताँरा दास्यभावे करे चरण-सेवन॥६२॥
अनुवाद—श्रीदामादि व्रजमें जितने सखा हैं, वे सब ऐश्वर्यज्ञान-रहित हैं, वे केवल श्रीकृष्णको अपना सखामात्र मानते हैं। वे खेल-खेलमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध भी करते हैं, कभी उनके कन्धेपर चढ़ जाते हैं और वे दास्यभावमें उनके चरणोंकी सेवा भी करते हैं॥६१-६२॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सख्यभाव दो प्रकारके हैं—'ऐश्वर्यज्ञानयुक्त' और 'केवल' अथवा 'अमिश्र' सख्यभाव। श्रीदामादि व्रजसखाओंका 'केवल' सख्यभाव है—वे लोग श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको नहीं जानते हैं॥६१॥
श्रीमद्भागवत (१०/१५/१७)— पादसम्वाहनं चक्रु अपरे हतपाप्मानो व्यजनैः समवीजयन्॥६३॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्ण शयन कर रहे थे, तो कोई सखा उनके पाद-सम्वाहन करने लगे और कोई विशुद्ध सखाभावसे कोमल पत्तोंसे बने पंखेसे उनको हवा करने लगे॥६३॥
अनुभाष्य—तालवनमें धेनुकासुरके वधसे पहले रामकृष्णको साथ लेकर गोप-बालक परस्पर इस प्रकार क्रीड़ा कर रहे थे— हतपाप्मानः (विगतकल्मषाः) केचित् गोपबालकाः महात्मनः (भगवतः) तस्य (कृष्णस्य) पादसम्वाहनं चक्रु अपरे [गोपाः] व्यजनैः समवीजयन् (सम्यक् अवीजयन्)।
श्लोक-भावानुवाद—(जब कभी श्रीकृष्ण थककर शयन करने लगते) तब कुछ निष्पाप