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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 400

[ ६/६३-६५ ग्वाल-बाल भगवान् श्रीकृष्णके पाद सम्वाहन करने लगते और कुछ अन्य बाल-सखा बड़े-बड़े पत्तोंसे उनपर पंखा झलने लगते॥६३॥ अमृताणुकणिका—‘हतपाप्मानः'—जिनके पाप दूर हो गये हैं। इससे यह समझा जाता है—'इन सभी श्रीकृष्णके सखाओंके पहले पाप थे और वे पाप श्रीकृष्णसेवाकी बाधास्वरूप थे, किसी कारणसे उनके पाप दूर होनेसे अब उन्हें श्रीकृष्णकी इस प्रकार सेवा प्राप्त हुई है।' किन्तु श्रीकृष्णके सखा साधारण जीव नहीं हैं, इसलिये कभी भी उनको पाप स्पर्श नहीं कर सकता, वे नित्यसिद्ध भगवत्-परिकर—शुद्धसत्त्वमय विग्रह हैं। इसलिये ‘हतपाप्मानः' शब्दका उल्लिखित साधारण अर्थ उनके सम्बन्धमें प्रयोग नहीं हो सकता। उक्त शब्दका अन्य तात्पर्य है—आत्मा नित्य वस्तु और चित्-वस्तु है; पाप कभी भी उसको स्पर्श नहीं कर सकता, तथापि श्रुतिमें कहा गया है 'अयमात्मा अपहतपाप्ना-यह आत्मा पापशून्य है।' इस श्रुति वाक्यमें 'अपहतपाप्ना'-शब्दसे जैसे 'नित्य आत्माकी नित्य पापशून्यता' सूचित होती है, उसी प्रकार श्रीमद्भागवतके इस उद्धृत श्लोकके 'हतपाप्मानः'-शब्दसे भी श्रीकृष्णसखाओंका 'नित्य पापशून्यत्व' सूचित होता है। श्लोकका इस प्रकार अर्थ करनेसे और कोई भी आपत्तिका कारण नहीं रहता॥६३॥ (७) व्रजगोपियोंका मधुर रसमें भी श्रीकृष्णदास्य :- कृष्णेर प्रेयसी व्रजे यत गोपीगण। याँर पदधूलि करे उद्धव प्रार्थन॥६४॥ याँ-सबार ऊपरे कृष्णेर प्रिय नाहि आन। ताँहारा आपनाके करे दासी-अभिमान॥६५॥ अनुवाद-जिनके चरणोंकी धूलिके लिये उद्धवजी प्रार्थना करते हैं, जिनसे अधिक श्रीकृष्णको कोई प्रिय नहीं है, वे श्रीकृष्णकी प्रेयसी गोपियाँ भी स्वयंमें श्रीकृष्णकी दासी होनेका अभिमान करती हैं॥६४-६५॥ अमृताणुकणिका-श्रीकृष्णके वचन—जैसे श्रीमद्भागवत (३/४/३१)— “नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नादितः प्रभुः।” अर्थात् “उद्धव मुझसे किञ्चित्मात्र भी कम नहीं हैं, क्योंकि वे गोस्वामी हैं अर्थात् वे विषयोंके द्वारा क्षुब्ध नहीं होते।” तथा श्रीमद्भागवत (११/१४/१५)- “न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥” अर्थात् “हे उद्धव ! तुम मुझे जितने प्रिय हो-मेरे पुत्र ब्रह्मा, शङ्कर, सगे भाई बलराम, स्वयं अर्द्धाङ्गिनी लक्ष्मी और यहाँ तक मेरी अपनी आत्मा भी मुझे उतनी प्रिय नहीं है।" इन सभी श्रीकृष्णके वाक्योंसे समझा जाता है, महिमा अंशसे उद्धवजी श्रीकृष्णके तुल्य हैं और प्रियताके अंशसे भी उद्धवजीके समान कोई नहीं है, वे सर्वभक्त-शिरोमणि हैं। किन्तु परम-प्रेमवती गोपियोंके प्रेमकी महिमा ऐसी अद्भुत है कि ऐसे उद्धवजी भी अपने आपको ३५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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