श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोपियोंकी अपेक्षा अति हीन मानकर 'आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां' आदि वाक्योंके द्वारा उनके चरणोंकी धूलिकी प्रार्थना करते हैं। ऐसी प्रेमवती गोपियाँ भी स्वयंको श्रीकृष्णकी दासी मानती हैं॥६४-६५॥ श्रीमद्भागवत (१०/३१/६)— व्रजजनार्त्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित। भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय॥६६॥ अनुवाद—हे व्रजवासियोंके दुःखोंका नाश करनेवाले! हे वीर! हे अपनी मन्द-मन्द मुस्कानमात्रसे ही अपने निजजनोंमें सौभाग्यसे उत्पन्न गर्व और उसके कारण हुए वाम्य लक्षणयुक्त मानको विनष्ट कर देनेवाले! हे सखे! हम तुम्हारी दासियाँ हैं, इसलिये निश्चय ही अपनी दासियोंका भजन करो। हम अबला गोपियोंको एक बार अपने मनोहर मुखकमलका दर्शन कराकर सुखी करो॥६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे व्रजके दुःखोंके नाशक! हे स्त्रियोंके परम-नायक! हे अपनी मन्द-मुस्कानसे निजजनोंके गर्वको दूर करनेवाले! हे सखे! हम तुम्हारी दासियाँ हैं—अपने मुखकमलका हमें दर्शन कराओ॥६६॥ अनुभाष्य—रासक्रीड़ाके समय श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनका अन्वेषण करते हुए गोपियोंका यह गीत— हे व्रजजनार्त्तिहन् (कृष्णानुरागिजनविरहक्लेशविनाशन) वीर (उदारविग्रह), निजजनस्मयध्वंसनस्मित (निजजनानां रसविग्रहानां स्मयः गर्वं तं ध्वंसयति इति तथाभूतं स्मितं हास्यं यस्य तथाभूत) सखे, स्म (निश्चितं) भवत्किङ्करीः नः (अस्मान्) भज (अनुवर्त्तस्व); चारु (मनोहरं) जलरूहाननं (मुखपद्मं) च योषितां (गोपिनामस्माकं) दर्शय। श्लोक-भावानुवाद—अनुवाद द्रष्टव्य है॥६६॥ श्रीमद्भागवत (१०/४७/२१)— अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान्। क्वचिदपि स कथां नः किङ्करीणां गृणीते भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध््न्यधास्यत् कदा नु॥६७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अभी खेदका विषय यह है कि हमारे आर्यपुत्र मथुरा-नगरीमें वास कर रहे हैं। हे उद्धव! क्या वे अपने पिता नन्दबाबाके घरको और गोप-बन्धुओंको स्मरण करते हैं? क्या कभी वे हम दासियोंकी चर्चा करते हैं? आहा! क्या वे कभी अपने अगुरु जैसे सुगन्धित हस्तकमल हमारे मस्तकपर रखेंगे?॥६७॥ अनुभाष्य—व्रजमें उद्धवके आनेपर भ्रमरको लक्ष्यकर श्रीमती राधिकाकी चित्रजल्पोक्ति— हे सौम्य! अपि बत आर्यपुत्रः (नन्दनन्दनः) अधुना किं मधुपुर्यां (मथुरायाम्) आस्ते (सुखं निवसति)? सः पितृगेहान् (पितृभ्यां नन्दयशोदाभ्यां गेहैश्च सहितान्) बन्धून् (पर्जन्न्यवरीयस्युपनन्दाभिनन्द-सन्नन्द-नन्दन- रोहिणी-सानन्दानन्दिनी-कण्डव-दण्डवादीन्) गोपान् (सुबलार्जुन-गन्धर्व-वसन्त-श्रीदामसुदामोज्ज्वल-कोकिल-