भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 402

[ ६/६७-७० सनन्दन-विदग्धादीन्) च किं स्मरति? क्वचित् (कदाचित्) अपि किङ्करीणां (ललिता-विशाखा चित्रा-चम्पकलता- तुङ्गविद्येन्दुलेखा-रङ्गदेवी-सुदेवी-कलावती-शुभाङ्गदा-हिरण्याङ्गी-रत्नलेखा-शिखावती-कन्दर्पमञ्जरी-पुण्डरीका- फुल्लकलिकानङ्गमञ्जरी-सीताखण्डी-चारुचण्डी-सदण्डिका-कुण्ठिता-कलकण्ठी-वामची-मेचका-हरिद्राभा- हरिच्चेला-वितण्डिका-लीलावती-साधिका-चन्द्रिका-माधवी-विजया-नन्दा-गौरी-सुधामुखी-वृन्दा-कौमुदी-रत्नभवा- रत्नप्रभादि-दासीनां) नः (अस्माकं श्रीमतीवृषभानुकुमारीणां गान्धर्विकानां) कथां सः गृणीते (किं स्वमुखेनोच्चारयति?) कदा नु अगुरुसुगन्धं (अगुरुः सकाशादपि सुष्ठुगन्धं यस्य तादृशं) भुजं (स्वभुजं) मूर्ध्नि अधास्यत् (निधास्यति)? श्लोक-भावानुवाद-हे सौम्य ! आजकल आर्यपुत्र (श्रीनन्दनन्दन) क्या मथुरापुरीमें सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं? क्या वे अपने पिता-माताके साथ अपने गृहको और अपने बन्धुओं-पर्जन्यबाबा, उपनन्द, अभिनन्द, सत्रन्द, नन्दन, रोहिणी, सानन्द, आनन्दिनी, कण्डव, दण्डवादि तथा अपने गोपसखाओं-सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, श्रीदाम, सुदाम, उज्ज्वल, कोकिल, सनन्दन, विदग्धादिको स्मरण करते हैं? कभी भी वे अपनी दासियों-ललिता, विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रङ्गदेवी, सुदेवी, कलावती, शुभाङ्गदा, हिरण्याङ्गी, रत्नलेखा, शिखावती, कन्दर्पमञ्जरी, फुल्लकल्लिका, अनङ्गमञ्जरी, पुण्डरीका, सीताखण्डी, चारुचण्डी, सदण्डिका, कुण्ठिता, कलकण्ठी, वामची, मेचका, हरिद्राभा, हरिच्चेला, वितण्डिका, लीलावती, साधिका, चन्द्रिका, माधवी, विजया, नन्दा, गौरी, सुधामुखी, वृन्दा, कौमुदी, रत्नभवा, रत्नप्रभादि और मेरी चर्चा कभी अपने मुखकमलसे करते हैं? क्या वे कभी अपने अगुरु जैसे सुगन्धित हस्तकमल हमारे मस्तकपर रखेंगे? ॥६७॥ (८) यहाँ तक कि, साक्षात् श्रीराधाका भी श्रीकृष्णदास्य :- ताँ-सबार कथा रहु, - श्रीमती राधिका। सबा हैते सकलांशे परम-अधिका ॥ ६८ ॥ तेँहो याँर दासी हैञा सेवेन चरण। याँर प्रेमगुणे कृष्ण बद्ध अनुक्षण ॥ ६९ ॥ अनुवाद-अन्य सबकी बातें रहने दो, श्रीमती राधिका, जो सभी गोपियोंमें सब प्रकारसे सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनके प्रेम और गुणोंसे श्रीकृष्ण सदा-सर्वदा बँधे हुए हैं, वे भी प्रेमके अद्भुत स्वभाववशतः श्रीकृष्णकी दासी होकर उनके चरणोंकी सेवा करती हैं ॥ ६८-६९ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/३०/४०)- हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज। दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥ ७० ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हा नाथ! हा रमण! हा प्रियतम! हा महाबाहो! मैं आपकी अतिदीना दासी हूँ, मुझे अपने समीप ले लो ॥ ७० ॥ अनुभाष्य-रासक्रीड़ाके समय अन्य गोपियोंका परित्यागकर श्रीकृष्ण केवल श्रीमती राधिकाके साथ अन्तर्धान हो गये। दूसरी गोपियाँको श्रीकृष्ण-विरहमें विलाप करते हुए देखकर अभिमान प्रदर्शित करते हुए श्रीमती राधिकाने आदेश दिया कि मैं अब और नहीं चल सकती हूँ, ३६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत