श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/७०-७३ ] इसलिये मुझे कन्धेपर उठाकर ले चलो। तब श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेके कारण श्रीमती राधिकाकी विलापोक्ति— हा नाथ, रमण, प्रेष्ठ (सर्वोत्तम), क्वासि [त्वं] क्वासि ? हे सखे, कृपणायाः (तब विरहकातरायाः दीनायाः) ते (तव) दास्याः मे (मम) सन्निधिं (निजसन्निधानं) दर्शय (अवलोकय)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७०॥ (९) महिषियोंका भी श्रीकृष्णदास्य :- द्वारकाते रुक्मिण्यादि यतेक महिषी। ताँहाराओ आपनाके माने कृष्णदासी ॥७१॥ अनुवाद—द्वारकामें रुक्मिणी आदि जितनी महिषियाँ हैं, वे भी स्वयंको श्रीकृष्णकी दासी मानती हैं॥७१॥ श्रीमद्भागवत (१०/८३/११)— तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया। सख्योपेत्योग्रहीत् पाणिं साहं तद्गृह्मार्जनी ॥७२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं तो श्रीकृष्णके चरणस्पर्शकी लालसासे तपस्या कर रही थी, कृपापूर्वक श्रीकृष्णने अपने सखा (अर्जुन) के साथ आकर मेरा पाणिग्रहण किया। तबसे मैं उनके गृहका मार्जन करनेवाली दासी बन गयी हूँ॥७२॥ अनुभाष्य—स्यमन्तपञ्चकमें यादव और कौरव-स्त्रियाँ एकत्रित होकर परस्पर श्रीकृष्णकथा करने लगीं, तब श्रीकृष्णकी महिषी कालिन्दीने द्रौपदीसे कहा— स्वपादस्पर्शनाशया (स्वस्य श्रीकृष्णस्य पादस्पर्शनस्य आशा, तया) तपश्चरन्तीं मा (माम्) आज्ञाय (ज्ञात्वा) सः कृष्णः सख्या (अर्जुनेन) सह उपेत्य (समीपमागत्य) पाणिम् अग्रहीत्; सा अहं तत् (तस्य) गृहमार्जनी दासी। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ श्रीमद्भागवत (१०/८३/३९)— आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृहदासिकाः। सर्वसङ्गनिवृत्त्याद्धा तपसा च बभूविम ॥७३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हमलोगोंने सबका सङ्ग त्यागकर कैसी-कैसी तपस्याके द्वारा इन आत्माराम पुरुष (श्रीकृष्ण) के गृहमें दासीके पदको प्राप्त किया है॥७३॥ अनुभाष्य—उसी समय उसी प्रसङ्गमें लक्ष्मणाने द्रौपदीसे कहा— इमाः वयं (महिष्यः) सर्वसङ्गनिवृत्या (सर्वेषु सुखवित्तपुत्रादिषु वा समोक्षचतुर्वर्गादिषु वा सङ्ग तस्य निवृत्या उपेक्षया) तपसा (दासीवृत्त्या) आत्मारामस्य तस्य (कृष्णस्य) अद्धा (साक्षात्) गृहदासिकाः बभूविम (आस्महि)। श्लोक-भावानुवाद—हम (महिषियाँ) सभी प्रकारके सुखों, धन-सम्पत्ति, पुत्रादि और यहाँतक चार प्रकारकी मुक्तियोंकी उपेक्षाकर दासीवृत्तिका अवलम्बनकर इन आत्माराम (श्रीकृष्ण) की साक्षात् गृहदासिका हुई हैं॥७३॥ छठा अध्याय | ३६१