भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

[ ६/७४-७५ १०) स्वयंप्रकाश श्रीबलरामका भी श्रीकृष्णदास्य :- आनेर कि कथा, बलदेव महाशय। याँर भाव—शुद्धसख्य-वात्सल्यादिमय ॥७४॥ तेंहो आपनाके करेन दास-भावना। कृष्णदास-भाव बिनु आछे कोन जना॥७५॥ अनुवाद—औरोंकी बात ही क्या, श्रीबलदेव प्रभु जिनका श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध सख्य-वात्सल्यमय भाव है, वे भी अपनेको उनके दासके रूपमें मानते हैं। श्रीकृष्णदास भावके बिना कौन व्यक्ति हो सकता है?॥७४-७५॥ अनुभाष्य—श्रीबलदेव प्रभुने श्रीकृष्णसे पहले जन्मग्रहण किया था और बड़े भाई होनेके नाते वे पूजनीय हैं। परन्तु वे स्वयंको अपने अनुज श्रीकृष्णका सेवक मानते हैं। महावैकुण्ठमें इन स्वयंप्रकाश-श्रीबलदेव प्रभुके ही चतुर्व्यूहात्मक प्रकोष्ठ हैं—यही सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका परम ऐश्वर्य है। मर्यादामार्गमें इस प्रकार सर्वोच्च पदवी भी श्रीकृष्णकी सेवकवृत्तिमें अवस्थित है। इसलिये गोलोक-वैकुण्ठ और असंख्य ब्रह्माण्डोंमें कोई भी वास्तवमें श्रीकृष्णका भोग करनेमें अथवा उन्हें अपना दास बनानेमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य सभीमें श्रीकृष्णके प्रति जितने परिमाणमें सेवाप्रवृत्ति है, उसी परिमाणमें ही वे दूसरोंसे श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णदास्य परित्यागकर जो प्राणी जितने परिमाणमें उनसे विमुख हुए हैं, उतने परिमाणमें उन्होंने (माया-बन्धनरूप) अमङ्गलका आह्वान किया है। जड़जगत्में श्रीकृष्णको भोग करनेकी प्रवृत्ति अथवा श्रीकृष्णको अपने समान मानकर उनकी भाँति भोग करनेकी प्रवृत्ति अभक्तोंका मूलमन्त्र होनेपर भी स्वरूपतः सभी श्रीकृष्णाश्रित लोग ही सदा भगवत्सेवामें नियुक्त हैं। श्रीकृष्णसेवा-विमुखता ही जीवोंको (जीवित अवस्थामें ही) मृतके समान ही बना देती है। जब श्रीकृष्णज्ञानका उदय होता है, उसी समय न्यूनाधिक श्रीकृष्णदास्यवृत्ति जीवमात्रमें लक्षित होती है॥७५॥ अमृतानुकणिका—५४ से ७० संख्यामें व्रज परिकरोंका तथा ७१ से ७३ संख्यामें द्वारकाके परिकरोंका दास्यभाव दिखाया। अब व्रज और द्वारका, दोनोंके परिकर श्रीबलदेव प्रभुके दास्यभावकी कथा कह रहे हैं। श्रीरुक्मिणी आदि महिषियाँ श्रीकृष्णकी पत्नियाँ हैं और पतिकी सेवा करना पत्नीका एकान्त कर्त्तव्य है, इसलिये उनके हृदयमें श्रीकृष्णकी दासी होनेका अभिमान अस्वाभाविक नहीं है। किन्तु श्रीबलदेवमें श्रीकृष्णके ज्येष्ठ भ्राता होनेका अभिमान है और उनकी श्रीकृष्णके प्रति प्रीति ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित भी नहीं है। वे शुद्ध-वात्सल्य और शुद्ध-सख्य भावसे ही श्रीकृष्णको प्रीति करते हैं। श्रीबलदेव भी जब स्वयंको श्रीकृष्णका दास मानते हैं, तब श्रीकृष्णके प्रति जिनका भाव ऐश्वर्यज्ञानमय है, वे स्वयंको श्रीकृष्णका दास मानेंगे, इसमें क्या आश्चर्य है? ब्रह्म-विमोहन लीलामें श्रीबलदेव प्रभुके दास्यभावका प्रमाण भागवतके (१०/१३/३७) श्लोकमें दृष्ट होता है—'प्रायो मायास्तु मे भर्तुः'—मेरे प्रभु श्रीकृष्णकी ही यह माया है। इस वाक्यमें 'भर्तुः' शब्दके द्वारा सूचित होता है कि वे श्रीकृष्णको अपना प्रभु कहकर स्वयंको उनका दास ही मान रहे हैं॥७४-७५॥ ३६२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत