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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

६/७०-७३ ] इसलिये मुझे कन्धेपर उठाकर ले चलो। तब श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेके कारण श्रीमती राधिकाकी विलापोक्ति— हा नाथ, रमण, प्रेष्ठ (सर्वोत्तम), क्वासि [त्वं] क्वासि ? हे सखे, कृपणायाः (तब विरहकातरायाः दीनायाः) ते (तव) दास्याः मे (मम) सन्निधिं (निजसन्निधानं) दर्शय (अवलोकय)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७०॥ (९) महिषियोंका भी श्रीकृष्णदास्य :- द्वारकाते रुक्मिण्यादि यतेक महिषी। ताँहाराओ आपनाके माने कृष्णदासी ॥७१॥ अनुवाद—द्वारकामें रुक्मिणी आदि जितनी महिषियाँ हैं, वे भी स्वयंको श्रीकृष्णकी दासी मानती हैं॥७१॥ श्रीमद्भागवत (१०/८३/११)— तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया। सख्योपेत्योग्रहीत् पाणिं साहं तद्गृह्मार्जनी ॥७२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं तो श्रीकृष्णके चरणस्पर्शकी लालसासे तपस्या कर रही थी, कृपापूर्वक श्रीकृष्णने अपने सखा (अर्जुन) के साथ आकर मेरा पाणिग्रहण किया। तबसे मैं उनके गृहका मार्जन करनेवाली दासी बन गयी हूँ॥७२॥ अनुभाष्य—स्यमन्तपञ्चकमें यादव और कौरव-स्त्रियाँ एकत्रित होकर परस्पर श्रीकृष्णकथा करने लगीं, तब श्रीकृष्णकी महिषी कालिन्दीने द्रौपदीसे कहा— स्वपादस्पर्शनाशया (स्वस्य श्रीकृष्णस्य पादस्पर्शनस्य आशा, तया) तपश्चरन्तीं मा (माम्) आज्ञाय (ज्ञात्वा) सः कृष्णः सख्या (अर्जुनेन) सह उपेत्य (समीपमागत्य) पाणिम् अग्रहीत्; सा अहं तत् (तस्य) गृहमार्जनी दासी। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ श्रीमद्भागवत (१०/८३/३९)— आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृहदासिकाः। सर्वसङ्गनिवृत्त्याद्धा तपसा च बभूविम ॥७३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हमलोगोंने सबका सङ्ग त्यागकर कैसी-कैसी तपस्याके द्वारा इन आत्माराम पुरुष (श्रीकृष्ण) के गृहमें दासीके पदको प्राप्त किया है॥७३॥ अनुभाष्य—उसी समय उसी प्रसङ्गमें लक्ष्मणाने द्रौपदीसे कहा— इमाः वयं (महिष्यः) सर्वसङ्गनिवृत्या (सर्वेषु सुखवित्तपुत्रादिषु वा समोक्षचतुर्वर्गादिषु वा सङ्ग तस्य निवृत्या उपेक्षया) तपसा (दासीवृत्त्या) आत्मारामस्य तस्य (कृष्णस्य) अद्धा (साक्षात्) गृहदासिकाः बभूविम (आस्महि)। श्लोक-भावानुवाद—हम (महिषियाँ) सभी प्रकारके सुखों, धन-सम्पत्ति, पुत्रादि और यहाँतक चार प्रकारकी मुक्तियोंकी उपेक्षाकर दासीवृत्तिका अवलम्बनकर इन आत्माराम (श्रीकृष्ण) की साक्षात् गृहदासिका हुई हैं॥७३॥ छठा अध्याय | ३६१

[ ६/७४-७५ १०) स्वयंप्रकाश श्रीबलरामका भी श्रीकृष्णदास्य :- आनेर कि कथा, बलदेव महाशय। याँर भाव—शुद्धसख्य-वात्सल्यादिमय ॥७४॥ तेंहो आपनाके करेन दास-भावना। कृष्णदास-भाव बिनु आछे कोन जना॥७५॥ अनुवाद—औरोंकी बात ही क्या, श्रीबलदेव प्रभु जिनका श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध सख्य-वात्सल्यमय भाव है, वे भी अपनेको उनके दासके रूपमें मानते हैं। श्रीकृष्णदास भावके बिना कौन व्यक्ति हो सकता है?॥७४-७५॥ अनुभाष्य—श्रीबलदेव प्रभुने श्रीकृष्णसे पहले जन्मग्रहण किया था और बड़े भाई होनेके नाते वे पूजनीय हैं। परन्तु वे स्वयंको अपने अनुज श्रीकृष्णका सेवक मानते हैं। महावैकुण्ठमें इन स्वयंप्रकाश-श्रीबलदेव प्रभुके ही चतुर्व्यूहात्मक प्रकोष्ठ हैं—यही सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका परम ऐश्वर्य है। मर्यादामार्गमें इस प्रकार सर्वोच्च पदवी भी श्रीकृष्णकी सेवकवृत्तिमें अवस्थित है। इसलिये गोलोक-वैकुण्ठ और असंख्य ब्रह्माण्डोंमें कोई भी वास्तवमें श्रीकृष्णका भोग करनेमें अथवा उन्हें अपना दास बनानेमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य सभीमें श्रीकृष्णके प्रति जितने परिमाणमें सेवाप्रवृत्ति है, उसी परिमाणमें ही वे दूसरोंसे श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णदास्य परित्यागकर जो प्राणी जितने परिमाणमें उनसे विमुख हुए हैं, उतने परिमाणमें उन्होंने (माया-बन्धनरूप) अमङ्गलका आह्वान किया है। जड़जगत्में श्रीकृष्णको भोग करनेकी प्रवृत्ति अथवा श्रीकृष्णको अपने समान मानकर उनकी भाँति भोग करनेकी प्रवृत्ति अभक्तोंका मूलमन्त्र होनेपर भी स्वरूपतः सभी श्रीकृष्णाश्रित लोग ही सदा भगवत्सेवामें नियुक्त हैं। श्रीकृष्णसेवा-विमुखता ही जीवोंको (जीवित अवस्थामें ही) मृतके समान ही बना देती है। जब श्रीकृष्णज्ञानका उदय होता है, उसी समय न्यूनाधिक श्रीकृष्णदास्यवृत्ति जीवमात्रमें लक्षित होती है॥७५॥ अमृतानुकणिका—५४ से ७० संख्यामें व्रज परिकरोंका तथा ७१ से ७३ संख्यामें द्वारकाके परिकरोंका दास्यभाव दिखाया। अब व्रज और द्वारका, दोनोंके परिकर श्रीबलदेव प्रभुके दास्यभावकी कथा कह रहे हैं। श्रीरुक्मिणी आदि महिषियाँ श्रीकृष्णकी पत्नियाँ हैं और पतिकी सेवा करना पत्नीका एकान्त कर्त्तव्य है, इसलिये उनके हृदयमें श्रीकृष्णकी दासी होनेका अभिमान अस्वाभाविक नहीं है। किन्तु श्रीबलदेवमें श्रीकृष्णके ज्येष्ठ भ्राता होनेका अभिमान है और उनकी श्रीकृष्णके प्रति प्रीति ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित भी नहीं है। वे शुद्ध-वात्सल्य और शुद्ध-सख्य भावसे ही श्रीकृष्णको प्रीति करते हैं। श्रीबलदेव भी जब स्वयंको श्रीकृष्णका दास मानते हैं, तब श्रीकृष्णके प्रति जिनका भाव ऐश्वर्यज्ञानमय है, वे स्वयंको श्रीकृष्णका दास मानेंगे, इसमें क्या आश्चर्य है? ब्रह्म-विमोहन लीलामें श्रीबलदेव प्रभुके दास्यभावका प्रमाण भागवतके (१०/१३/३७) श्लोकमें दृष्ट होता है—'प्रायो मायास्तु मे भर्तुः'—मेरे प्रभु श्रीकृष्णकी ही यह माया है। इस वाक्यमें 'भर्तुः' शब्दके द्वारा सूचित होता है कि वे श्रीकृष्णको अपना प्रभु कहकर स्वयंको उनका दास ही मान रहे हैं॥७४-७५॥ ३६२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/७६-७९ ] ११) शेषरूपी अनन्तका दस देहोंसे श्रीकृष्णदास्य :- सहस्रवदने यँहो शेष-सङ्कर्षण। दश देह धरि' करे कृष्णेर सेवन ॥७६॥ अनुवाद—हजारों मुखोंवाले शेष, जिन्हें सङ्कर्षण भी कहते हैं, वे दस रूप धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं॥७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, आभूषण, आराम, आवास, यज्ञसूत्र और सिंहासन—ये दस प्रकारके शरीर हैं॥७६॥ १२) शिवका श्रीकृष्णदास्य :- अनन्त ब्रह्माण्डे रुद्र-सदाशिवेर अंश। गुणावतार तैंहो, सर्वदेव-अवतंस ॥७७॥ तैंहो करेन कृष्णेर दास्य-प्रत्याश। निरन्तर कहे शिव, 'मुञि कृष्णदास' ॥७८॥ कृष्णप्रेमे उन्मत्त, विह्वल दिगम्बर। कृष्ण-गुण-लीला गाय, नाचे निरन्तर ॥७९॥ अनुवाद—अनन्त ब्रह्माण्डोंमें विराजमान जो रुद्र हैं, वे सभी सदाशिवके अंश हैं। वे गुणावतार और सभी देवोंके शिरोमणि हैं। वे भी श्रीकृष्णदास्यकी अभिलाषा रखते हैं और सदा कहते हैं—'मैं श्रीकृष्णका दास हूँ।' वे श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त और विह्वल होकर दिगम्बर वेशमें श्रीकृष्णके गुण और लीलाओंका निरन्तर गान करते हुए नाचते रहते हैं॥७७-७९॥ अनुभाष्य—(रुद्र और सदाशिव)—लघुभागवतामृतमें गुणावतार वर्णनप्रसङ्गमें (१८-२४) श्लोक। रुद्र— “एकादशव्यूहस्तथाष्टतनुरप्यसौ। प्रायः पञ्चाननस्त्र्यक्षो दशबाहुरुदीर्यते॥ क्वचिज्जीवविशेषत्वं हरस्योक्तं विधेरिव। तत्तु शेषवदेवास्तां तदंशत्वेन कीर्त्तनात्॥ हरः पुरुषधामत्वान्निर्गुणप्राय एव सः। विकारवानिह तमियोगात् सर्वैः प्रतीयते॥” यथा श्रीदशमे (१०/८८/३)— “शिवः शक्तियुतः शश्वत् त्रिलिङ्गो गुणसंवृत॥” यथा ब्रह्मसंहितायां (५/४५)— “क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात्, सञ्जायते न तु ततः पृथगस्ति हेतोः। यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद्, गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि॥” “विधेर्ललाटाज्जन्मास्य कदाचित् कमलापतेः। कालाग्निरुद्रः कल्पान्ते भवेत् सङ्कर्षणादपि॥ सदाशिवाख्या तन्मूर्त्तिस्तमोगन्धविवर्जिता। सर्वकारणभूतासावङ्गभूता स्वयं प्रभोः। वायव्यादिषु सैवेयं शिवलोके प्रदर्शिता॥” तथा च ब्रह्मसंहितायाम् आदिशिव-कथने—(५/८)— छठा अध्याय | ३६३

[ ६/७७-७९ “नियतिः सा रमादेवी तत्प्रिया तद्वशं तदा। तल्लिङ्गं भगवान् शम्भुर्ज्योतीरूपः सनातनः। या योनिः सा पराशक्तिः” इत्यादि। श्रीरुद्रके एकादश व्यूह—अजैकपात्, अहिर्ब्रध्न, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, देवश्रेष्ठ त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित; और इन विस्तारोंके अतिरिक्त उनके आठ रूप (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और सोमयाजी) हैं। इसमेंसे प्राय सभी रुद्र ही पाँच मुख, तीन नेत्र और दस भुजाओंवाले हैं। कहीं-कहीं रुद्रको भी ब्रह्माकी भाँति ‘जीवविशेष’ कहा गया है। भगवत्-अंश कहनेपर ‘शेष’ की भाँति इनकी भी मीमांसा करनी होगी अर्थात् स्वांश शिव ईश्वर-श्रेणीमें आते हैं और संहारक रुद्र विभिन्नांश जीव हैं। भगवदावतार ‘हर’ पुरुषात्मस्वरूप कहे जाते हैं और वे वस्तुतः निर्गुण होकर भी तमोगुणके योगसे तत्त्वको ना जाननेवाले साधारण लोगोंको आपाततः विकारीकी भाँति प्रतीत होते हैं। जैसे दशम स्कन्धमें कहा गया है—“रुद्र निरन्तर गुणसाम्यावस्थरूप प्रकृतिसे युक्त हैं, गुणोंमें क्षोभ होनेके बाद वे तीन गुणोंसे युक्त और दूरसे तीन गुणोंसे संवृत होते हैं।” जैसे ब्रह्मसंहितामें—“जिस प्रकार दूध विकारविशेषके योगसे दहीके रूपमें परिणत होता है, किन्तु वह दही अपने कारण दूधसे कभी भी पृथक् वस्तु नहीं है, वैसे ही जो संहारकार्यके लिये रुद्ररूपमें अवतीर्ण होते हैं, मैं उन आदिपुरुष गोविन्दका भजन करता हूँ।” किसी कल्पमें ब्रह्माके ललाटसे अथवा किसी कल्पमें विष्णुके ललाटसे रुद्रकी उत्पत्ति होती है। कल्पके अन्तमें सङ्कर्षणसे भी कालाग्नि रुद्रका जन्म होता है। वायुपुराणादिमें वैकुण्ठस्थित शिवलोकको सर्वकारणस्वरूप कहा गया है और वहाँ तमोगुण-सम्बन्धरहित जो ‘सदाशिव’-नामक शिवमूर्ति प्रदर्शित हुई है, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके विलास हैं। जैसे ब्रह्मसंहितामें आदिशिव-कथनमें वर्णन हुआ है—“चित्-शक्तिरूपा रमादेवी ही नियतिरूपा हैं और वे जिन भगवान्‌की प्रिया और वशीभूता हैं, उन स्वयंरूपके एक अङ्गविशेष सनातन चैतन्यविग्रह भगवान् शम्भु हैं। उनकी सङ्गिनी महामाया अर्थात् योनि रमादेवीका विस्तार हैं और वे महदादि-तत्त्वका उत्पत्ति स्थान हैं तथा अपरा अर्थात् त्रिगुणमयी शक्ति हैं।” आदि श्रीबलदेव विद्याभूषण :- वाक्यविशेषलाभात् रुद्रस्यापि द्वैविध्यं प्रतिपादयितुमाह—श्रीति। ‘सत्त्वं रजः’ इत्यादि (भाः १/२/२३) वाक्ये य ईश्वरकोटिरुक्तः, तं तावदाह—रुद्र एकादशव्यूह इति। अत्र भारतवाक्यम्—“अजैकपादहिर्ब्रध्नो विरूपाक्षोऽथ रैवतः। हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः। सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः॥” इत्येतत्। तथाष्टतनुरिति—“पृथिवीं सलिलं तेजो वायुराकाशमेव च। सूर्यचन्द्रमसौ सोमयाजी चेत्यष्टमूर्त्तयः॥” इति यादवः। प्रायः इति—जलावरणस्थ-रुद्रस्यैकमुखत्ववीक्षणात्। अथ जीवकोटित्वं तस्याह—क्वचिदिति। “यं कामये तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्” इत्यादिकमृक्श्रुतौ; “अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत—प्रजाः सृजेय” इत्यारभ्य, “नारायणाद् ब्रह्मा जायते, नारायणाद् रुद्रो जायते, नारायणात् प्रजापतिर्जायते, नारायणादिन्द्रो जायते, नारायणोऽष्टौ वसवो (जायन्ते), नारायणादेकादश-रुद्रा (जायन्ते) नारायणाद्द्वादशादित्याः” (नाः उः १) इत्यादिकं नारायणोपनिषदि। “एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा न ईशानः” इत्युपक्रम्य, “तस्य ध्यानान्तस्थस्य ललाटात् त्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषोऽजायत विभ्रच्छ्रि ३६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/७७-७९ ] सृजामि वै। तौ हि मां न विजानीतो मम मायाविमोहितौ ॥” इति मोक्षधर्मे च। एभिर्वाक्यैर्जन्मोक्तेः हरस्य जीवत्वम्। अतः प्रलयश्च “ब्रह्मा शम्भुस्तथैवार्कश्चन्द्रमाश्च शतक्रतुः। एवमद्यस्तथैवान्ये युक्ता वैष्णवतेजसा॥ जगत्कार्यावसाने तु वियुज्यन्ते च तेजसा। वितेजसश्च ते सर्वे पञ्चत्वमुपयान्ति वै॥” इति विष्णुधर्मे। “एको ह” इत्यादिश्रुतौ च। अन्यथा एतानि कुप्येयुः। दृष्टान्तोऽत्र-विधिरिवेति। शेषवदिति-शार्ङ्गिणः शय्यारूपस्तदाधारशक्तिः शेष ईश्वरकोटिः भूधारी तु तदाविष्टो जीवः। तदंशत्वेनेति-तत्स्वांशत्वेन तद्विभिन्नांशत्वेन च पुराणेष्वभिधानादित्यर्थः। यस्तु “सत्त्वं रजस्तमः” इति पद्ये परस्य पुरुषस्याविर्भावो हरः पठितः, स खलु पुरुषधामत्वात्-तदात्मभूतत्वात् निर्गुण एव। प्राय इति-स्वेच्छागृहीतेन तमसा आवृत्तत्वात्। अतएव, सर्वैः-अतत्त्वविद्भिः; विकारवान्, इह-गुणावतारेषु प्रतीयते; वस्तुतस्तु अविकारी स इत्यर्थः। तमोगोगाद्विकारवान् प्रतीयते, इत्यत्र प्रमाणमाह,-शिवः शक्तीति। शिवः-रुद्रः, शश्वत्-सर्वदा, शक्त्या-स्वेच्छागृहीतया गुणसाम्यावस्थया प्रकृत्या युतः; गुणक्षोभे सति त्रिलिङ्गः-गुणत्रययुक्तः, प्रकटैश्च सद्भिस्तैर्गुणैर्दुस्तैः संवृतश्वेति। ननु तमःसंवृतत्वं तस्य ख्यातं, त्रिलिङ्गत्वमिह कथमुक्तमिति चेत्? उच्यते-त्रयाणां गुणानां मिथः संपृक्तत्वात् सत्त्वरजसी च तत्र स्यातामेवेत्यविरोधः। एतच्च वाक्यं लोकप्रतीत्यनुवादरूपं बोध्यम्। पुरुषधामत्वात् निर्गुणत्वं तमोगोगात् विकारवत्त्वभणितिः, इत्यत्र प्रमाणं-क्षीरं यथेति। विकारविशेषयोगात् क्षीरं यथा दधि सञ्जायते, ततः-क्षीरात् हेतोः दधि, पृथक्-भिन्नं, न अस्ति-न भवति, तथा, यः-गोविन्दः, तमोगोगात्-स्वेच्छागृहीत-तमः-सम्बन्धात्, शम्भुर्भवति; न तु गोविन्दात् शम्भुरन्य इत्यर्थः। तथा च विकारस्यागन्तुकत्वात् स्वरूपे न तत्प्रसङ्ग इति। रुद्रस्याविर्भावस्थानान्याह-विधेरिति। विधेर्ललाटादिति शतपथादौ दृष्टं, कमलापतेर्ललाटादिति महोपनिषदि (मः उः २), पुराणेषु च; तदिदं कल्पभेदात् सम्भाव्यम्। कालाग्निरुद्र इति-“पातालतलमाराभ्य सङ्कर्षणमुखानलः” (भाः ११/३/१०) इत्याैकादशोक्तेर्बोध्यम्। यत्तु कृष्णः स्वयंप्रभुः, नारायणादयस्तद्विलास-स्वांशाः, तथा आवाेशाश्च केचित्, तत्स्वांशात् गर्भोदशयात् ब्रह्म-विष्णु-रुद्राः, तेषामीशत्वम्, कदाचित् ब्रह्म-रुद्रयोर्जीवत्वञ्च, इति वचनालाभात् शास्त्रकृता निर्णीतं, न तत् चतुरस्रं; किन्तु सदाशिवो मूलं तत्त्वं स्वयंपदाभिमतं, तदेव नारायणादिरूपम्, अतः ब्रह्मादयस्त्रयस्तस्यैव कार्यभूताः-“अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तरूपं शिवं प्रशान्तममृतं ब्रह्मयोनिम्। तमादिमध्यान्तविहीनमेकं विभुं चिदानन्दरूपमद्भुतम्॥ उमासहायं परमेश्वरं प्रभु त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्। ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयानिं समस्त साक्षिं तमसः परस्तात्॥ स ब्रह्म स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्। स एव विष्णुः स प्राणः स कालाग्निः स चन्द्रमाः। स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं चराचरम्। ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये॥” (कैः उः ६-९) इति कैवल्योपनिषदि श्रवणात्। तस्मादयं पक्षो वरीयान्, श्रौतत्वादिति चेत्? तत्राह-सदेति। सा मूर्त्तिः स्वयं प्रभोः-कृष्णस्य अङ्गभूता, नारायणस्तद्विलास इत्यर्थः। अतएव तैत्तिरीयाः शिवम्युच्यतं नारायणमित्येकार्थेन पठन्ति। श्रुतौ, उमा-कीर्त्तिः तत्सहायं, त्रिलोचनं-त्रिकालज्ञं, नीलकण्ठं-नीलमणिभूषितकण्ठम्, इति व्याख्येयं-प्रतीसार्थानां तस्मिन् शिवे अस्वीकारात्। वायव्यादिष्विति। शिवलोके-वैकुण्ठधाम्नि। “अण्डौघस्य समन्तां तु” इत्यादिभिर्वायवीयवाक्यै-र्निरूपितोऽयं सदाशिवस्तल्लोकश्च सन्दर्भकृद्भिः। स्वयंरूपस्य कृष्णस्यैव मूर्त्तिः सदाशिव इत्यत्र निर्णायकं वाक्यमाह-नियतिः सेति। आदि-पदेनेदं ग्राहं-“कामो बीजं महद्भरेः। लिङ्गयोन्यात्मिका जाता इमा माहेश्वरीः प्रजाः॥ शक्तिमान् पुरुषः सोऽयं लिङ्गरूपी महेश्वरः। तस्मिन्नाविर्बभूल्लिङ्गे महाविष्णुर्जगत्पतिः॥” (ब्रः संः ५/८-१०) इति। अस्यार्थः-पूर्वं रमया रमणमुक्तं, रमा सा कीदृशी? इत्याह-नियतिरिति-नियम्यते नियता भवति रमणे तस्मिन्निति तदनपायिनी तत्स्वरूपभूतेति यावत्। अत उक्तं-“तत्प्रिया तद्वशंवदा” इति, “न विष्णुना बिना देवी, नि विष्णुः पद्द्मजां बिना” इति हयशीर्ष-पञ्चरात्रात्, “नित्यैव सा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी” (विः पुः १/८/१५) इति वैष्णवाच्च। तस्य स्वयंरूपस्य भगवान् शम्भुः, लिङ्गं-चिह्नं भवति, “लिङ्गं चिह्नेऽनुमाने च” इति विश्वः। भगवान्-षडैश्वर्यविशिष्टः छठा अध्याय | ३६५

परव्योमाधीशः । शं भावयति स्व-द्वितीयव्यूह-सङ्कर्षणात्पना प्रकृतिविलीनानां जीवानां तत्तदुपाधि-सृष्टयेति शम्भुः, ज्योतीरूपः- चैतन्यविग्रहः। अनेन तदधीशत्वेन कृष्णस्य स्वयंव्रूपत्वं परिचीयते, सास्नादिनेव गोर्गोत्त्वम्। यस्यासौ विलासः स स्वयम्, इत्यतस्तस्य स लिङ्गमुच्यते। या खलु योनिः-महदाद्युपादानभूता, सा त्वपराशक्तिः-त्रिगुणेत्यर्थः। हरेः-तदंशस्य, सङ्कर्षणस्य, कामः-तद्दिदृक्षा-लक्षणः, महदादिसृष्टिफलको भवति, ततो बीजं महदिति। महत् अपरिमितं जीवतत्त्वं, तस्यामाहितं भवति। अत इमा माहेश्वर्यः प्रजा लिङ्ग-योन्यात्मिकाः-पुरुष-प्रकृतिकारणिका जाताः कथ्यन्ते। प्रकृतेरूपसर्जनत्वेन तदधीनत्वात् माहेश्वरी-रिति प्रजा-नाम, इत्युपपादयति शक्तिमानित्यर्द्धकेन। अथोक्तार्थमेव स्फुटयति-तस्मिन्नित। लिङ्गे-तदधीशे, तत्सन्निधौ। महाविष्णुः-सङ्कर्षणः। अर्थात् श्रीबलदेव विद्याभूषण- "शास्त्रवाक्यको ठीकसे समझनेके लिये श्रीरुद्रका ईश्वरश्रेणी और जीवश्रेणी, इन दो प्रकारसे प्रतिपादन करनेके लिये 'श्री' आदि कहा गया है। 'सत्त्वं रजः' (भाः १/२/२३) आदि वाक्योंमें “एक परम पुरुष (श्रीकृष्ण) प्रकृतिके सत्त्व, रजः और तमः, इन तीन गुणोंसे युक्त होकर क्रमशः हरि, ब्रह्मा और हर कहलाते हैं।" इसमें जो 'ईश्वरश्रेणी रुद्र' के सम्बन्धमें कहा गया है, उनके विषयमें 'रुद्र एकादशव्यूह' आदि कहा गया है। इस विषयमें महाभारतमें एकादश व्यूहका इस प्रकार वर्णन है- अजैकपात्, अहिब्रध्न, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित। इसी प्रकार उनके आठ शरीर-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और सोमयाजी हैं। 'प्राय रुद्रके पाँच मुख होते हैं'- ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि जलावरणमें स्थित रुद्र एकमुख हैं। रुद्रको जीवश्रेणीमें भी कहा गया है। ऋक्-श्रुतिमें भगवद्वाक्य - "मैं जिसको इच्छा करता हूँ, उसको उग्र (रुद्र) करता हूँ, उसको ब्रह्मा, उसको ऋषि, उसको बुद्धिमान् करता हूँ।" श्रीनारायणोपनिषदमें- "उसके बाद परमपुरुष श्रीनारायणने प्रजासृष्टिकी इच्छा की। तत्पश्चात् नारायणसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, नारायणसे रुद्र उत्पन्न हुए, नारायणसे प्रजापति, इन्द्र, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य उत्पन्न हुए।" महोपनिषदमें- "पहले एकमात्र नारायण ही थे, ब्रह्मा नहीं थे और रुद्र भी नहीं थे। उसी ध्यानमें अवस्थित नारायणके ललाटसे तीन नेत्रोंसे युक्त, हाथमें त्रिशूल लिये हुए, श्री-सत्य-ब्रह्मचर्य-तपस्या-वैराग्य धारण किये हुए पुरुष उत्पन्न हुए।" मोक्षधर्ममें - "प्रजापतिकी और रुद्रकी मैंने ही सृष्टि की। किन्तु वे लोग मेरी मायासे मोहित होकर मुझे जान नहीं सकते।" इन सब वाक्योंमें जन्मसूचक उक्तिके द्वारा रुद्रका जीव होना समझा जाता है। तत्पश्चात् प्रलय, जैसे, - विष्णुधर्ममें- "विष्णुके तेजसे समृद्ध ब्रह्मा, रुद्र, सूर्य, चन्द्र और अन्यान्य देवतागण जगत्कार्यका अन्त होनेपर उस तेजसे विच्छिन्न हो जाते हैं और उस समय वे प्रभाहीन होकर सभी पञ्चत्व प्राप्त करते हैं।" इसलिये श्रुतिमें कथित 'पहले एकमात्र नारायण ही थे", यह युक्तियुक्त है; अन्यथा इन सभी शास्त्रवाक्योंमें विरोध उपस्थित होता है। रुद्रका जो जीवत्व है, उसे दृष्टान्तरूपमें यहाँ कहा गया है-जैसे, ब्रह्मा। और जहाँ 'भगवदंश' रूपमें कहा गया है, वे 'शेष' के समान कहे गये हैं अर्थात् जिस प्रकार श्रीविष्णुकी शय्याके रूपमें विष्णुकी आधारशक्ति 'शेष' ईश्वरश्रेणीमें हैं और भूधारी 'शेष' तदाविष्ट जीव हैं, उसी प्रकार स्वांशत्व (ईश्वरकोटित्व) एवं विभिन्नांश (जीवकोटित्व) के रूपमें रुद्रको 'भगवदंश' कहा गया है- पुराणादिमें इस प्रकार कहा गया है। 'सत्त्वं रजस्तमः' (भाः १/२/२३) श्लोकमें परमपुरुषका आविर्भाव-स्वरूप जो 'हर' कहा गया ३६६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/७७-७९ ]

है, वे पुरुषधाम अर्थात् उसी पुरुषके आत्मभूत होनेके कारण निर्गुण ही हैं। यहाँपर जो 'प्राय निर्गुण' उक्त हुआ है, उसका कारण यह है कि वे स्वेच्छासे ग्रहण करके तमोगुणके द्वारा आवृत हुए हैं। इसलिये सभी अतत्त्वज्ञोंको वे गुणावतारोंमें 'विकारी'-रूपमें प्रतीत होते हैं। किन्तु वस्तुतः वे अविकारी हैं, यह अर्थ है। तमोगुणके योगसे वे विकारी जैसे जो प्रतीत होते हैं, उस विषयमें प्रमाण—'शिवः शक्तियुतः शश्वत् त्रिलिङ्गो गुणसंवृतः' (भाः १०/८८/३)। श्रीरुद्र सदा 'शक्तियुत' अर्थात् स्वेच्छासे ग्रहण की गयी गुणसाम्यावस्थारूपा प्रकृतिके साथ युक्त हैं। गुणोंमें क्षोभ होनेसे वे 'त्रिलिङ्ग' अर्थात् तीन गुणोंसे युक्त होते हैं और उन प्रकटित सत्त्वादि गुणोंके द्वारा वे दूरसे संवृत होते हैं। यदि कहें कि वे तो तमोगुणके द्वारा आवृत रूपमें विख्यात हैं, इसलिये उनका त्रिलिङ्गत्व किस प्रकार है? इसके उत्तरमें कहा गया है—तीनों गुण परस्पर पृथक् कहनेपर भी उक्त तमोगुणमें सत्त्व और रजोगुणका अवस्थान अवश्य है, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है—इस वाक्यको लोकप्रतीतिगत अनुवादके रूपमें समझना होगा। श्रीरुद्र पुरुषधाम होनेके कारण निर्गुण होनेपर भी तमोगुणके योगके कारण विकारवान् रूपमें प्रतीत होते हैं। इसका प्रमाण है “क्षीरं यथा दधिविकारविशेषयोगात्” (ब्रह्मसंहिता ५/४५)—अम्लादि विकारविशेषके योगसे दूध दहीके रूपमें परिणत होता है, इसलिये दूधरूप कारणसे दही पृथक् नहीं है। उसी प्रकार श्रीगोविन्द स्वेच्छासे तमोगुणसे सम्बन्धके कारण शम्भु होते हैं, यहाँपर शम्भु गोविन्दसे कुछ भिन्न नहीं है। पुनः विकार आगन्तुक होनेके कारण स्वरूपमें वह विकार-प्रसङ्ग नहीं है अर्थात् स्वरूपगत विकार नहीं है। श्रीरुद्रके आविर्भाव स्थानोंके विषयमें कहा जा रहा है। 'शतपथ' ब्राह्मणमें ब्रह्माके ललाटसे और महोपनिषद् और पुराणादिमें लक्ष्मीपति श्रीविष्णुके ललाटसे रुद्रकी उत्पत्ति दिखायी देती है। यह उत्पत्तिगत विभिन्नता कल्पभेदसे सम्भव होती है। श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्ध (११/३/१०)में कहा गया है,—“पातालतलमारभ्य सङ्कर्षणमुखानलः” अर्थात् कल्पके अन्तमें सङ्कर्षणसे कालाग्निरूप रुद्रकी उत्पत्ति होती है। (अभी पूर्वपक्षके रूपमें कहा जा रहा है—) 'श्रीकृष्ण ही स्वयं प्रभु हैं, नारायणादि उनके विलासरूप स्वांश-तत्त्व, अथवा अन्य कोई आवेशावतार हैं। उसी स्वांश-तत्त्वगत गर्भोदशायीसे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र प्रकट होते हैं—ये सब ईशतत्त्व हैं। शास्त्रकारोंने कभी-कभी ब्रह्मा और रुद्रको जीवश्रेणीका कहा है, परन्तु वह निर्दोष नहीं है। क्योंकि, सदाशिव ही मूलतत्त्व हैं—वे ही 'स्वयं' पदके द्वारा वाच्य हैं। वे ही नारायणादि रूप हैं, इसलिये ब्रह्मादि तीनों देवता उनके ही कार्यभूत हैं। इसके प्रमाणस्वरूप कैवल्योपनिषदमें कहा गया है—“वे पुरुष अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्तरूप, शिव, प्रशान्त, अमृत, ब्रह्मयोनि, आदि-मध्य-अन्तहीन, एक, विभु, चिदानन्द, अरूप, अद्भुत, उमासहाय, परमेश्वर, प्रभु, त्रिलोचन, नीलकण्ठ, भूतयोनि, सबके साक्षी हैं,—मुनिलोग उनका ही ध्यान करके प्रकृतिके उस पार गमन करते हैं। वे ब्रह्मा, वे शिव, वे इन्द्र, वे अक्षर, वे स्वराट्पुरुष, वे ही विष्णु, वे प्राण, कालाग्नि, चन्द्रमादि हैं। जो भी चराचर प्राणी पहले थे और भविष्यमें होंगे, सभी वे ही हैं—उनको जाननेपर ही मृत्युका अतिक्रम किया जा सकता है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।” इसलिये यदि इस प्रकार कहा जाय कि

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श्रुतिप्रमाणके कारण यह पक्ष ही श्रेष्ठ है, तो वहाँ वर्णन हुआ है कि ‘सदाशिव’ नामक वह मूर्ति-स्वयं प्रभु श्रीकृष्णकी अङ्गभूता है, इसलिये वे विलासरूप श्रीनारायण हैं, यह अर्थ होगा। इसलिये तैत्तिरीय उपनिषदमें ‘शिव’, ‘अच्युत’, ‘नारायण’ को एक ही अर्थमें कहा गया है। उक्त कैवल्योपनिषद्-श्रुतिमें ‘उमासहाय’, ‘त्रिलोचन’, ‘नीलकण्ठ’ आदि शब्दोंके आपाततः जो सब अर्थ दिखलायी देते हैं, वे शिवमें स्वीकृत नहीं हैं, इसलिये ‘उमासहाय’—उमा अर्थात् कीर्त्ति जिनकी सहाय हैं, ‘त्रिलोचन’ अर्थात् त्रिकालज्ञ, ‘नीलकण्ठ’ अर्थात् नीलमणिके द्वारा भूषित कण्ठ, इस प्रकारकी व्याख्या करनी होगी। वह सदाशिव-मूर्ति वैकुण्ठके अन्तर्गत शिवलोकमें विराजमान है। श्रीजीवगोस्वामीने भगवत्सन्दर्भ (७३ अनुच्छेद) में वायुपुराणके वाक्य ‘अण्डौघस्य समन्तात् तु’ के द्वारा सदाशिव और उनके लोकका निरूपण किया है। स्वयंरूप श्रीकृष्णकी ही मूर्ति जो सदाशिव हैं, उसके प्रमाणका निर्णय करनेके लिये “नियतिः स रमा”—(ब्रह्मसंहिता ५/८) कहा जा रहा है। यहाँपर ‘आदि-शिव’ पदके द्वारा यह ग्रहण करना चाहिये—“हरिके काम (इच्छा) से महत्तत्त्वरूप बीजकी उत्पत्ति होती है। इस जगत्की समस्त ही लिङ्ग-योन्यात्मिका महेश्वरी प्रजा अर्थात् लिङ्ग और योनिके संयोगसे उत्पन्न हुई हैं। वे शक्तिमान् पुरुष ही ये लिङ्गरूपी महेश्वर हैं; उसी लिङ्गसे जगत्पति महाविष्णु अविर्भूत हैं।” (यहाँपर ‘नियतिः सा रमा’—इसका अर्थ कह रहे हैं—) इससे पहले श्लोकमें जिन रमाके साथ पुरुषके (विष्णुके) रमणका वर्णन हुआ है, वे कौन हैं? इस श्लोकमें कह रहे हैं, अर्थात् उस रमण कार्यमें वे नियती (वशीभूता) हैं, अर्थात् वे सदा उनकी नित्य स्वरूपभूता चित्शक्ति हैं। इसलिये उनके सम्बन्धमें वहाँ उक्त हुआ है—‘तत्प्रिया तद्वशंवदा’ (उनके वशीभूता)’। हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें वर्णन है,–‘श्रीविष्णुके बिना लक्ष्मी एवं लक्ष्मीके बिना विष्णु अवस्थान नहीं करते।’ विष्णुपुराणमें—‘वही जगन्माता लक्ष्मीदेवी श्रीविष्णुकी नित्य शक्ति हैं।’ उन्हीं स्वयंरूप श्रीकृष्णके ‘लिङ्ग’ अर्थात् चिह्नस्वरूप भगवान् श्रीशम्भु हैं। विश्वकोषके अनुसार ‘लिङ्ग’ का अर्थ चिह्न अथवा अनुमान है। भगवान् अर्थात् जो षडैश्वर्ययुक्त और परव्योमाधिपति हैं। शम्भु अर्थात् ‘शं भावयति’, जो सबका मङ्गल करते हैं अर्थात् अपने द्वितीयव्यूह श्रीसङ्कर्षणरूपसे प्रकृतिमें विलीन जीवोंकी उन-उन उपाधि-सृष्टिका सम्पादन करते हैं। वही श्रीशम्भु—‘ज्योतीरूप’ अर्थात् चैतन्यविग्रह हैं—इसके द्वारा श्रीकृष्णका शम्भुके अधिपति होनेके कारण उनका स्वयंरूप होनेका परिचय प्राप्त होता हैं, जैसे गाय-बैलके गलकम्बलके द्वारा ही उनका गो-जाति होना निश्चित होता है। वे श्रीशम्भु जिनके विलास हैं, वे—‘स्वयंरूप’ हैं, इसलिये उन्हें स्वयंरूप श्रीकृष्णका ‘लिङ्ग’ कहा गया है। जो ‘योनि’ स्वरूपा हैं, वे महदादि-उपादानरूपा अपरा शक्ति (त्रिगुणात्मिका) हैं। (अब परवर्त्ती ‘कामो बीजं महद्धरेः’ श्लोकका अर्थ कहा जा रहा है)—श्रीहरिका अर्थात् हरिके स्वांश श्रीसङ्कर्षणका जो ‘काम’ अर्थात् मायाके प्रति दर्शनकी इच्छा, वही महादादिका सृष्टिकारक होता है। इसलिये उसी ‘काम’ से ही महत्तत्त्वादि बीज होता है। ‘महत्’ अर्थात् अपरिमित जीवतत्त्व, वह उस अपराशक्तिमें स्थापित होता है। इस प्रकार पुरुष और प्रकृतिसे जन्म होनेके कारण यह सभी माहेश्वरी-प्रजा ‘लिङ्ग-योन्यात्मिका’ के रूपमें कही जाती है। यहाँपर प्रकृति गौण कारण है और जीवको प्रकृतिकी अधीनताके कारण

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६/७७-८३ ] 'माहेश्वरी-प्रजा' कहा गया है। परवर्ती 'शक्तिमान्' आधे श्लोकमें यह निर्धारित हुआ है। 'लिङ्गसे' अर्थात् प्रकृतिके अधीश्वर जो महेश्वर हैं, उनसे अर्थात् उनके निकटमें महाविष्णु श्रीसङ्कर्षण आविर्भूत होते हैं॥७७-७८॥ १३) चारों रसोंमें ही श्रीकृष्णदास्य :- पिता-माता-गुरु-सखा-भाव केने नय। कृष्णप्रेमेर स्वभावे दास्य-भाव से करय॥८०॥ अनुवाद-पिता-माता-गुरु अथवा सख्यभाव, कोई भी भाव क्यों ना हो, श्रीकृष्णप्रेमका ऐसा स्वभाव है कि उन सब भावोंमें दास्यभाव ही होता है॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो कोई भी भाव क्यों ना हो, सभी भावोंके अन्तर्गत दास्यभावको स्वीकार करना होगा॥८०॥ स्वयं श्रीकृष्ण ही सभीके प्रभु :- एक कृष्ण-सर्वसेव्य, जगत्-ईश्वर। आर यत सब,-ताँर सेवकानुचर॥८१॥ सेइ कृष्ण अवतीर्ण-चैतन्य-ईश्वर। अतएव आर सब-ताँहार किङ्कर॥८२॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण ही एकमात्र सबके सेव्य और जगत्के ईश्वर हैं। अन्य सभी उनके सेवक-अनुचर हैं। वे श्रीकृष्ण ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये अन्य सभी उनके दास हैं॥८१-८२॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/७०, ८३, ८८, १०२, १०६; ३/५; ४/११-१२; ५/१३१; ७/७-८; मध्यलीला ६/१४७; ८/१३३-१३५; १०/१५; १५/१३९; १८/१९०-१९१; २०/१५२-१५५, २४०, ४००; २१/३४, ९२; २२/७; २४/७१ संख्या आदि द्रष्टव्य हैं॥८१॥ अमृतानुकणिका-सभीके चित्तमें श्रीकृष्णदास्यभाव क्यों उत्पन्न होता है, इसका कारण इस पयारमें बतला रहे हैं। श्रीकृष्ण ही जगत्के ईश्वर, सर्वेश्वर हैं। वे ही एकमात्र सेव्य हैं और अन्य सभी उनके सेवक हैं। सेवक होनेपर भी सेवाकी विचित्रीके निर्वाह हेतु कोई पिता, कोई मातादि भाव पोषणकर श्रीकृष्णके सुखका सम्पादन करते हैं। सभी स्वरूपतः श्रीकृष्णके सेवक हैं, इसलिये वे जिस किसी अभिमानका मनमें पोषण क्यों नहीं करते हों, सभीके चित्तमें दास्यभाव प्रबल है। श्रीकृष्णप्रेमका स्वभाव यही है कि श्रीकृष्णदास्यके भावसे सर्वप्रकारसे श्रीकृष्णको सुखी करने इच्छा चित्तमें अवश्य ही जागेगी॥८०-८२॥ १४) समस्त चित्वस्तुएँ ही उनकी दास :- केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास। ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश॥८३॥ अनुवाद-कोई माने अथवा ना माने, सब उनके दास हैं। जो यह नहीं मानता है, इस पाप (अपराध) के कारण उसका नाश हो जाता है॥८३॥ छठा अध्याय | ३६९

[ ६/८३ अनुभाष्य—जीव अपने स्वरूपको भूलकर स्वयंको भोक्ता मानकर श्रीकृष्णसेवासे विमुख होता है। अज्ञानके कारण कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि निरन्तर भगवत्सेवा ही उनका एकमात्र कार्य नहीं है, किन्तु वास्तवमें सभी प्राणी नित्यकाल उनके दास्यमें अवस्थित हैं। भगवत्सेवा ना करनेसे जीवका स्वभाव विपरीत होनेसे उसका अमङ्गल होता है। श्रीचैतन्य महाप्रभुका दासत्व ही अणुचित् जीवका स्वरूप-धर्म है। अपनी इस स्वरूपवृत्तिको भूलकर बद्धजीव जो अन्य चेष्टाएँ करता है, वे केवल संसारके भोगोंके आकर्षण मात्र हैं। चैतन्य उदय होनेपर उसके हृदयमें श्रीचैतन्य महाप्रभुका दास्य स्वभावतः ही प्रकाशित होता है। श्रीचैतन्यसेवाका त्यागकर बद्धजीवके कार्योंमें अन्य वस्तुओंके ऊपर उसका प्रभुत्व दिखलायी देता है, किन्तु उस समय भी वह श्रीचैतन्य महाप्रभुका 'अयोग्य' दासमात्र ही है॥८३॥ अमृताणुकणिका—सभी ही सर्वकारण-कारण श्रीकृष्णके दास और उपासक हैं। जो इस बातकी जितनी उपलब्धि कर पाते हैं, वे उतने ही मुक्त या स्वाधीन हैं। जो इसकी जितनी उपलब्धि नहीं कर पाते, वे उतने ही अमुक्त या पराधीन हैं। इस बात को गीतामें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने कहा है (गीता ९/२४)— “अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥” अर्थात् “मैं ही समस्त यज्ञोंका भोक्ता और प्रभु हूँ, किन्तु जो लोग मुझे स्वरूपतः नहीं जानते, वे संसारमें प्रत्यावर्त्तन करते हैं।” जीवमात्र ही जब श्रीकृष्णका नित्य दास है, तब श्रीकृष्णोपासना प्रत्येक जीवका नित्य धर्म है। श्रीकृष्णकी विस्मृतिके फलस्वरूप नित्य स्वभावसे विच्युत और विरूपग्रस्त होनेपर भी जीवका नित्यधर्म उसका परित्याग नहीं करता; तब वह विकृतस्वभावसे विकृतभावसे विपरीत गतिमें दिखलायी देता है। जो जितने परिमाणमें स्वभावके पथमें हैं, वे उसी परिमाणमें श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं। प्रत्येक जीव ही श्रीकृष्णकी उपासना कर रहे हैं, तो भी जो स्वभावके पथकी विपरीत दिशामें चल रहे हैं, वे अविधिपूर्वक श्रीकृष्णकी उपासना कर रहे हैं। और जो जितना स्वभावके ठीक पथमें चल रहे हैं, वे उतनी विधिपूर्वक उपासना करके क्रमशः ऐकान्तिक, अव्यभिचारी, अद्वयज्ञानावलम्बी, एकायनस्कन्धी (वर्णाश्रमातीत) भागवतावस्था-लाभ एवं विधिकी पूर्ण पराकाष्ठा अनुराग या प्रेम लाभ करते हैं। स्वभावके पूर्णतम-राज्यमें और जो 'अविधि' (रागमार्गमें विधिका विचार ना करके केवल लोभके द्वारा ही प्रवृत्त होकर जो भक्ति) है, उसीमें विधिकी परिपूर्ण-तात्पर्यमयता और चरितार्थता है। गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा (गीता ९/२३)— “येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥” अर्थात् “हे कौन्तेय! जो लोग श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंकी आराधना करते हैं, वे भी अविधिपूर्वक मेरी ही आराधना करते हैं।” जगत्में श्रीकृष्णोपासकके अतिरिक्त और कोई उपासक नहीं हैं, विधिके साथ हो अथवा अविधिके साथ हो, सभी श्रीकृष्णको ही चाहते हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण ही प्रत्येक चेतनस्वरूपके प्राण, आकर्षक और आनन्द-दायक हैं— ३७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/८३-८८ ] “कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निवृतिवाचकः। तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥” (मःभाः उःपः ७१अः ४र्थ श्लोक) अर्थात् “कृष्-धातु-भू अर्थात् सत्तावाचक अथवा आकर्षक; ण-शब्द निवृति अर्थात् परमानन्दवाचक। कृष्-धातुमें ण-प्रत्यय करके उन दोनोंके ऐक्य 'कृष्ण'-शब्दसे परमब्रह्म प्रतिपादित हुआ है।” धर्मक्षेत्र भारतके 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' मन्त्रके उपासक चार्वाक* और ऐसे ही विचार रखनेवाले विश्वके अन्य देशोंके दार्शनिक भी इसी आकर्षक-सत्ताको, इसी निवृति या आनन्दको अर्थात् वे अवैधरूपसे इन्हीं श्रीकृष्णको ही चाहते हैं; अविधिपूर्वक श्रीकृष्णकी ही उपासना करते हैं। वे श्रीकृष्णमायाको 'श्रीकृष्ण' कहकर भ्रमित होते हैं, इसलिये वे स्वाधीनता नहीं लाभ करते हैं॥८३॥ 'चैतन्येर दास मुञि, चैतन्येर दास। चैतन्येर दास मुञि, ताँर दासेर दास॥'८४॥ एत बलि' नाचे, गाय, हुङ्कार गम्भीर। क्षणेके बसिला आचार्य हैञा सुस्थिर ॥ ८५ ॥ अनुवाद—'मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ, श्रीचैतन्यका दास हूँ, मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ, मैं उनके दासका दास हूँ',—ऐसा कहकर गम्भीर हुङ्कार करते हुए श्रीअद्वैताचार्य नाचने, गाने लगते तथा कुछ क्षणके बाद वे स्थिर होकर बैठ जाते ॥ ८४-८५ ॥ श्रीबलदेव और उनके समस्त अंशावतार ही श्रीकृष्णदासाभिमानी :— भक्त-अभिमान मूल श्रीबलरामे। सेइ भावे अनुगत ताँर अंशगणे ॥ ८६ ॥ १) उनके सङ्कर्षणअवतार दासाभिमानी :— ताँर अवतार एक श्रीसङ्कर्षण। भक्त बलि' अभिमान करे सर्वक्षण ॥ ८७ ॥ २) उनके लक्ष्मणावतार दासाभिमानी :— ताँर अवतार आन श्रीयुत लक्ष्मण। श्रीरामेर दास्य तिँहो कैल अनुक्षण ॥ ८८ ॥ *चार्वाकका सिद्धान्त— “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्। भस्मि-भूतस्य देहस्य कुतः पुनागमनो भवेत्॥” अर्थात् जबतक जीओ, तबतक सुखपूर्वक जीओ। सुखपूर्वक जीनेके लिये स्वस्थ देह चाहिये, इसलिये प्रचुर मात्रामें घी पान करो और घीसे बने व्यञ्जन खाओ। यदि तुम्हारे पास घीके लिये धन नहीं है, तो ऋण लेकर भी घी पान करो। ऋण चुकानेकी चिन्ता मत करो, क्योंकि मरनेके बाद यह देह तो जलकर राख बन जायेगी और तुम्हारा पुनागमन कहाँ है, अर्थात् पुनर्जन्म तो होता नहीं। छठा अध्याय | ३७१

[ ६/८६-९५ अनुवाद—भक्त-अभिमानके मूल श्रीबलराम हैं, इसलिये यही भाव उनके अनुगत अंशोंमें भी रहता है। उनके एक अवतार श्रीसङ्कर्षण हैं और वे सदा अपनेको भक्त ही मानते हैं। उनके एक और अवतार श्रीलक्ष्मण हैं और वे प्रतिक्षण श्रीरामचन्द्रकी सेवामें तत्पर रहते हैं॥८६-८८॥ ३) उनके आदि-पुरुषावतार भी भक्ताभिमानी :- सङ्कर्षण-अवतार—कारणाब्धिशायी। ताँहार हृदये भक्तभाव अनुयायी॥८९॥ अनुवाद—सङ्कर्षणके अवतार कारणाब्धिशायी विष्णु हैं। उनके हृदयमें भी भक्त-भाव सदा विराजमान रहता है॥८९॥ ४) उनके अद्वैतावतार भी भक्ताभिमानी :- ताँहार प्रकाश-भेद—अद्वैत-आचार्य। कायमनोवाक्ये ताँर भक्ति सदा कार्य॥९०॥ वाक्ये कहे, ‘मुञि चैतन्येर अनुचर।’ ‘मुञि ताँर भक्त’—मने भावे निरन्तर॥९१॥ जल-तुलसी दिया करे कायाते सेवन। भक्ति प्रचारिया सब तारिला भुवन॥९२॥ अनुवाद—उनके प्रकाश श्रीअद्वैताचार्य हैं, जो तन, मन और वचनसे सदा भक्तिका ही कार्य करते हैं। वे वचनके द्वारा कहते हैं—‘मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ’ और उनके मनमें सदा यही भाव होता है कि मैं उनका भक्त हूँ। श्रीकृष्णको गङ्गाजल और तुलसी अर्पण करके तनसे सेवा करते हैं और भक्तिका प्रचार करके त्रिभुवनका उद्धार करते हैं॥९०-९२॥ ५) उनके शेषावतार भी सेवकाभिमानी :- पृथिवी धरेन येइ शेष-सङ्कर्षण। कायव्यूह करि’ करेन कृष्णेर सेवन॥९३॥ श्रीकृष्णके सभी अंशावतार उनके भक्त :- एइ सब हय श्रीकृष्णेर अवतार। निरन्तर देखि सबार भक्तिर आचार॥९४॥ अनुवाद—शेष-सङ्कर्षण जो पृथ्वीको धारण करते हैं, वे कायव्यूह (छत्रादि रूप) धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। श्रीबलरामसे लेकर शेष-सङ्कर्षण तक, ये सब श्रीकृष्णके अवतार हैं और इन सबमें निरन्तर भक्तिका आचरण देखा जाता है॥९३-९४॥ अनुभाष्य—‘कायव्यूह’ अर्थात् दस देह धारणकर वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। संख्या ७६ द्रष्टव्य है॥९३॥ ५) भक्तावतारकी सर्वश्रेष्ठ मर्यादा :- ए-सबाके शास्त्रे कहे ‘भक्त-अवतार’। ‘भक्त-अवतार’-पद उपरि सबार॥९५॥

३७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/९५-९९ ] अनुवाद—शास्त्रोंमें इन सबको ‘भक्त-अवतार’ कहा जाता है। ‘भक्त-अवतार’ का पद सबसे श्रेष्ठ माना जाता है॥९५॥ अनुभाष्य—भगवान् अपना ऐश्वर्य प्रकाश करनेके लिये जब प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तब जीवको भजनकी शिक्षा देनेके लिये उनका जो आदर्श भक्तावतार होता है, वह सभी ईश्वरके अवतारोंकी लीलाओंकी अपेक्षा जीवके लिये सर्वश्रेष्ठ और मङ्गलप्रद है। ऐश्वर्य-प्रधान अवतारोंकी लीलाओंको प्राकृत बुद्धिसे देखकर जीव कभी मोहित होकर उनके अनुकरणके प्रयासमें दुर्गति‌को प्राप्त करता है, किन्तु भगवान्‌के भक्तरूपमें अवतारोंके आदर्शको देखकर जीवका अहङ्कार वैसा कुफल उत्पन्न नहीं कर पाता। जैसे, आजकल अनेक व्यक्ति स्वयंको 'वासुदेवादि' अवतार घोषित करके प्रतिष्ठा पानेका प्रयास करते हैं, परन्तु ऐसे लोगोंको मरनेके बाद सियारकी योनि प्राप्त होती है। भक्तावतारोंके स्वरूपदर्शनमें विमूढ़ व्यक्तियोंकी अर्थात् जो उनको समझ नहीं पाते, उनकी ही इस प्रकार दुर्गति होती है। मिथ्या अहङ्कार बद्धजीवको भगवत्-ऐश्वर्यकी कामनामें प्रमत्त करके मायावादी बना देता है॥९५॥ अंशी श्रीकृष्णके प्रति अंशावतारका ज्येष्ठ-कनिष्ठ व्यवहार :- एकमात्र ‘अंशी’—कृष्ण, ‘अंश’—अवतार। अंशी-अंशे देखि ज्येष्ठ-कनिष्ठ-आचार॥९६॥ कनिष्ठ अंशावतारकी ज्येष्ठ अंशीके प्रति प्रभु-बुद्धि और कनिष्ठ अंशावतारका ज्येष्ठ अंशीके प्रति दासाभिमान :- ज्येष्ठ-भावे अंशीते हय प्रभु-ज्ञान। कनिष्ठ-भावे आपनाते भक्त-अभिमान ॥ ९७॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण एकमात्र अंशी हैं और अन्य सभी अवतार उनके अंश हैं। अंशी और अंशमें ज्येष्ठ-कनिष्ठका आचरण देखा जाता है। ज्येष्ठ-भावसे अंशीमें प्रभु होनेका अभिमान होता है और कनिष्ठ-भावसे अंशका अपनेमें भक्ताभिमान होता है॥९६-९७॥ अनुभाष्य—खण्डित वस्तुको ‘अंश’ कहा जाता है और जिसका खण्ड होता है, उस वस्तुको ‘अंशी’ कहते हैं। अंशीका अंश, अखण्डका खण्ड—अंशी और अखण्डके अन्तर्गत हैं। प्रभु अंशी हैं और भक्त अंश हैं। इस ‘प्रभु’ और ‘भक्त’ के परस्पर सम्बन्धमें ज्येष्ठ-कनिष्ठ या बड़े-छोटेका विचार जुड़ा है। बड़ेका नाम ‘प्रभु’, छोटेका नाम ‘भक्त’ है। श्रीकृष्ण अंशी हैं, श्रीबलदेव और उनके समानधर्ममें अवस्थित महाविष्णुके सभी प्रकाश उनके अंश हैं। श्रीकृष्णका स्वयंमें प्रभु-अभिमान है और श्रीबलदेवादि‌का स्वयंमें भक्ताभिमान है॥९७॥ श्रीकृष्णके निकट भक्तका ही सर्वश्रेष्ठ सम्मान :- कृष्णेर समता हैते बड़ भक्तपद। आत्मा हैते कृष्णेर भक्त हय प्रेमास्पद॥९८॥ आत्मा हैते कृष्ण, भक्ते बड़ करि' माने। इहाते बहुत शास्त्र-वचन-प्रमाणे ॥ ९९॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी समानतासे श्रीकृष्णके भक्तका पद बड़ा है, क्योंकि भक्त श्रीकृष्णको छठा अध्याय | ३७३

[ ६/९८-१०२ उनकी आत्मासे भी अधिक प्रिय हैं। श्रीकृष्ण भक्तको अपनेसे भी बड़ा मानते हैं, अनेक शास्त्र-वचन इस बातके प्रमाण हैं॥९८-९९॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके समान होनेके विचारकी अपेक्षा श्रीकृष्णभक्त-पद अर्थात् भक्तोंकी श्रीकृष्णसेवा श्रेष्ठ है। क्योंकि श्रीकृष्णका स्वयंके प्रति जितना प्रेम है, उससे कहीं अधिक उनका अपने सेवकके प्रति प्रेम है। श्रीभागवत (९/४/६८) में—“साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयन्त्वहम्। मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥” अर्थात् “साधु मेरा हृदय हैं और साधुओंका हृदय मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त किसीको नहीं जानते और मैं भी उनके अतिरिक्त किसी अन्यको तनिक भी नहीं जानता हूँ।” यह श्लोक ही इसका प्रकृष्ट उदाहरण है॥९८॥ श्रीमद्भागवत (११/१४/१४)— न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥१००॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव! ब्रह्मा, सङ्कर्षण, लक्ष्मी और स्वयं मैं, मुझे इतने प्रिय नहीं हैं, जितने मेरे भक्त तुम मुझे प्रिय हो॥१००॥ अनुभाष्य—अपने परमभक्त उद्धवसे श्रीकृष्णने कहा— मे (मम) भक्त भवान् (उद्धवः) यथा प्रियतमः आत्मयोनिः (ब्रह्मा) तथा न; शङ्करः तथा न; सङ्कर्षणः च न तथा प्रियतमः; श्रीः (लक्ष्मीः) तथा न, आत्मा तथा न एव (अहं श्रीमूर्त्तिरपि नैव प्रियतमा)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१००॥ भक्तभावमें ही श्रीकृष्णका स्वमाधुर्यास्वादन :— कृष्णसाम्ये नहे ताँर माधुर्यास्वादन। भक्तभावे करे ताँर माधुर्य चर्वण॥१०१॥ शास्त्रेर सिद्धान्त एइ,—विज्ञेर अनुभव। मूढ़लोक नाहि जाने भावेर वैभव॥१०२॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी समानता होनेसे उनके माधुर्यका आस्वादन सम्भव नहीं है। भक्तभावसे ही उनके माधुर्यका पूर्ण आस्वादन हो सकता है। यही शास्त्रोंका सिद्धान्त है, जिन्होंने श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन किया है, उन विज्ञ महापुरुषोंका यही अनुभव है। परन्तु मूर्ख लोग इस भावकी महिमाको नहीं जानते॥१०१-१०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णमें समता बुद्धि करनेसे उनके माधुर्यका आस्वादन नहीं हो सकता॥१०१॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये षष्ठ परिच्छेद। छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—जीवको सारूप्यादि मुक्तिमें अथवा विष्णुतत्त्वमें श्रीकृष्णके साथ साम्यभाव रहनेके कारण श्रीकृष्णदास्यके माधुर्यका यथारूप आस्वादन नहीं होता। भक्तभावमें श्रीकृष्णके साथ साम्यभाव (भोक्ताका भाव) नहीं रहनेके कारण, चर्व्य (चबाये जानेवाली) वस्तुके रसास्वादनकी ३७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१०१-१०८ ] भाँति श्रीकृष्ण-मधुरिमाकी पूर्ण उपलब्धि होती है। प्रभुत्वके लोभसे मूर्खतावशतः साधारण लोग दास्यभावकी पराकाष्ठाको अनुभव करनेमें स्वभावतः ही अक्षम हैं। विशेष अभिज्ञ व्यक्ति और शास्त्रोंमें प्रगाढ़रूपमें प्रविष्ट व्यक्ति ही इस सूक्ष्म विषयको समझ सकते हैं॥१०१-१०२॥ भक्तभाव लेकर ही श्रीनित्यानन्द-रामादि विष्णुवर्गका श्रीकृष्णमाधुर्यास्वादन :- भक्तभाव अङ्गीकरि' बलराम, लक्ष्मण। अद्वैत, नित्यानन्द, शेष, सङ्कर्षण॥१०३॥ कृष्णेर माधुर्यरसामृत करे पान। सेइ सुखे मत्त, किछु नाहि जाने आन॥१०४॥ अनुवाद-भक्त-भावको अङ्गीकार करके श्रीबलराम, श्रीलक्ष्मण, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीशेष और श्रीसङ्कर्षण श्रीकृष्णके माधुर्यरसका पानकर उस सुखमें इतने मत्त हो जाते हैं कि उन्हें और किसी बातका ज्ञान ही नहीं रहता॥१०३-१०४॥ स्वयं श्रीकृष्णका भी अपने माधुर्यके आस्वादनके लिये भक्तभावमें श्रीगौररूपमें अवतार :- अन्येर आछुक कार्य, आपने श्रीकृष्ण। आपन-माधुर्य-पाने हइला सतृष्ण॥१०५॥ स्वमाधुर्य आस्वादिते करेन यतन। भक्तभाव बिनु नहे ताहा आस्वादन॥१०६॥ अनुवाद-औरोंकी बात क्या कहें, स्वयं श्रीकृष्णमें भी अपने माधुर्यके आस्वादनकी तृष्णा होती है। वे उसका आस्वादन करनेका प्रयास करते हैं, परन्तु भक्त-भावको अङ्गीकार किये बिना वे उसका आस्वादन नहीं कर पाते॥१०५-१०६॥ अनुभाष्य-आदिलीला ४/१३७-१५८ द्रष्टव्य हैं। भक्तोंकी भजनीय वस्तु श्रीकृष्णकी माधुरी है। वे किस प्रकारसे उस माधुर्यका आस्वादन करते हैं, भक्तभावको स्वीकार किये बिना उसे अनुभव करना असम्भव जानकर श्रीकृष्ण भी स्वयं भक्त बन गये॥१०५-१०६॥ भक्तभाव अङ्गीकरि' हैला अवतीर्ण। श्रीकृष्णचैतन्यरूपे सर्वभावे पूर्ण॥१०७॥ नाना-भक्तभावे करेन स्वमाधुर्य पान। पूर्वे करियाछि एइ सिद्धान्त व्याख्यान॥१०८॥ अनुवाद-इसलिये भक्तभावको अङ्गीकार करके श्रीकृष्ण सभी भावोंसे पूर्ण श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए। मैंने पहले ही इस सिद्धान्तकी व्याख्या की है कि भगवान् विभिन्न भक्तोंके भावोंको ग्रहणकर अपने माधुर्यका आस्वादन करते हैं॥१०७-१०८॥ अनुभाष्य-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-इन पाँच विभिन्न रसोंका आस्वादन करनेके लिये उन-उन भावोंको अङ्गीकारकर श्रीगौरहरि सब प्रकारसे परिपूर्ण हैं। विभिन्न रसोंके आश्रित भक्तोंके भावोंको ग्रहणकर सभी भावोंसे पूर्ण होकर श्रीगौरचन्द्र अपने माधुर्यका पान करते हैं॥१०७-१०८॥ छठा अध्याय | ३७५

[ ६/१०९-११३ विष्णुके सभी अवतारोंमें ही भक्तभाव :- अवतारगणेर भक्तभावे अधिकार। भक्तभाव हैते अधिक सुख नाहि आर॥१०९॥ अनुवाद—[सभी अवतार अंशी श्रीकृष्णके अंश हैं और अंशका कर्त्तव्य अंशीकी सेवा करना हैं, इसलिये] अवतारोंका भक्तभावमें ही अधिकार है। भक्तभावके सुखसे अधिक सुख कहीं भी नहीं है॥१०९॥ अनुभाष्य—विष्णुके सभी अवतारोंका श्रीकृष्णसेवाके उद्देश्यसे भक्तभावमें अवतीर्ण होनेका अधिकार है। ईश्वरभावकी अपेक्षा भक्तभावके द्वारा ही सेव्यकी सेवामें अधिक सुखका आस्वादन होता है॥१०९॥ श्रीसङ्कर्षण आदि-भक्तावतार :- मूल भक्त-अवतार श्रीसङ्कर्षण। भक्त-अवतार तँहि अद्वैते गणन॥११०॥ अनुवाद—श्रीसङ्कर्षण भक्त-अवतारोंके मूल हैं। श्रीअद्वैतकी भी गणना भक्त-अवतारोंमें की जाती है॥११०॥ अनुभाष्य—श्रीअद्वैतप्रभु विष्णुतत्त्व होनेपर भी उन्होंने श्रीचैतन्य महाप्रभुके पार्षदरूपमें सेवकलीलाका ही प्रदर्शन किया। अपनेमें सेवकाभिमानसे ही विष्णुतत्त्वका भक्तावतारत्व है। महावैकुण्ठमें श्रीसङ्कर्षण चतुर्व्यूहके ईश्वररूपमें अवस्थित होकर भी मूल-भक्तावतार हैं। श्रीसङ्कर्षणके एक अंश कारणजलमें शयन करनेवाले जो महाविष्णु हैं, उनके प्रकाशभेदके कारण ही हम निमित्त और उपादानमें ईक्षणके सम्बन्धमें जान सकते हैं, इसलिये महाविष्णुके अवतार श्रीअद्वैताचार्य विष्णुतत्त्व हैं। श्रीसङ्कर्षणके सभी प्रकाशभेद स्वयंरूप श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होनेके कारण, श्रीअद्वैतप्रभु भी श्रीगौर-कृष्णके सेवक अथवा भक्तावतार हैं॥११०॥ इति अनुभाष्ये षष्ठ परिच्छेद। छठे अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीअद्वैतप्रभुकी महिमा :- अद्वैत-आचार्य गोसाञिर महिमा अपार। याँहार हुङ्कारे कैल चैतन्यावतार॥१११॥ सङ्कीर्त्तन प्रचारिया सब जगत् तारिल। अद्वैत-प्रसादे लोक प्रेमधन पाइल॥११२॥ अद्वैत-महिमा अनन्त, के पारे कहिते। सेइ लिखि, येइ शुनि महाजन हैते॥११३॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यकी महिमा अपार है। उनकी हुङ्कारसे श्रीचैतन्यावतार हुआ, सङ्कीर्तनका प्रचार करके उन्होंने जगत्का उद्धार किया और उनकी कृपासे लोगोंने श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनको प्राप्त किया। श्रीअद्वैतकी महिमा अनन्त है, कौन इसका वर्णन कर सकता है? मैंने तो जो महापुरुषोंसे सुना है, उसीका यहाँ वर्णन किया है॥१११-११३॥ ३७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/११४-११८ ] आचार्यप्रभुकी वन्दना :- आचार्यचरणे मोर कोटि नमस्कार। इथे किछु अपराध ना लबे आमार ॥ ११४ ॥ तोमार महिमा-कोटिसमुद्र अगाध। ताहार इयत्ता कहि, -ए बड़ अपराध ॥ ११५ ॥ जय जय जय श्रीअद्वैत आचार्य। जय जय श्रीचैतन्य, नित्यानन्द आर्य ॥ ११६ ॥ दुइ श्लोके कहिल अद्वैत-तत्त्वनिरूपण। पञ्चतत्त्वेर विचार किछु शुन, भक्तगण ॥ ११७ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके चरणकमलोंमें मेरा कोटि बार नमस्कार है, आप मेरे अपराधको ग्रहण ना करें। आपकी महिमा तो करोड़ों समुद्रोंकी भाँति अगाध है और मैंने केवल इतना मात्र ही वर्णन किया—यह एक महान अपराध है। श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो, जय हो। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। मङ्गलाचरणके बारह और तेरह, इन दो श्लोकोंके द्वारा मैंने श्रीअद्वैत-तत्त्वका निरूपण किया। अब पञ्चतत्त्वका कुछ विचार श्रवण करें ॥ ११४-११७ ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ ११८ ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे श्रीअद्वैततत्त्वनिरूपणं नाम षष्ठः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ ११८ ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें श्रीअद्वैत-तत्त्व निरूपण नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त। छठा अध्याय | ३७७

पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूप-स्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥ पञ्चतत्त्व—एक वस्तु, नाहि किछु भेद। रस आस्वादिते तत्त्व विविध विभेद॥

सातवाँ अध्याय सातवें अध्यायका कथासार—इस सातवें अध्यायमें पञ्चतत्त्वका महात्म्य वर्णित हुआ है। पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णचैतन्यने अवतीर्ण होकर जगत्में नाम-प्रेमदान करके प्रेमकी महाबाढ़ ला दी। मायावादी, निन्दकादि कुछ प्रकारके कुतार्किक उस बाढ़से दूर भाग गये। उनका भी उद्धार करनेकी इच्छासे महाप्रभुने संन्यास ग्रहणकर शुद्धभक्तिका प्रचार करते हुए उन सभी लोगोंको भी अपने श्रीचरणोंमें आकर्षित किया। काशीवासी मायावादी संन्यासियोंका उद्धार करनेकी इच्छासे वाराणसी धाममें भक्तोंके द्वारा अनुरोध किये जानेपर किसी ब्राह्मणके घरपर उन सब संन्यासियोंको एकत्रित देखकर पहले अपने स्वरूपके ऐश्वर्यको दिखाकर उनकी श्रद्धा आकर्षित की। उसके बाद उनके द्वारा जिज्ञासा किये जानेपर मायावाद-सिद्धान्तके निराधार अर्थ प्रदर्शित करके श्रीशङ्कराचार्यके मतके सब प्रकारके दोष दिखलाये। भगवद्दर्शनरूप सुकृतिके बलपर उनको भक्तिपथमें लाकर अपनी कृपा दान की। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णचैतन्यकी महावदान्यताका वर्णन :— अगत्येकगतिं नत्वा हीनार्थ्याधिकसाधकम्। श्रीचैतन्यं लिख्यतेऽस्य प्रेमभक्तिवदान्यता ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अगति अथवा अकिञ्चनोंकी गति, परमार्थहीन व्यक्तिके महत्-अर्थसाधक श्रीचैतन्यको नमस्कार करके, उनकी प्रेमभक्तिकी वदान्यता वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ अनुभाष्य—अगत्येकगतिम् (अगतीनाम् आश्रयान्तर-रहितानाम् एका अनन्यगतिः शरणं तथाभूतं) हीनार्थ्याधिकसाधकं (अर्थेन परमार्थेन हीनाः वञ्चिताः हीनार्थाः, प्रयोजनानि धर्मार्थकाममोक्षादयो वा, तेभ्यः अधिकं महत्तरं पञ्चम-पुरुषार्थ-रूपं कृष्णप्रेम तस्य साधकं प्रदातारं) श्रीचैतन्यं नत्वा (प्रणम्य) अस्य (भगवतः श्रीकृष्णचैतन्यस्य) प्रेमभक्ति-वदान्यता (कृष्णप्रेमभक्ति-प्रदानरूप-महाकारुण्यं) लिख्यते (वर्ण्यते)। श्लोक-भावानुवाद—आश्रयरहित व्यक्तिकी एकमात्र शरण, परमार्थहीनको धर्म-अर्थ-काम-मोक्षसे भी अधिक महत्तर पञ्चम-पुरुषार्थरूप प्रेमको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यको प्रणाम करके, उनकी श्रीकृष्णप्रेमभक्ति प्रदानरूपी महाकरुणाका वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। ताँहार चरणाश्रित, सेइ बड़ धन्य॥ २॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। उनके चरणोंका आश्रय करनेवाले व्यक्ति भी परम धन्य हैं॥ २॥ 'वन्दे गुरून्' श्लोकके छः तत्त्वोंमें 'गुरु'-तत्त्वके अतिरिक्त पञ्चतत्त्वका विचार आरम्भ; अभेद होनेपर भी रसास्वादनके लिये पाँच भेद :— पूर्वे गुर्वादि छय तत्त्वे कैल नमस्कार। गुरुतत्त्व कहियाछि, एबे पाँचरे विचार॥ ३॥

[ ७/३-६ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रथम अध्यायमें दीक्षागुरु और शिक्षागुरुके भेदसे गुरुतत्त्वका वर्णन कर चुका हूँ। “वन्दे गुरुनीशभक्तान्” श्लोकमें छह तत्त्व कहे हैं। अब इस श्लोकमें गुरुतत्त्वके बाद अन्य पाँच तत्त्वोंका विचार कर रहा हूँ॥३॥ पञ्चतत्त्व अवतीर्ण चैतन्येर सङ्गे। पञ्चतत्त्व लञा करेन सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥४॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके साथ कुल पाँच तत्त्व अवतीर्ण हुए हैं और श्रीमन्महाप्रभु इन पाँच तत्त्वोंको लेकर ही आनन्दपूर्वक सङ्कीर्तन करते हैं॥४॥ पञ्चतत्त्व-एक वस्तु, नाहि किछु भेद। रस आस्वादिते तत्त्व विविध विभेद॥५॥ अनुवाद-वास्तवमें ये पाँचों तत्त्व एक ही वस्तु हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। केवल रस-वैचित्रीका आस्वादन करनेके लिये एक ही तत्त्व इन पाँच भेदोंसे प्रकट होते हैं॥५॥ अनुभाष्य-शक्तिमान् वस्तु (भगवान्) की पाँच विभिन्न प्रकारकी लीलाओंका परिचय पञ्चतत्त्वमें प्रकाशित होता है। भगवान्‌में द्वैतभाव नहीं होनेके कारण एक होनेपर भी उनमें पाँच प्रकारकी विचित्रताएँ हैं। ये विचित्रताएँ नीरस भावको त्यागकर सरस बनानेके उद्देश्यसे उनका लीलावैशिष्ट्य है। “परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते"-इस श्रुतिवाक्यसे यह जाना जाता है कि अद्वयज्ञानवस्तुका विविध-शक्तिभेद नित्यकाल अवस्थित है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य प्रभु, श्रीगदाधर पण्डित और श्रीवासादि पञ्चतत्त्वमें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, परन्तु रसास्वादनके उद्देश्यसे विचित्रलीलामय तत्त्व ही 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप', 'भक्तावतार', 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-इन पाँच प्रकारके विविध-भेदोंसे युक्त हैं। इन पञ्चतत्त्वमें 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप' और 'भक्तावतार' ही क्रमशः 'स्वयं', 'प्रकाश' और 'अंश' के रूपमें प्रभु-विष्णुतत्त्व हैं। 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-विष्णुतत्त्वके अन्तर्गत उनके आश्रित अभिन्न-शक्तितत्त्व हैं। वे वस्तुसे अभिन्न रसके उपकरण-रूपमें रसमयविग्रहसे युक्त हैं, इसलिये उनमें परस्पर भेद नहीं है। 'आराधक' और 'आराध्य'-दोनोंमें किसी एकके अभावमें लीलाका रसास्वादन नहीं होता॥५॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकामें अन्तिम श्लोककी व्याख्या :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूप-स्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके भक्तरूप, भक्तस्वरूप, भक्तावतार, भक्त और भक्तशक्ति-इन पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥ अनुभाष्य-भक्त-रूप-स्वरूपकं (भक्तभावमयः शुद्धकलेवरः निजास्वादकपरः श्रीगौर, भ्रातृस्वरूपधृक् नित्यानन्दश्च क्रमेण रूपं स्वरूपञ्च यस्य सः तं), भक्तावतारं (अद्वैतं), भक्ताख्यं (शान्तदास्यादिरसाश्रितं ३८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत