भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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श्रुतिप्रमाणके कारण यह पक्ष ही श्रेष्ठ है, तो वहाँ वर्णन हुआ है कि ‘सदाशिव’ नामक वह मूर्ति-स्वयं प्रभु श्रीकृष्णकी अङ्गभूता है, इसलिये वे विलासरूप श्रीनारायण हैं, यह अर्थ होगा। इसलिये तैत्तिरीय उपनिषदमें ‘शिव’, ‘अच्युत’, ‘नारायण’ को एक ही अर्थमें कहा गया है। उक्त कैवल्योपनिषद्-श्रुतिमें ‘उमासहाय’, ‘त्रिलोचन’, ‘नीलकण्ठ’ आदि शब्दोंके आपाततः जो सब अर्थ दिखलायी देते हैं, वे शिवमें स्वीकृत नहीं हैं, इसलिये ‘उमासहाय’—उमा अर्थात् कीर्त्ति जिनकी सहाय हैं, ‘त्रिलोचन’ अर्थात् त्रिकालज्ञ, ‘नीलकण्ठ’ अर्थात् नीलमणिके द्वारा भूषित कण्ठ, इस प्रकारकी व्याख्या करनी होगी। वह सदाशिव-मूर्ति वैकुण्ठके अन्तर्गत शिवलोकमें विराजमान है। श्रीजीवगोस्वामीने भगवत्सन्दर्भ (७३ अनुच्छेद) में वायुपुराणके वाक्य ‘अण्डौघस्य समन्तात् तु’ के द्वारा सदाशिव और उनके लोकका निरूपण किया है। स्वयंरूप श्रीकृष्णकी ही मूर्ति जो सदाशिव हैं, उसके प्रमाणका निर्णय करनेके लिये “नियतिः स रमा”—(ब्रह्मसंहिता ५/८) कहा जा रहा है। यहाँपर ‘आदि-शिव’ पदके द्वारा यह ग्रहण करना चाहिये—“हरिके काम (इच्छा) से महत्तत्त्वरूप बीजकी उत्पत्ति होती है। इस जगत्की समस्त ही लिङ्ग-योन्यात्मिका महेश्वरी प्रजा अर्थात् लिङ्ग और योनिके संयोगसे उत्पन्न हुई हैं। वे शक्तिमान् पुरुष ही ये लिङ्गरूपी महेश्वर हैं; उसी लिङ्गसे जगत्पति महाविष्णु अविर्भूत हैं।” (यहाँपर ‘नियतिः सा रमा’—इसका अर्थ कह रहे हैं—) इससे पहले श्लोकमें जिन रमाके साथ पुरुषके (विष्णुके) रमणका वर्णन हुआ है, वे कौन हैं? इस श्लोकमें कह रहे हैं, अर्थात् उस रमण कार्यमें वे नियती (वशीभूता) हैं, अर्थात् वे सदा उनकी नित्य स्वरूपभूता चित्शक्ति हैं। इसलिये उनके सम्बन्धमें वहाँ उक्त हुआ है—‘तत्प्रिया तद्वशंवदा’ (उनके वशीभूता)’। हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें वर्णन है,–‘श्रीविष्णुके बिना लक्ष्मी एवं लक्ष्मीके बिना विष्णु अवस्थान नहीं करते।’ विष्णुपुराणमें—‘वही जगन्माता लक्ष्मीदेवी श्रीविष्णुकी नित्य शक्ति हैं।’ उन्हीं स्वयंरूप श्रीकृष्णके ‘लिङ्ग’ अर्थात् चिह्नस्वरूप भगवान् श्रीशम्भु हैं। विश्वकोषके अनुसार ‘लिङ्ग’ का अर्थ चिह्न अथवा अनुमान है। भगवान् अर्थात् जो षडैश्वर्ययुक्त और परव्योमाधिपति हैं। शम्भु अर्थात् ‘शं भावयति’, जो सबका मङ्गल करते हैं अर्थात् अपने द्वितीयव्यूह श्रीसङ्कर्षणरूपसे प्रकृतिमें विलीन जीवोंकी उन-उन उपाधि-सृष्टिका सम्पादन करते हैं। वही श्रीशम्भु—‘ज्योतीरूप’ अर्थात् चैतन्यविग्रह हैं—इसके द्वारा श्रीकृष्णका शम्भुके अधिपति होनेके कारण उनका स्वयंरूप होनेका परिचय प्राप्त होता हैं, जैसे गाय-बैलके गलकम्बलके द्वारा ही उनका गो-जाति होना निश्चित होता है। वे श्रीशम्भु जिनके विलास हैं, वे—‘स्वयंरूप’ हैं, इसलिये उन्हें स्वयंरूप श्रीकृष्णका ‘लिङ्ग’ कहा गया है। जो ‘योनि’ स्वरूपा हैं, वे महदादि-उपादानरूपा अपरा शक्ति (त्रिगुणात्मिका) हैं। (अब परवर्त्ती ‘कामो बीजं महद्धरेः’ श्लोकका अर्थ कहा जा रहा है)—श्रीहरिका अर्थात् हरिके स्वांश श्रीसङ्कर्षणका जो ‘काम’ अर्थात् मायाके प्रति दर्शनकी इच्छा, वही महादादिका सृष्टिकारक होता है। इसलिये उसी ‘काम’ से ही महत्तत्त्वादि बीज होता है। ‘महत्’ अर्थात् अपरिमित जीवतत्त्व, वह उस अपराशक्तिमें स्थापित होता है। इस प्रकार पुरुष और प्रकृतिसे जन्म होनेके कारण यह सभी माहेश्वरी-प्रजा ‘लिङ्ग-योन्यात्मिका’ के रूपमें कही जाती है। यहाँपर प्रकृति गौण कारण है और जीवको प्रकृतिकी अधीनताके कारण

३६८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत