श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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है, वे पुरुषधाम अर्थात् उसी पुरुषके आत्मभूत होनेके कारण निर्गुण ही हैं। यहाँपर जो 'प्राय निर्गुण' उक्त हुआ है, उसका कारण यह है कि वे स्वेच्छासे ग्रहण करके तमोगुणके द्वारा आवृत हुए हैं। इसलिये सभी अतत्त्वज्ञोंको वे गुणावतारोंमें 'विकारी'-रूपमें प्रतीत होते हैं। किन्तु वस्तुतः वे अविकारी हैं, यह अर्थ है। तमोगुणके योगसे वे विकारी जैसे जो प्रतीत होते हैं, उस विषयमें प्रमाण—'शिवः शक्तियुतः शश्वत् त्रिलिङ्गो गुणसंवृतः' (भाः १०/८८/३)। श्रीरुद्र सदा 'शक्तियुत' अर्थात् स्वेच्छासे ग्रहण की गयी गुणसाम्यावस्थारूपा प्रकृतिके साथ युक्त हैं। गुणोंमें क्षोभ होनेसे वे 'त्रिलिङ्ग' अर्थात् तीन गुणोंसे युक्त होते हैं और उन प्रकटित सत्त्वादि गुणोंके द्वारा वे दूरसे संवृत होते हैं। यदि कहें कि वे तो तमोगुणके द्वारा आवृत रूपमें विख्यात हैं, इसलिये उनका त्रिलिङ्गत्व किस प्रकार है? इसके उत्तरमें कहा गया है—तीनों गुण परस्पर पृथक् कहनेपर भी उक्त तमोगुणमें सत्त्व और रजोगुणका अवस्थान अवश्य है, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है—इस वाक्यको लोकप्रतीतिगत अनुवादके रूपमें समझना होगा। श्रीरुद्र पुरुषधाम होनेके कारण निर्गुण होनेपर भी तमोगुणके योगके कारण विकारवान् रूपमें प्रतीत होते हैं। इसका प्रमाण है “क्षीरं यथा दधिविकारविशेषयोगात्” (ब्रह्मसंहिता ५/४५)—अम्लादि विकारविशेषके योगसे दूध दहीके रूपमें परिणत होता है, इसलिये दूधरूप कारणसे दही पृथक् नहीं है। उसी प्रकार श्रीगोविन्द स्वेच्छासे तमोगुणसे सम्बन्धके कारण शम्भु होते हैं, यहाँपर शम्भु गोविन्दसे कुछ भिन्न नहीं है। पुनः विकार आगन्तुक होनेके कारण स्वरूपमें वह विकार-प्रसङ्ग नहीं है अर्थात् स्वरूपगत विकार नहीं है। श्रीरुद्रके आविर्भाव स्थानोंके विषयमें कहा जा रहा है। 'शतपथ' ब्राह्मणमें ब्रह्माके ललाटसे और महोपनिषद् और पुराणादिमें लक्ष्मीपति श्रीविष्णुके ललाटसे रुद्रकी उत्पत्ति दिखायी देती है। यह उत्पत्तिगत विभिन्नता कल्पभेदसे सम्भव होती है। श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्ध (११/३/१०)में कहा गया है,—“पातालतलमारभ्य सङ्कर्षणमुखानलः” अर्थात् कल्पके अन्तमें सङ्कर्षणसे कालाग्निरूप रुद्रकी उत्पत्ति होती है। (अभी पूर्वपक्षके रूपमें कहा जा रहा है—) 'श्रीकृष्ण ही स्वयं प्रभु हैं, नारायणादि उनके विलासरूप स्वांश-तत्त्व, अथवा अन्य कोई आवेशावतार हैं। उसी स्वांश-तत्त्वगत गर्भोदशायीसे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र प्रकट होते हैं—ये सब ईशतत्त्व हैं। शास्त्रकारोंने कभी-कभी ब्रह्मा और रुद्रको जीवश्रेणीका कहा है, परन्तु वह निर्दोष नहीं है। क्योंकि, सदाशिव ही मूलतत्त्व हैं—वे ही 'स्वयं' पदके द्वारा वाच्य हैं। वे ही नारायणादि रूप हैं, इसलिये ब्रह्मादि तीनों देवता उनके ही कार्यभूत हैं। इसके प्रमाणस्वरूप कैवल्योपनिषदमें कहा गया है—“वे पुरुष अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्तरूप, शिव, प्रशान्त, अमृत, ब्रह्मयोनि, आदि-मध्य-अन्तहीन, एक, विभु, चिदानन्द, अरूप, अद्भुत, उमासहाय, परमेश्वर, प्रभु, त्रिलोचन, नीलकण्ठ, भूतयोनि, सबके साक्षी हैं,—मुनिलोग उनका ही ध्यान करके प्रकृतिके उस पार गमन करते हैं। वे ब्रह्मा, वे शिव, वे इन्द्र, वे अक्षर, वे स्वराट्पुरुष, वे ही विष्णु, वे प्राण, कालाग्नि, चन्द्रमादि हैं। जो भी चराचर प्राणी पहले थे और भविष्यमें होंगे, सभी वे ही हैं—उनको जाननेपर ही मृत्युका अतिक्रम किया जा सकता है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।” इसलिये यदि इस प्रकार कहा जाय कि
छठा अध्याय | ३६७