श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 408, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरव्योमाधीशः । शं भावयति स्व-द्वितीयव्यूह-सङ्कर्षणात्पना प्रकृतिविलीनानां जीवानां तत्तदुपाधि-सृष्टयेति शम्भुः, ज्योतीरूपः- चैतन्यविग्रहः। अनेन तदधीशत्वेन कृष्णस्य स्वयंव्रूपत्वं परिचीयते, सास्नादिनेव गोर्गोत्त्वम्। यस्यासौ विलासः स स्वयम्, इत्यतस्तस्य स लिङ्गमुच्यते। या खलु योनिः-महदाद्युपादानभूता, सा त्वपराशक्तिः-त्रिगुणेत्यर्थः। हरेः-तदंशस्य, सङ्कर्षणस्य, कामः-तद्दिदृक्षा-लक्षणः, महदादिसृष्टिफलको भवति, ततो बीजं महदिति। महत् अपरिमितं जीवतत्त्वं, तस्यामाहितं भवति। अत इमा माहेश्वर्यः प्रजा लिङ्ग-योन्यात्मिकाः-पुरुष-प्रकृतिकारणिका जाताः कथ्यन्ते। प्रकृतेरूपसर्जनत्वेन तदधीनत्वात् माहेश्वरी-रिति प्रजा-नाम, इत्युपपादयति शक्तिमानित्यर्द्धकेन। अथोक्तार्थमेव स्फुटयति-तस्मिन्नित। लिङ्गे-तदधीशे, तत्सन्निधौ। महाविष्णुः-सङ्कर्षणः। अर्थात् श्रीबलदेव विद्याभूषण- "शास्त्रवाक्यको ठीकसे समझनेके लिये श्रीरुद्रका ईश्वरश्रेणी और जीवश्रेणी, इन दो प्रकारसे प्रतिपादन करनेके लिये 'श्री' आदि कहा गया है। 'सत्त्वं रजः' (भाः १/२/२३) आदि वाक्योंमें “एक परम पुरुष (श्रीकृष्ण) प्रकृतिके सत्त्व, रजः और तमः, इन तीन गुणोंसे युक्त होकर क्रमशः हरि, ब्रह्मा और हर कहलाते हैं।" इसमें जो 'ईश्वरश्रेणी रुद्र' के सम्बन्धमें कहा गया है, उनके विषयमें 'रुद्र एकादशव्यूह' आदि कहा गया है। इस विषयमें महाभारतमें एकादश व्यूहका इस प्रकार वर्णन है- अजैकपात्, अहिब्रध्न, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित। इसी प्रकार उनके आठ शरीर-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और सोमयाजी हैं। 'प्राय रुद्रके पाँच मुख होते हैं'- ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि जलावरणमें स्थित रुद्र एकमुख हैं। रुद्रको जीवश्रेणीमें भी कहा गया है। ऋक्-श्रुतिमें भगवद्वाक्य - "मैं जिसको इच्छा करता हूँ, उसको उग्र (रुद्र) करता हूँ, उसको ब्रह्मा, उसको ऋषि, उसको बुद्धिमान् करता हूँ।" श्रीनारायणोपनिषदमें- "उसके बाद परमपुरुष श्रीनारायणने प्रजासृष्टिकी इच्छा की। तत्पश्चात् नारायणसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, नारायणसे रुद्र उत्पन्न हुए, नारायणसे प्रजापति, इन्द्र, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य उत्पन्न हुए।" महोपनिषदमें- "पहले एकमात्र नारायण ही थे, ब्रह्मा नहीं थे और रुद्र भी नहीं थे। उसी ध्यानमें अवस्थित नारायणके ललाटसे तीन नेत्रोंसे युक्त, हाथमें त्रिशूल लिये हुए, श्री-सत्य-ब्रह्मचर्य-तपस्या-वैराग्य धारण किये हुए पुरुष उत्पन्न हुए।" मोक्षधर्ममें - "प्रजापतिकी और रुद्रकी मैंने ही सृष्टि की। किन्तु वे लोग मेरी मायासे मोहित होकर मुझे जान नहीं सकते।" इन सब वाक्योंमें जन्मसूचक उक्तिके द्वारा रुद्रका जीव होना समझा जाता है। तत्पश्चात् प्रलय, जैसे, - विष्णुधर्ममें- "विष्णुके तेजसे समृद्ध ब्रह्मा, रुद्र, सूर्य, चन्द्र और अन्यान्य देवतागण जगत्कार्यका अन्त होनेपर उस तेजसे विच्छिन्न हो जाते हैं और उस समय वे प्रभाहीन होकर सभी पञ्चत्व प्राप्त करते हैं।" इसलिये श्रुतिमें कथित 'पहले एकमात्र नारायण ही थे", यह युक्तियुक्त है; अन्यथा इन सभी शास्त्रवाक्योंमें विरोध उपस्थित होता है। रुद्रका जो जीवत्व है, उसे दृष्टान्तरूपमें यहाँ कहा गया है-जैसे, ब्रह्मा। और जहाँ 'भगवदंश' रूपमें कहा गया है, वे 'शेष' के समान कहे गये हैं अर्थात् जिस प्रकार श्रीविष्णुकी शय्याके रूपमें विष्णुकी आधारशक्ति 'शेष' ईश्वरश्रेणीमें हैं और भूधारी 'शेष' तदाविष्ट जीव हैं, उसी प्रकार स्वांशत्व (ईश्वरकोटित्व) एवं विभिन्नांश (जीवकोटित्व) के रूपमें रुद्रको 'भगवदंश' कहा गया है- पुराणादिमें इस प्रकार कहा गया है। 'सत्त्वं रजस्तमः' (भाः १/२/२३) श्लोकमें परमपुरुषका आविर्भाव-स्वरूप जो 'हर' कहा गया ३६६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत