श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/७७-८३ ] 'माहेश्वरी-प्रजा' कहा गया है। परवर्ती 'शक्तिमान्' आधे श्लोकमें यह निर्धारित हुआ है। 'लिङ्गसे' अर्थात् प्रकृतिके अधीश्वर जो महेश्वर हैं, उनसे अर्थात् उनके निकटमें महाविष्णु श्रीसङ्कर्षण आविर्भूत होते हैं॥७७-७८॥ १३) चारों रसोंमें ही श्रीकृष्णदास्य :- पिता-माता-गुरु-सखा-भाव केने नय। कृष्णप्रेमेर स्वभावे दास्य-भाव से करय॥८०॥ अनुवाद-पिता-माता-गुरु अथवा सख्यभाव, कोई भी भाव क्यों ना हो, श्रीकृष्णप्रेमका ऐसा स्वभाव है कि उन सब भावोंमें दास्यभाव ही होता है॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो कोई भी भाव क्यों ना हो, सभी भावोंके अन्तर्गत दास्यभावको स्वीकार करना होगा॥८०॥ स्वयं श्रीकृष्ण ही सभीके प्रभु :- एक कृष्ण-सर्वसेव्य, जगत्-ईश्वर। आर यत सब,-ताँर सेवकानुचर॥८१॥ सेइ कृष्ण अवतीर्ण-चैतन्य-ईश्वर। अतएव आर सब-ताँहार किङ्कर॥८२॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण ही एकमात्र सबके सेव्य और जगत्के ईश्वर हैं। अन्य सभी उनके सेवक-अनुचर हैं। वे श्रीकृष्ण ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये अन्य सभी उनके दास हैं॥८१-८२॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/७०, ८३, ८८, १०२, १०६; ३/५; ४/११-१२; ५/१३१; ७/७-८; मध्यलीला ६/१४७; ८/१३३-१३५; १०/१५; १५/१३९; १८/१९०-१९१; २०/१५२-१५५, २४०, ४००; २१/३४, ९२; २२/७; २४/७१ संख्या आदि द्रष्टव्य हैं॥८१॥ अमृतानुकणिका-सभीके चित्तमें श्रीकृष्णदास्यभाव क्यों उत्पन्न होता है, इसका कारण इस पयारमें बतला रहे हैं। श्रीकृष्ण ही जगत्के ईश्वर, सर्वेश्वर हैं। वे ही एकमात्र सेव्य हैं और अन्य सभी उनके सेवक हैं। सेवक होनेपर भी सेवाकी विचित्रीके निर्वाह हेतु कोई पिता, कोई मातादि भाव पोषणकर श्रीकृष्णके सुखका सम्पादन करते हैं। सभी स्वरूपतः श्रीकृष्णके सेवक हैं, इसलिये वे जिस किसी अभिमानका मनमें पोषण क्यों नहीं करते हों, सभीके चित्तमें दास्यभाव प्रबल है। श्रीकृष्णप्रेमका स्वभाव यही है कि श्रीकृष्णदास्यके भावसे सर्वप्रकारसे श्रीकृष्णको सुखी करने इच्छा चित्तमें अवश्य ही जागेगी॥८०-८२॥ १४) समस्त चित्वस्तुएँ ही उनकी दास :- केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास। ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश॥८३॥ अनुवाद-कोई माने अथवा ना माने, सब उनके दास हैं। जो यह नहीं मानता है, इस पाप (अपराध) के कारण उसका नाश हो जाता है॥८३॥ छठा अध्याय | ३६९