श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
६/७७-८३ ] 'माहेश्वरी-प्रजा' कहा गया है। परवर्ती 'शक्तिमान्' आधे श्लोकमें यह निर्धारित हुआ है। 'लिङ्गसे' अर्थात् प्रकृतिके अधीश्वर जो महेश्वर हैं, उनसे अर्थात् उनके निकटमें महाविष्णु श्रीसङ्कर्षण आविर्भूत होते हैं॥७७-७८॥ १३) चारों रसोंमें ही श्रीकृष्णदास्य :- पिता-माता-गुरु-सखा-भाव केने नय। कृष्णप्रेमेर स्वभावे दास्य-भाव से करय॥८०॥ अनुवाद-पिता-माता-गुरु अथवा सख्यभाव, कोई भी भाव क्यों ना हो, श्रीकृष्णप्रेमका ऐसा स्वभाव है कि उन सब भावोंमें दास्यभाव ही होता है॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो कोई भी भाव क्यों ना हो, सभी भावोंके अन्तर्गत दास्यभावको स्वीकार करना होगा॥८०॥ स्वयं श्रीकृष्ण ही सभीके प्रभु :- एक कृष्ण-सर्वसेव्य, जगत्-ईश्वर। आर यत सब,-ताँर सेवकानुचर॥८१॥ सेइ कृष्ण अवतीर्ण-चैतन्य-ईश्वर। अतएव आर सब-ताँहार किङ्कर॥८२॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण ही एकमात्र सबके सेव्य और जगत्के ईश्वर हैं। अन्य सभी उनके सेवक-अनुचर हैं। वे श्रीकृष्ण ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये अन्य सभी उनके दास हैं॥८१-८२॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/७०, ८३, ८८, १०२, १०६; ३/५; ४/११-१२; ५/१३१; ७/७-८; मध्यलीला ६/१४७; ८/१३३-१३५; १०/१५; १५/१३९; १८/१९०-१९१; २०/१५२-१५५, २४०, ४००; २१/३४, ९२; २२/७; २४/७१ संख्या आदि द्रष्टव्य हैं॥८१॥ अमृतानुकणिका-सभीके चित्तमें श्रीकृष्णदास्यभाव क्यों उत्पन्न होता है, इसका कारण इस पयारमें बतला रहे हैं। श्रीकृष्ण ही जगत्के ईश्वर, सर्वेश्वर हैं। वे ही एकमात्र सेव्य हैं और अन्य सभी उनके सेवक हैं। सेवक होनेपर भी सेवाकी विचित्रीके निर्वाह हेतु कोई पिता, कोई मातादि भाव पोषणकर श्रीकृष्णके सुखका सम्पादन करते हैं। सभी स्वरूपतः श्रीकृष्णके सेवक हैं, इसलिये वे जिस किसी अभिमानका मनमें पोषण क्यों नहीं करते हों, सभीके चित्तमें दास्यभाव प्रबल है। श्रीकृष्णप्रेमका स्वभाव यही है कि श्रीकृष्णदास्यके भावसे सर्वप्रकारसे श्रीकृष्णको सुखी करने इच्छा चित्तमें अवश्य ही जागेगी॥८०-८२॥ १४) समस्त चित्वस्तुएँ ही उनकी दास :- केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास। ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश॥८३॥ अनुवाद-कोई माने अथवा ना माने, सब उनके दास हैं। जो यह नहीं मानता है, इस पाप (अपराध) के कारण उसका नाश हो जाता है॥८३॥ छठा अध्याय | ३६९
[ ६/८३ अनुभाष्य—जीव अपने स्वरूपको भूलकर स्वयंको भोक्ता मानकर श्रीकृष्णसेवासे विमुख होता है। अज्ञानके कारण कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि निरन्तर भगवत्सेवा ही उनका एकमात्र कार्य नहीं है, किन्तु वास्तवमें सभी प्राणी नित्यकाल उनके दास्यमें अवस्थित हैं। भगवत्सेवा ना करनेसे जीवका स्वभाव विपरीत होनेसे उसका अमङ्गल होता है। श्रीचैतन्य महाप्रभुका दासत्व ही अणुचित् जीवका स्वरूप-धर्म है। अपनी इस स्वरूपवृत्तिको भूलकर बद्धजीव जो अन्य चेष्टाएँ करता है, वे केवल संसारके भोगोंके आकर्षण मात्र हैं। चैतन्य उदय होनेपर उसके हृदयमें श्रीचैतन्य महाप्रभुका दास्य स्वभावतः ही प्रकाशित होता है। श्रीचैतन्यसेवाका त्यागकर बद्धजीवके कार्योंमें अन्य वस्तुओंके ऊपर उसका प्रभुत्व दिखलायी देता है, किन्तु उस समय भी वह श्रीचैतन्य महाप्रभुका 'अयोग्य' दासमात्र ही है॥८३॥ अमृताणुकणिका—सभी ही सर्वकारण-कारण श्रीकृष्णके दास और उपासक हैं। जो इस बातकी जितनी उपलब्धि कर पाते हैं, वे उतने ही मुक्त या स्वाधीन हैं। जो इसकी जितनी उपलब्धि नहीं कर पाते, वे उतने ही अमुक्त या पराधीन हैं। इस बात को गीतामें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने कहा है (गीता ९/२४)— “अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥” अर्थात् “मैं ही समस्त यज्ञोंका भोक्ता और प्रभु हूँ, किन्तु जो लोग मुझे स्वरूपतः नहीं जानते, वे संसारमें प्रत्यावर्त्तन करते हैं।” जीवमात्र ही जब श्रीकृष्णका नित्य दास है, तब श्रीकृष्णोपासना प्रत्येक जीवका नित्य धर्म है। श्रीकृष्णकी विस्मृतिके फलस्वरूप नित्य स्वभावसे विच्युत और विरूपग्रस्त होनेपर भी जीवका नित्यधर्म उसका परित्याग नहीं करता; तब वह विकृतस्वभावसे विकृतभावसे विपरीत गतिमें दिखलायी देता है। जो जितने परिमाणमें स्वभावके पथमें हैं, वे उसी परिमाणमें श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं। प्रत्येक जीव ही श्रीकृष्णकी उपासना कर रहे हैं, तो भी जो स्वभावके पथकी विपरीत दिशामें चल रहे हैं, वे अविधिपूर्वक श्रीकृष्णकी उपासना कर रहे हैं। और जो जितना स्वभावके ठीक पथमें चल रहे हैं, वे उतनी विधिपूर्वक उपासना करके क्रमशः ऐकान्तिक, अव्यभिचारी, अद्वयज्ञानावलम्बी, एकायनस्कन्धी (वर्णाश्रमातीत) भागवतावस्था-लाभ एवं विधिकी पूर्ण पराकाष्ठा अनुराग या प्रेम लाभ करते हैं। स्वभावके पूर्णतम-राज्यमें और जो 'अविधि' (रागमार्गमें विधिका विचार ना करके केवल लोभके द्वारा ही प्रवृत्त होकर जो भक्ति) है, उसीमें विधिकी परिपूर्ण-तात्पर्यमयता और चरितार्थता है। गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा (गीता ९/२३)— “येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥” अर्थात् “हे कौन्तेय! जो लोग श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंकी आराधना करते हैं, वे भी अविधिपूर्वक मेरी ही आराधना करते हैं।” जगत्में श्रीकृष्णोपासकके अतिरिक्त और कोई उपासक नहीं हैं, विधिके साथ हो अथवा अविधिके साथ हो, सभी श्रीकृष्णको ही चाहते हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण ही प्रत्येक चेतनस्वरूपके प्राण, आकर्षक और आनन्द-दायक हैं— ३७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/८३-८८ ] “कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निवृतिवाचकः। तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥” (मःभाः उःपः ७१अः ४र्थ श्लोक) अर्थात् “कृष्-धातु-भू अर्थात् सत्तावाचक अथवा आकर्षक; ण-शब्द निवृति अर्थात् परमानन्दवाचक। कृष्-धातुमें ण-प्रत्यय करके उन दोनोंके ऐक्य 'कृष्ण'-शब्दसे परमब्रह्म प्रतिपादित हुआ है।” धर्मक्षेत्र भारतके 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' मन्त्रके उपासक चार्वाक* और ऐसे ही विचार रखनेवाले विश्वके अन्य देशोंके दार्शनिक भी इसी आकर्षक-सत्ताको, इसी निवृति या आनन्दको अर्थात् वे अवैधरूपसे इन्हीं श्रीकृष्णको ही चाहते हैं; अविधिपूर्वक श्रीकृष्णकी ही उपासना करते हैं। वे श्रीकृष्णमायाको 'श्रीकृष्ण' कहकर भ्रमित होते हैं, इसलिये वे स्वाधीनता नहीं लाभ करते हैं॥८३॥ 'चैतन्येर दास मुञि, चैतन्येर दास। चैतन्येर दास मुञि, ताँर दासेर दास॥'८४॥ एत बलि' नाचे, गाय, हुङ्कार गम्भीर। क्षणेके बसिला आचार्य हैञा सुस्थिर ॥ ८५ ॥ अनुवाद—'मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ, श्रीचैतन्यका दास हूँ, मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ, मैं उनके दासका दास हूँ',—ऐसा कहकर गम्भीर हुङ्कार करते हुए श्रीअद्वैताचार्य नाचने, गाने लगते तथा कुछ क्षणके बाद वे स्थिर होकर बैठ जाते ॥ ८४-८५ ॥ श्रीबलदेव और उनके समस्त अंशावतार ही श्रीकृष्णदासाभिमानी :— भक्त-अभिमान मूल श्रीबलरामे। सेइ भावे अनुगत ताँर अंशगणे ॥ ८६ ॥ १) उनके सङ्कर्षणअवतार दासाभिमानी :— ताँर अवतार एक श्रीसङ्कर्षण। भक्त बलि' अभिमान करे सर्वक्षण ॥ ८७ ॥ २) उनके लक्ष्मणावतार दासाभिमानी :— ताँर अवतार आन श्रीयुत लक्ष्मण। श्रीरामेर दास्य तिँहो कैल अनुक्षण ॥ ८८ ॥ *चार्वाकका सिद्धान्त— “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्। भस्मि-भूतस्य देहस्य कुतः पुनागमनो भवेत्॥” अर्थात् जबतक जीओ, तबतक सुखपूर्वक जीओ। सुखपूर्वक जीनेके लिये स्वस्थ देह चाहिये, इसलिये प्रचुर मात्रामें घी पान करो और घीसे बने व्यञ्जन खाओ। यदि तुम्हारे पास घीके लिये धन नहीं है, तो ऋण लेकर भी घी पान करो। ऋण चुकानेकी चिन्ता मत करो, क्योंकि मरनेके बाद यह देह तो जलकर राख बन जायेगी और तुम्हारा पुनागमन कहाँ है, अर्थात् पुनर्जन्म तो होता नहीं। छठा अध्याय | ३७१
[ ६/८६-९५ अनुवाद—भक्त-अभिमानके मूल श्रीबलराम हैं, इसलिये यही भाव उनके अनुगत अंशोंमें भी रहता है। उनके एक अवतार श्रीसङ्कर्षण हैं और वे सदा अपनेको भक्त ही मानते हैं। उनके एक और अवतार श्रीलक्ष्मण हैं और वे प्रतिक्षण श्रीरामचन्द्रकी सेवामें तत्पर रहते हैं॥८६-८८॥ ३) उनके आदि-पुरुषावतार भी भक्ताभिमानी :- सङ्कर्षण-अवतार—कारणाब्धिशायी। ताँहार हृदये भक्तभाव अनुयायी॥८९॥ अनुवाद—सङ्कर्षणके अवतार कारणाब्धिशायी विष्णु हैं। उनके हृदयमें भी भक्त-भाव सदा विराजमान रहता है॥८९॥ ४) उनके अद्वैतावतार भी भक्ताभिमानी :- ताँहार प्रकाश-भेद—अद्वैत-आचार्य। कायमनोवाक्ये ताँर भक्ति सदा कार्य॥९०॥ वाक्ये कहे, ‘मुञि चैतन्येर अनुचर।’ ‘मुञि ताँर भक्त’—मने भावे निरन्तर॥९१॥ जल-तुलसी दिया करे कायाते सेवन। भक्ति प्रचारिया सब तारिला भुवन॥९२॥ अनुवाद—उनके प्रकाश श्रीअद्वैताचार्य हैं, जो तन, मन और वचनसे सदा भक्तिका ही कार्य करते हैं। वे वचनके द्वारा कहते हैं—‘मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ’ और उनके मनमें सदा यही भाव होता है कि मैं उनका भक्त हूँ। श्रीकृष्णको गङ्गाजल और तुलसी अर्पण करके तनसे सेवा करते हैं और भक्तिका प्रचार करके त्रिभुवनका उद्धार करते हैं॥९०-९२॥ ५) उनके शेषावतार भी सेवकाभिमानी :- पृथिवी धरेन येइ शेष-सङ्कर्षण। कायव्यूह करि’ करेन कृष्णेर सेवन॥९३॥ श्रीकृष्णके सभी अंशावतार उनके भक्त :- एइ सब हय श्रीकृष्णेर अवतार। निरन्तर देखि सबार भक्तिर आचार॥९४॥ अनुवाद—शेष-सङ्कर्षण जो पृथ्वीको धारण करते हैं, वे कायव्यूह (छत्रादि रूप) धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। श्रीबलरामसे लेकर शेष-सङ्कर्षण तक, ये सब श्रीकृष्णके अवतार हैं और इन सबमें निरन्तर भक्तिका आचरण देखा जाता है॥९३-९४॥ अनुभाष्य—‘कायव्यूह’ अर्थात् दस देह धारणकर वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। संख्या ७६ द्रष्टव्य है॥९३॥ ५) भक्तावतारकी सर्वश्रेष्ठ मर्यादा :- ए-सबाके शास्त्रे कहे ‘भक्त-अवतार’। ‘भक्त-अवतार’-पद उपरि सबार॥९५॥
३७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/९५-९९ ] अनुवाद—शास्त्रोंमें इन सबको ‘भक्त-अवतार’ कहा जाता है। ‘भक्त-अवतार’ का पद सबसे श्रेष्ठ माना जाता है॥९५॥ अनुभाष्य—भगवान् अपना ऐश्वर्य प्रकाश करनेके लिये जब प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तब जीवको भजनकी शिक्षा देनेके लिये उनका जो आदर्श भक्तावतार होता है, वह सभी ईश्वरके अवतारोंकी लीलाओंकी अपेक्षा जीवके लिये सर्वश्रेष्ठ और मङ्गलप्रद है। ऐश्वर्य-प्रधान अवतारोंकी लीलाओंको प्राकृत बुद्धिसे देखकर जीव कभी मोहित होकर उनके अनुकरणके प्रयासमें दुर्गतिको प्राप्त करता है, किन्तु भगवान्के भक्तरूपमें अवतारोंके आदर्शको देखकर जीवका अहङ्कार वैसा कुफल उत्पन्न नहीं कर पाता। जैसे, आजकल अनेक व्यक्ति स्वयंको 'वासुदेवादि' अवतार घोषित करके प्रतिष्ठा पानेका प्रयास करते हैं, परन्तु ऐसे लोगोंको मरनेके बाद सियारकी योनि प्राप्त होती है। भक्तावतारोंके स्वरूपदर्शनमें विमूढ़ व्यक्तियोंकी अर्थात् जो उनको समझ नहीं पाते, उनकी ही इस प्रकार दुर्गति होती है। मिथ्या अहङ्कार बद्धजीवको भगवत्-ऐश्वर्यकी कामनामें प्रमत्त करके मायावादी बना देता है॥९५॥ अंशी श्रीकृष्णके प्रति अंशावतारका ज्येष्ठ-कनिष्ठ व्यवहार :- एकमात्र ‘अंशी’—कृष्ण, ‘अंश’—अवतार। अंशी-अंशे देखि ज्येष्ठ-कनिष्ठ-आचार॥९६॥ कनिष्ठ अंशावतारकी ज्येष्ठ अंशीके प्रति प्रभु-बुद्धि और कनिष्ठ अंशावतारका ज्येष्ठ अंशीके प्रति दासाभिमान :- ज्येष्ठ-भावे अंशीते हय प्रभु-ज्ञान। कनिष्ठ-भावे आपनाते भक्त-अभिमान ॥ ९७॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण एकमात्र अंशी हैं और अन्य सभी अवतार उनके अंश हैं। अंशी और अंशमें ज्येष्ठ-कनिष्ठका आचरण देखा जाता है। ज्येष्ठ-भावसे अंशीमें प्रभु होनेका अभिमान होता है और कनिष्ठ-भावसे अंशका अपनेमें भक्ताभिमान होता है॥९६-९७॥ अनुभाष्य—खण्डित वस्तुको ‘अंश’ कहा जाता है और जिसका खण्ड होता है, उस वस्तुको ‘अंशी’ कहते हैं। अंशीका अंश, अखण्डका खण्ड—अंशी और अखण्डके अन्तर्गत हैं। प्रभु अंशी हैं और भक्त अंश हैं। इस ‘प्रभु’ और ‘भक्त’ के परस्पर सम्बन्धमें ज्येष्ठ-कनिष्ठ या बड़े-छोटेका विचार जुड़ा है। बड़ेका नाम ‘प्रभु’, छोटेका नाम ‘भक्त’ है। श्रीकृष्ण अंशी हैं, श्रीबलदेव और उनके समानधर्ममें अवस्थित महाविष्णुके सभी प्रकाश उनके अंश हैं। श्रीकृष्णका स्वयंमें प्रभु-अभिमान है और श्रीबलदेवादिका स्वयंमें भक्ताभिमान है॥९७॥ श्रीकृष्णके निकट भक्तका ही सर्वश्रेष्ठ सम्मान :- कृष्णेर समता हैते बड़ भक्तपद। आत्मा हैते कृष्णेर भक्त हय प्रेमास्पद॥९८॥ आत्मा हैते कृष्ण, भक्ते बड़ करि' माने। इहाते बहुत शास्त्र-वचन-प्रमाणे ॥ ९९॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी समानतासे श्रीकृष्णके भक्तका पद बड़ा है, क्योंकि भक्त श्रीकृष्णको छठा अध्याय | ३७३
[ ६/९८-१०२ उनकी आत्मासे भी अधिक प्रिय हैं। श्रीकृष्ण भक्तको अपनेसे भी बड़ा मानते हैं, अनेक शास्त्र-वचन इस बातके प्रमाण हैं॥९८-९९॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके समान होनेके विचारकी अपेक्षा श्रीकृष्णभक्त-पद अर्थात् भक्तोंकी श्रीकृष्णसेवा श्रेष्ठ है। क्योंकि श्रीकृष्णका स्वयंके प्रति जितना प्रेम है, उससे कहीं अधिक उनका अपने सेवकके प्रति प्रेम है। श्रीभागवत (९/४/६८) में—“साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयन्त्वहम्। मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥” अर्थात् “साधु मेरा हृदय हैं और साधुओंका हृदय मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त किसीको नहीं जानते और मैं भी उनके अतिरिक्त किसी अन्यको तनिक भी नहीं जानता हूँ।” यह श्लोक ही इसका प्रकृष्ट उदाहरण है॥९८॥ श्रीमद्भागवत (११/१४/१४)— न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥१००॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव! ब्रह्मा, सङ्कर्षण, लक्ष्मी और स्वयं मैं, मुझे इतने प्रिय नहीं हैं, जितने मेरे भक्त तुम मुझे प्रिय हो॥१००॥ अनुभाष्य—अपने परमभक्त उद्धवसे श्रीकृष्णने कहा— मे (मम) भक्त भवान् (उद्धवः) यथा प्रियतमः आत्मयोनिः (ब्रह्मा) तथा न; शङ्करः तथा न; सङ्कर्षणः च न तथा प्रियतमः; श्रीः (लक्ष्मीः) तथा न, आत्मा तथा न एव (अहं श्रीमूर्त्तिरपि नैव प्रियतमा)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१००॥ भक्तभावमें ही श्रीकृष्णका स्वमाधुर्यास्वादन :— कृष्णसाम्ये नहे ताँर माधुर्यास्वादन। भक्तभावे करे ताँर माधुर्य चर्वण॥१०१॥ शास्त्रेर सिद्धान्त एइ,—विज्ञेर अनुभव। मूढ़लोक नाहि जाने भावेर वैभव॥१०२॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी समानता होनेसे उनके माधुर्यका आस्वादन सम्भव नहीं है। भक्तभावसे ही उनके माधुर्यका पूर्ण आस्वादन हो सकता है। यही शास्त्रोंका सिद्धान्त है, जिन्होंने श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन किया है, उन विज्ञ महापुरुषोंका यही अनुभव है। परन्तु मूर्ख लोग इस भावकी महिमाको नहीं जानते॥१०१-१०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णमें समता बुद्धि करनेसे उनके माधुर्यका आस्वादन नहीं हो सकता॥१०१॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये षष्ठ परिच्छेद। छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—जीवको सारूप्यादि मुक्तिमें अथवा विष्णुतत्त्वमें श्रीकृष्णके साथ साम्यभाव रहनेके कारण श्रीकृष्णदास्यके माधुर्यका यथारूप आस्वादन नहीं होता। भक्तभावमें श्रीकृष्णके साथ साम्यभाव (भोक्ताका भाव) नहीं रहनेके कारण, चर्व्य (चबाये जानेवाली) वस्तुके रसास्वादनकी ३७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/१०१-१०८ ] भाँति श्रीकृष्ण-मधुरिमाकी पूर्ण उपलब्धि होती है। प्रभुत्वके लोभसे मूर्खतावशतः साधारण लोग दास्यभावकी पराकाष्ठाको अनुभव करनेमें स्वभावतः ही अक्षम हैं। विशेष अभिज्ञ व्यक्ति और शास्त्रोंमें प्रगाढ़रूपमें प्रविष्ट व्यक्ति ही इस सूक्ष्म विषयको समझ सकते हैं॥१०१-१०२॥ भक्तभाव लेकर ही श्रीनित्यानन्द-रामादि विष्णुवर्गका श्रीकृष्णमाधुर्यास्वादन :- भक्तभाव अङ्गीकरि' बलराम, लक्ष्मण। अद्वैत, नित्यानन्द, शेष, सङ्कर्षण॥१०३॥ कृष्णेर माधुर्यरसामृत करे पान। सेइ सुखे मत्त, किछु नाहि जाने आन॥१०४॥ अनुवाद-भक्त-भावको अङ्गीकार करके श्रीबलराम, श्रीलक्ष्मण, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीशेष और श्रीसङ्कर्षण श्रीकृष्णके माधुर्यरसका पानकर उस सुखमें इतने मत्त हो जाते हैं कि उन्हें और किसी बातका ज्ञान ही नहीं रहता॥१०३-१०४॥ स्वयं श्रीकृष्णका भी अपने माधुर्यके आस्वादनके लिये भक्तभावमें श्रीगौररूपमें अवतार :- अन्येर आछुक कार्य, आपने श्रीकृष्ण। आपन-माधुर्य-पाने हइला सतृष्ण॥१०५॥ स्वमाधुर्य आस्वादिते करेन यतन। भक्तभाव बिनु नहे ताहा आस्वादन॥१०६॥ अनुवाद-औरोंकी बात क्या कहें, स्वयं श्रीकृष्णमें भी अपने माधुर्यके आस्वादनकी तृष्णा होती है। वे उसका आस्वादन करनेका प्रयास करते हैं, परन्तु भक्त-भावको अङ्गीकार किये बिना वे उसका आस्वादन नहीं कर पाते॥१०५-१०६॥ अनुभाष्य-आदिलीला ४/१३७-१५८ द्रष्टव्य हैं। भक्तोंकी भजनीय वस्तु श्रीकृष्णकी माधुरी है। वे किस प्रकारसे उस माधुर्यका आस्वादन करते हैं, भक्तभावको स्वीकार किये बिना उसे अनुभव करना असम्भव जानकर श्रीकृष्ण भी स्वयं भक्त बन गये॥१०५-१०६॥ भक्तभाव अङ्गीकरि' हैला अवतीर्ण। श्रीकृष्णचैतन्यरूपे सर्वभावे पूर्ण॥१०७॥ नाना-भक्तभावे करेन स्वमाधुर्य पान। पूर्वे करियाछि एइ सिद्धान्त व्याख्यान॥१०८॥ अनुवाद-इसलिये भक्तभावको अङ्गीकार करके श्रीकृष्ण सभी भावोंसे पूर्ण श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए। मैंने पहले ही इस सिद्धान्तकी व्याख्या की है कि भगवान् विभिन्न भक्तोंके भावोंको ग्रहणकर अपने माधुर्यका आस्वादन करते हैं॥१०७-१०८॥ अनुभाष्य-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-इन पाँच विभिन्न रसोंका आस्वादन करनेके लिये उन-उन भावोंको अङ्गीकारकर श्रीगौरहरि सब प्रकारसे परिपूर्ण हैं। विभिन्न रसोंके आश्रित भक्तोंके भावोंको ग्रहणकर सभी भावोंसे पूर्ण होकर श्रीगौरचन्द्र अपने माधुर्यका पान करते हैं॥१०७-१०८॥ छठा अध्याय | ३७५
[ ६/१०९-११३ विष्णुके सभी अवतारोंमें ही भक्तभाव :- अवतारगणेर भक्तभावे अधिकार। भक्तभाव हैते अधिक सुख नाहि आर॥१०९॥ अनुवाद—[सभी अवतार अंशी श्रीकृष्णके अंश हैं और अंशका कर्त्तव्य अंशीकी सेवा करना हैं, इसलिये] अवतारोंका भक्तभावमें ही अधिकार है। भक्तभावके सुखसे अधिक सुख कहीं भी नहीं है॥१०९॥ अनुभाष्य—विष्णुके सभी अवतारोंका श्रीकृष्णसेवाके उद्देश्यसे भक्तभावमें अवतीर्ण होनेका अधिकार है। ईश्वरभावकी अपेक्षा भक्तभावके द्वारा ही सेव्यकी सेवामें अधिक सुखका आस्वादन होता है॥१०९॥ श्रीसङ्कर्षण आदि-भक्तावतार :- मूल भक्त-अवतार श्रीसङ्कर्षण। भक्त-अवतार तँहि अद्वैते गणन॥११०॥ अनुवाद—श्रीसङ्कर्षण भक्त-अवतारोंके मूल हैं। श्रीअद्वैतकी भी गणना भक्त-अवतारोंमें की जाती है॥११०॥ अनुभाष्य—श्रीअद्वैतप्रभु विष्णुतत्त्व होनेपर भी उन्होंने श्रीचैतन्य महाप्रभुके पार्षदरूपमें सेवकलीलाका ही प्रदर्शन किया। अपनेमें सेवकाभिमानसे ही विष्णुतत्त्वका भक्तावतारत्व है। महावैकुण्ठमें श्रीसङ्कर्षण चतुर्व्यूहके ईश्वररूपमें अवस्थित होकर भी मूल-भक्तावतार हैं। श्रीसङ्कर्षणके एक अंश कारणजलमें शयन करनेवाले जो महाविष्णु हैं, उनके प्रकाशभेदके कारण ही हम निमित्त और उपादानमें ईक्षणके सम्बन्धमें जान सकते हैं, इसलिये महाविष्णुके अवतार श्रीअद्वैताचार्य विष्णुतत्त्व हैं। श्रीसङ्कर्षणके सभी प्रकाशभेद स्वयंरूप श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होनेके कारण, श्रीअद्वैतप्रभु भी श्रीगौर-कृष्णके सेवक अथवा भक्तावतार हैं॥११०॥ इति अनुभाष्ये षष्ठ परिच्छेद। छठे अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीअद्वैतप्रभुकी महिमा :- अद्वैत-आचार्य गोसाञिर महिमा अपार। याँहार हुङ्कारे कैल चैतन्यावतार॥१११॥ सङ्कीर्त्तन प्रचारिया सब जगत् तारिल। अद्वैत-प्रसादे लोक प्रेमधन पाइल॥११२॥ अद्वैत-महिमा अनन्त, के पारे कहिते। सेइ लिखि, येइ शुनि महाजन हैते॥११३॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यकी महिमा अपार है। उनकी हुङ्कारसे श्रीचैतन्यावतार हुआ, सङ्कीर्तनका प्रचार करके उन्होंने जगत्का उद्धार किया और उनकी कृपासे लोगोंने श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनको प्राप्त किया। श्रीअद्वैतकी महिमा अनन्त है, कौन इसका वर्णन कर सकता है? मैंने तो जो महापुरुषोंसे सुना है, उसीका यहाँ वर्णन किया है॥१११-११३॥ ३७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/११४-११८ ] आचार्यप्रभुकी वन्दना :- आचार्यचरणे मोर कोटि नमस्कार। इथे किछु अपराध ना लबे आमार ॥ ११४ ॥ तोमार महिमा-कोटिसमुद्र अगाध। ताहार इयत्ता कहि, -ए बड़ अपराध ॥ ११५ ॥ जय जय जय श्रीअद्वैत आचार्य। जय जय श्रीचैतन्य, नित्यानन्द आर्य ॥ ११६ ॥ दुइ श्लोके कहिल अद्वैत-तत्त्वनिरूपण। पञ्चतत्त्वेर विचार किछु शुन, भक्तगण ॥ ११७ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके चरणकमलोंमें मेरा कोटि बार नमस्कार है, आप मेरे अपराधको ग्रहण ना करें। आपकी महिमा तो करोड़ों समुद्रोंकी भाँति अगाध है और मैंने केवल इतना मात्र ही वर्णन किया—यह एक महान अपराध है। श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो, जय हो। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। मङ्गलाचरणके बारह और तेरह, इन दो श्लोकोंके द्वारा मैंने श्रीअद्वैत-तत्त्वका निरूपण किया। अब पञ्चतत्त्वका कुछ विचार श्रवण करें ॥ ११४-११७ ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ ११८ ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे श्रीअद्वैततत्त्वनिरूपणं नाम षष्ठः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ ११८ ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें श्रीअद्वैत-तत्त्व निरूपण नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त। छठा अध्याय | ३७७
पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूप-स्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥ पञ्चतत्त्व—एक वस्तु, नाहि किछु भेद। रस आस्वादिते तत्त्व विविध विभेद॥
सातवाँ अध्याय सातवें अध्यायका कथासार—इस सातवें अध्यायमें पञ्चतत्त्वका महात्म्य वर्णित हुआ है। पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णचैतन्यने अवतीर्ण होकर जगत्में नाम-प्रेमदान करके प्रेमकी महाबाढ़ ला दी। मायावादी, निन्दकादि कुछ प्रकारके कुतार्किक उस बाढ़से दूर भाग गये। उनका भी उद्धार करनेकी इच्छासे महाप्रभुने संन्यास ग्रहणकर शुद्धभक्तिका प्रचार करते हुए उन सभी लोगोंको भी अपने श्रीचरणोंमें आकर्षित किया। काशीवासी मायावादी संन्यासियोंका उद्धार करनेकी इच्छासे वाराणसी धाममें भक्तोंके द्वारा अनुरोध किये जानेपर किसी ब्राह्मणके घरपर उन सब संन्यासियोंको एकत्रित देखकर पहले अपने स्वरूपके ऐश्वर्यको दिखाकर उनकी श्रद्धा आकर्षित की। उसके बाद उनके द्वारा जिज्ञासा किये जानेपर मायावाद-सिद्धान्तके निराधार अर्थ प्रदर्शित करके श्रीशङ्कराचार्यके मतके सब प्रकारके दोष दिखलाये। भगवद्दर्शनरूप सुकृतिके बलपर उनको भक्तिपथमें लाकर अपनी कृपा दान की। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णचैतन्यकी महावदान्यताका वर्णन :— अगत्येकगतिं नत्वा हीनार्थ्याधिकसाधकम्। श्रीचैतन्यं लिख्यतेऽस्य प्रेमभक्तिवदान्यता ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अगति अथवा अकिञ्चनोंकी गति, परमार्थहीन व्यक्तिके महत्-अर्थसाधक श्रीचैतन्यको नमस्कार करके, उनकी प्रेमभक्तिकी वदान्यता वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ अनुभाष्य—अगत्येकगतिम् (अगतीनाम् आश्रयान्तर-रहितानाम् एका अनन्यगतिः शरणं तथाभूतं) हीनार्थ्याधिकसाधकं (अर्थेन परमार्थेन हीनाः वञ्चिताः हीनार्थाः, प्रयोजनानि धर्मार्थकाममोक्षादयो वा, तेभ्यः अधिकं महत्तरं पञ्चम-पुरुषार्थ-रूपं कृष्णप्रेम तस्य साधकं प्रदातारं) श्रीचैतन्यं नत्वा (प्रणम्य) अस्य (भगवतः श्रीकृष्णचैतन्यस्य) प्रेमभक्ति-वदान्यता (कृष्णप्रेमभक्ति-प्रदानरूप-महाकारुण्यं) लिख्यते (वर्ण्यते)। श्लोक-भावानुवाद—आश्रयरहित व्यक्तिकी एकमात्र शरण, परमार्थहीनको धर्म-अर्थ-काम-मोक्षसे भी अधिक महत्तर पञ्चम-पुरुषार्थरूप प्रेमको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यको प्रणाम करके, उनकी श्रीकृष्णप्रेमभक्ति प्रदानरूपी महाकरुणाका वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। ताँहार चरणाश्रित, सेइ बड़ धन्य॥ २॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। उनके चरणोंका आश्रय करनेवाले व्यक्ति भी परम धन्य हैं॥ २॥ 'वन्दे गुरून्' श्लोकके छः तत्त्वोंमें 'गुरु'-तत्त्वके अतिरिक्त पञ्चतत्त्वका विचार आरम्भ; अभेद होनेपर भी रसास्वादनके लिये पाँच भेद :— पूर्वे गुर्वादि छय तत्त्वे कैल नमस्कार। गुरुतत्त्व कहियाछि, एबे पाँचरे विचार॥ ३॥
[ ७/३-६ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रथम अध्यायमें दीक्षागुरु और शिक्षागुरुके भेदसे गुरुतत्त्वका वर्णन कर चुका हूँ। “वन्दे गुरुनीशभक्तान्” श्लोकमें छह तत्त्व कहे हैं। अब इस श्लोकमें गुरुतत्त्वके बाद अन्य पाँच तत्त्वोंका विचार कर रहा हूँ॥३॥ पञ्चतत्त्व अवतीर्ण चैतन्येर सङ्गे। पञ्चतत्त्व लञा करेन सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥४॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके साथ कुल पाँच तत्त्व अवतीर्ण हुए हैं और श्रीमन्महाप्रभु इन पाँच तत्त्वोंको लेकर ही आनन्दपूर्वक सङ्कीर्तन करते हैं॥४॥ पञ्चतत्त्व-एक वस्तु, नाहि किछु भेद। रस आस्वादिते तत्त्व विविध विभेद॥५॥ अनुवाद-वास्तवमें ये पाँचों तत्त्व एक ही वस्तु हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। केवल रस-वैचित्रीका आस्वादन करनेके लिये एक ही तत्त्व इन पाँच भेदोंसे प्रकट होते हैं॥५॥ अनुभाष्य-शक्तिमान् वस्तु (भगवान्) की पाँच विभिन्न प्रकारकी लीलाओंका परिचय पञ्चतत्त्वमें प्रकाशित होता है। भगवान्में द्वैतभाव नहीं होनेके कारण एक होनेपर भी उनमें पाँच प्रकारकी विचित्रताएँ हैं। ये विचित्रताएँ नीरस भावको त्यागकर सरस बनानेके उद्देश्यसे उनका लीलावैशिष्ट्य है। “परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते"-इस श्रुतिवाक्यसे यह जाना जाता है कि अद्वयज्ञानवस्तुका विविध-शक्तिभेद नित्यकाल अवस्थित है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य प्रभु, श्रीगदाधर पण्डित और श्रीवासादि पञ्चतत्त्वमें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, परन्तु रसास्वादनके उद्देश्यसे विचित्रलीलामय तत्त्व ही 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप', 'भक्तावतार', 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-इन पाँच प्रकारके विविध-भेदोंसे युक्त हैं। इन पञ्चतत्त्वमें 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप' और 'भक्तावतार' ही क्रमशः 'स्वयं', 'प्रकाश' और 'अंश' के रूपमें प्रभु-विष्णुतत्त्व हैं। 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-विष्णुतत्त्वके अन्तर्गत उनके आश्रित अभिन्न-शक्तितत्त्व हैं। वे वस्तुसे अभिन्न रसके उपकरण-रूपमें रसमयविग्रहसे युक्त हैं, इसलिये उनमें परस्पर भेद नहीं है। 'आराधक' और 'आराध्य'-दोनोंमें किसी एकके अभावमें लीलाका रसास्वादन नहीं होता॥५॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकामें अन्तिम श्लोककी व्याख्या :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूप-स्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके भक्तरूप, भक्तस्वरूप, भक्तावतार, भक्त और भक्तशक्ति-इन पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥ अनुभाष्य-भक्त-रूप-स्वरूपकं (भक्तभावमयः शुद्धकलेवरः निजास्वादकपरः श्रीगौर, भ्रातृस्वरूपधृक् नित्यानन्दश्च क्रमेण रूपं स्वरूपञ्च यस्य सः तं), भक्तावतारं (अद्वैतं), भक्ताख्यं (शान्तदास्यादिरसाश्रितं ३८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/६-१० ] श्रीवासादि), भक्तशक्तिकं (गदाधर-दामोदर-रामानन्दादि) पञ्चतत्त्वात्मकं (पञ्चानां तत्त्वानां आत्मा स्वरूपं यस्य तं) कृष्णं (कृष्णचैतन्यदेवं) नमामि। श्लोक-भावानुवाद-भक्तभावमय, शुद्ध कलेवर और अपने माधुर्यके आस्वादक श्रीगौर और भ्राताका स्वरूप धारणकर श्रीनित्यानन्द प्रभु क्रमशः रूप और स्वरूप हैं जिनके वे, भक्तावतार (श्रीअद्वैताचार्य), भक्त (शान्त-दास्यादि रसाश्रित श्रीवासादि) और भक्तशक्ति (गदाधर पण्डित, स्वरूपदामोदर, रायरामानन्दादि)-इस प्रकार पञ्चतत्त्व जिनका आत्म स्वरूप है, उन श्रीकृष्णचैतन्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥ स्वयंरूप श्रीनन्दनन्दन ही सर्वेश्वर हैं; जितने भी विष्णु, वैष्णव और धाम-सेवोपकरण हैं, जीव एवं प्रधान हैं, सभी श्रीकृष्णके सेवक हैं :- स्वयं भगवान् कृष्ण एकले ईश्वर। अद्वितीय, नन्दात्मज, रसिकशेखर ॥७॥ अनुवाद-रसिकशेखर श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् और सबके एकमात्र नियन्ता हैं। वे अद्वितीय हैं अर्थात् उनसे बड़ा अथवा उनके समान दूसरा कोई नहीं है, तो भी वे नन्दमहाराजके पुत्रके रूपमें नरलीला करते हैं॥७॥ रासादि-विलासी, व्रजललना-नागर। आर यत सब देख, -ताँर परिकर ॥८॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण रासादि लीलामें विलास करते हैं और व्रजगोपियोंके प्रियतम हैं। और सभी जितने हैं, वे सभी उनके परिकर हैं॥८॥ वही श्रीकृष्ण ही श्रीगौर :- सेइ कृष्ण अवतीर्ण श्रीकृष्णचैतन्य। सेइ परिकरगण सङ्गे सब धन्य ॥९॥ अनुवाद-वही श्रीकृष्ण अब श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें अपने उन परिकरोंके साथ अवतीर्ण हुए हैं। वे परिकर भी उनके समान महिमाशाली हैं॥९॥ श्रीकृष्णचैतन्य ही सर्वेश्वर होकर भी वश्यभावमय :- एकले ईश्वर-तत्त्व चैतन्य-ईश्वर। भक्तभावमय ताँर शुद्ध कलेवर ॥ १० ॥ अनुवाद-केवल श्रीचैतन्य महाप्रभु ही ईश्वर-तत्त्व (स्वयं भगवान्) हैं। वे स्वयं ही अपने चिदानन्दमय शुद्ध कलेवरमें भक्तभावको अङ्गीकार करके प्रकट हुए हैं॥१०॥ अनुभाष्य-“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्”-इस श्रुतिमन्त्रमें उद्दिष्ट असंख्य चिद्वस्तुओंमें एकमात्र परमेश्वर-श्रीचैतन्यदेव हैं। मायावादी लोग अणुचित् शक्तिसमूह (जीवों) का विभुचित् (ब्रह्म) के साथ समन्वय करनेपर जिस प्रकारसे भ्रान्त हुए हैं, उसे दूर करनेके लिये इस पद्यकी अवतारणा हुई है। श्रीचैतन्यदेव व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णसे अभिन्न होकर भी श्रीकृष्णको भजनीय-वस्तु मानकर उन्हींका ही सेवाभावमय विग्रह धारण करते हैं। इस भगवद्विग्रहको कोई जड़भोगके विषय-विग्रहकी भावना करके प्रपञ्चके अन्तर्गत जीवश्रेणीमें नहीं मानना चाहिये। सातवाँ अध्याय | ३८१
[ ७/१०-१४ इसलिये श्रीचैतन्य-विग्रहको केवल प्रपञ्चके अन्तर्गत साधक-विग्रह नहीं कहा गया है। विशुद्धसत्त्वमें प्रकटित होनेके कारण उस रस-विग्रहका वास्तविक परिचय सत्त्वसे उज्ज्वल हृदयके द्वारा ही हो सकता है। श्रीचैतन्यदेवने स्वयं परमेश्वर होनेपर भी सेवकोचित लीलाका प्रदर्शन किया है—भोक्ताकी लीलाका नहीं। तमोमय दर्शनसे उनकी श्रीमूर्तिको इन्द्रिय-तर्पणरत कोई यन्त्रविशेष मानना निषिद्ध हुआ है॥१०॥ स्वमाधुर्य्यास्वादनके लिये ही श्रीकृष्णका ‘भक्तरूपमें’ श्रीगौरावतार :— कृष्णमाधुर्य्येर एक अद्भुत स्वभाव। आपना आस्वादिते कृष्ण करे भक्तभाव ॥ ११ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमाधुर्य्यका एक अद्भुत स्वभाव है, जिसका आस्वादन करनेके लिये स्वयं श्रीकृष्ण भी ललायित हो जाते हैं, परन्तु भक्तभावके बिना उसका आस्वादन सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णने भक्तभावको अङ्गीकार किया॥११॥ अनुभाष्य—समस्त माधुर्य्यके आश्रय श्रीकृष्णकी एक अपूर्व चित्तवृत्ति यह है कि वे स्वयं विषय-विग्रह होकर भी आश्रय अथवा पूजकका भाव ग्रहण करके विषय-विग्रहकी सेवाके आस्वादनमें रत हैं। तो भी, श्रीचैतन्यदेव केवल आश्रयभावमय-विग्रह मात्र नहीं है, अपितु वे स्वयंरूप वस्तु हैं॥११॥ श्रीनिताइ—‘भक्तस्वरूप’, श्रीअद्वैत—‘भक्तावतार’ :— इथे भक्तभाव धरे चैतन्य गोसाञि। ‘भक्तस्वरूप’ ताँर नित्यानन्द भाइ ॥ १२ ॥ ‘भक्त-अवतार’ ताँर आचार्य गोसाञि। एइ तिन तत्त्व सबे प्रभु करि’ गाइ ॥ १३ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण भक्तभावको अङ्गीकारकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं और उनके भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीकृष्णके ‘भक्तस्वरूप’ हैं। श्रीअद्वैताचार्य प्रभु श्रीकृष्णके ‘भक्तावतार’ हैं। [श्रीकृष्णचैतन्य—भक्तरूप तत्त्व, श्रीनित्यानन्द—भक्तस्वरूप तत्त्व और श्रीअद्वैताचार्य—भक्तावतार तत्त्व]—इन तीनों तत्त्वोंको सभी प्रभु कहते हैं॥१२-१३॥ श्रीनिताइ एवं श्रीअद्वैत,—दोनों ईश्वरोंके भी ईश्वर श्रीगौर :— एक महाप्रभु, आर प्रभु दुइजन। दुइ प्रभु सेवे महाप्रभुर चरण ॥ १४ ॥ अनुवाद—इनमें एक श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं भगवान् होनेके कारण महाप्रभु हैं और अन्य दो—श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैत, प्रभु हैं। वे दोनों प्रभु महाप्रभुके चरणोंकी सेवा करते हैं॥१४॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभुको प्रणाम करते हुए श्रीरूपगोस्वामी कहते हैं— “नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते। कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥” महाप्रभु स्वयंरूप श्रीकृष्ण हैं। महावदान्य-लीलाका उनका नाम श्रीकृष्णचैतन्य है। सर्वापेक्षा श्रेष्ठ शिक्षक होनेसे महाप्रभु महावदान्य हैं। अन्यान्य शिक्षक अनुग्रह प्रकाश करनेके कारण ३८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
'वदान्य' हैं, किन्तु महाप्रभु शिक्षकोंके भी शिक्षक होनेके कारण 'महावदान्य' हैं। श्रीकृष्ण सेवासे ही सन्तुष्ट होते हैं—यह बात ही महाप्रभु कहते हैं। श्रीकृष्णसेवाका त्याग करनेसे ही सभी असुविधाएँ आती हैं। महाप्रभुका आशीर्वाद है—"कृष्णे मतिरस्तु"। श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके मनोभिलाषानुसार कार्य करके उन्हें नित्य निरन्तर आनन्द प्रदान करते हैं। उनमें नित्य आनन्द है। श्रीनित्यानन्द प्रभु भगवत्स्वरूप-स्वयंरूप नहीं होनेपर भी स्वयंप्रकाश हैं। स्वयंप्रकाश-तत्त्व स्वयंरूपको आनन्द प्रदान करते हैं। महाप्रभु अपनी लीलाकी सहायताके लिये अपने स्वयंरूपको प्रकाश करते हैं। श्रीअद्वैत प्रभु भी विष्णुतत्त्व हैं। सृष्टिके उपादान कारण श्रीअद्वैत प्रभु हैं; उपादान और निमित्त, दोनों कारणोंके मूल स्वयंप्रकाश श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैत प्रभु, दोनों ही महाप्रभुकी सेवा करते हैं और उनकी लीलाके सहायक हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु दस-देह धारणकर महाप्रभुकी सेवा करते हैं॥१४॥ तीन तत्त्व-आराध्य, और चौथे तथा पाँचवें तत्त्व-आराधक :- एइ तिन तत्त्व,–'सर्वाराध्य' करि' मानि। चतुर्थ ये भक्ततत्त्व,—'आराधक' करि' जानि॥१५॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु-ये तीन तत्त्व सभीके आराध्य हैं। चौथे तत्त्व जो भक्ततत्त्व हैं, वे 'आराधक' के रूपमें जाने जाते हैं॥१५॥ अनुभाष्य-पञ्चतत्त्वके स्वरूप-वर्णनमें हम लोग श्रीमन्महाप्रभुको ही सर्वश्रेष्ठ परतत्त्व और श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीअद्वैत प्रभु-इन दोनोंको उनके अधीन 'ईश्वर-तत्त्व' जान सकते हैं। परमेश्वर और दो ईश्वर-प्रकाश,-सभी परतत्त्व होनेके कारण अन्य सभी तत्त्वोंके आराध्य हैं। चौथे शुद्धभक्त-तत्त्व और पाँचवें अन्तरङ्गभक्त-तत्त्व-ये दोनों ही 'आराधक'-तत्त्व हैं। 'आराध्य' (श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु) सेवकरूपी ये दो तत्त्व 'आराधक' (श्रीवासादि शुद्धभक्तों और श्रीगदाधरादि अन्तरङ्ग भक्तों) के पूज्य होनेपर भी सेव्य श्रीगौराङ्गकी सेवावृत्तिमें अवस्थित हैं॥१४-१५॥ श्रीवासादि-भक्ततत्त्व :- श्रीवासादि यत कोटि कोटि भक्तगण। 'शुद्धभक्त'-तत्त्वमध्ये ताँ-सबार गणन॥१६॥ गदाधरादि-शक्तितत्त्व :- गदाधर-पण्डितादि प्रभुर 'शक्ति'-अवतार। 'अन्तरङ्ग-भक्त' करि' गणन याँहार॥१७॥ अनुवाद-श्रीवास ठाकुरादि जितने असंख्य भक्त हैं, उन सभीकी 'शुद्धभक्त'-तत्त्वके रूपमें गणना होती है। श्रीगदाधर पण्डितादि महाप्रभुके 'शक्ति' अवतार हैं; 'अन्तरङ्ग-भक्त' के रूपमें उनकी गिनती की जाती है॥१६-१७॥ अनुभाष्य-अन्तरङ्ग-भक्त और शुद्धभक्तके तत्त्वोंकी अपनी-अपनी विशेषता इस प्रकार है-शक्तितत्त्व मधुररसमें, वात्सल्यरसमें, सख्यरसमें और दास्यरसमें अवस्थित है। तटस्थ होकर
[ ७/१६-१७ तारतम्य-विचारसे भक्तोंकी अपेक्षा शक्तियोंकी श्रेष्ठता देखी जाती है, इसलिये मधुररसमें नित्याश्रित भक्तलोग ही श्रीगौरसुन्दरके अन्तरङ्ग सेवक हैं। श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैतके सेवकगण साधारणतः वात्सल्य, सख्य, दास्य और शान्तरसमें अवस्थित हैं। ये शुद्धभक्तगण जब श्रीगौरसुन्दरके प्रति अत्यन्त प्रीतियुक्त होते हैं, उस समय ही वे लोग अन्तरङ्ग-भक्तोंके आश्रयमें मधुररसाश्रित होते हैं। श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशयकी ‘प्रार्थना’ के प्रारम्भमें यह बात परिस्फुट हुई है— “गौराङ्ग बलिते हवे पुलक शरीर। हरि हरि बलिते नयने ब'बे नीर॥ आर कबे निताइचाँद करुणा करिबे। संसार-वासना मोर कबे तुच्छ ह'बे॥ विषय छाड़िया कबे शुद्ध ह'बे मन। कबे हाम हेरब श्रीवृन्दावन॥ रूप-रघुनाथपदे हइबे आकुति। कबे हाम बुझब श्रीयुगल-पिरीति॥” अर्थात् “अहो! वह दिन कब आयेगा जब ‘हा गौराङ्ग’ पुकारते हुए मेरा शरीर पुलकित होगा तथा हरि-हरि बोलते हुए आँखोंसे आँसुओंकी धारा बहेगी? कब श्रीनित्यानन्दप्रभुकी कृपासे मेरे हृदयसे सांसारिक वासनाएँ दूर होंगी? विषयोंका परित्यागकर मेरा मन कब शुद्ध होगा, जिससे कि मैं श्रीवृन्दावनधामके चिन्मय स्वरूपका दर्शन करूँगा। कब श्रीरूप गोस्वामी तथा श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें मेरी प्रीति होगी कि मैं उनकी कृपासे श्रीराधाकृष्णयुगलकी प्रीतिको जान पाऊँगा। अतः नरोत्तमदास सर्वदा प्रार्थना करते हैं कि श्रीरूप गोस्वामी एवं श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके श्रीचरणोंमें ही उनकी एकमात्र आशा रहे।” ‘शुद्धभक्त’ और ‘अन्तरङ्ग-भक्त’ के वैशिष्ट्य वर्णन करते हुए श्रीरूप गोस्वामीपादने स्वरचित ‘श्रीउपदेशामृत’ ग्रन्थमें साधक-जीवका क्रमोत्कर्ष इस प्रकार लिखा है— “कर्मिभ्यः परितो हरेः प्रियतया व्यक्तिं ययुर्ज्ञानिन- स्तेभ्योज्ञानविमुक्त-भक्तिपरमाः प्रेमैकनिष्ठास्ततः। तेभ्यस्ताः पशुपालपङ्कजदृशस्ताभ्योऽपि सा राधिका, प्रेष्ठा तद्वदियं तदीयसरसी तां नाश्रयेत् कः कृती॥” अर्थात् “स्वेच्छाचार-परायण जीवोंकी अपेक्षा निष्काम कर्मी श्रेष्ठ हैं; उन सदा-सर्वदा सत्कर्मोंमें लगे हुए पुण्यवान कर्मकाण्डियोंकी अपेक्षा तीनों गुणोंसे अतीत ब्रह्मज्ञानी श्रीकृष्णके अधिक प्रिय हैं; ऐसे ब्रह्मज्ञानियोंकी अपेक्षा “ज्ञाने प्रयासमुदपास्य” (श्रीमद्भा. १०/१४/३) इस उक्तिके अनुसार ज्ञानके प्रयासको छोड़कर, केवल भक्तिको ही श्रेष्ठ माननेवाले सनकादि भक्तजन श्रीकृष्णके प्रिय हैं; तथा सब प्रकारके भक्तोंसे, केवल प्रेमकी निष्ठावाले नारदादि शुद्ध भक्तजन श्रीकृष्णके और भी अधिक प्रिय हैं; उन सब प्रेमी भक्तोंकी अपेक्षा श्रीकृष्णगत-प्राण व्रज-गोपिकाएँ श्रीकृष्णकी अतिशय प्यारी हैं; उन प्यारी गोपियोंमें भी श्रीमती राधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी सर्वाधिक-प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हैं, उसी प्रकार यह राधाकुण्ड भी श्रीकृष्णका अतिशय प्यारा है। अतः ऐसा कौन-सा भाग्यवान-सुचतुर व्यक्ति होगा, जो ३८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
श्रीराधाकुण्डमें अप्राकृत रूपमें निवास करता हुआ श्रीकृष्णका आठों याम भजन नहीं करेगा? अपितु करेगा ही।” पञ्चतत्त्वके दो तत्त्व—शक्ति और तीन तत्त्व—शक्तिमान् हैं। शुद्धभक्त और अन्तरङ्गभक्त—ये ही दो प्रकारकी शक्तियाँ हैं। जो लोग अन्याभिलाषिताशून्य होकर अपनी शुद्धा श्रीकृष्णानुशीलन-वृत्तिको कर्म या ज्ञानके आवरणसे आवृत नहीं करते हैं, वे लोग शुद्धभक्त हैं। केवल मधुररसाश्रित ऐकान्तिक भक्तगण ही अन्तरङ्गभक्त हैं। मधुर-रसमें वात्सल्य, सख्य और दास्य अन्तर्भुक्त हैं। शुद्धभक्त-विशेष ही अन्तरङ्ग भक्त हैं॥ १६-१७॥ चारों तत्त्वोंको लेकर महाप्रभुका विहार, प्रचार, आस्वादन और दान :- याँ-सबा लञा प्रभुर नित्य विहार। याँ-सबा लञा प्रभुर कीर्त्तन-प्रचार॥ १८॥ याँ-सबा लञा करेन प्रेम-आस्वादन। याँ-सबा लञा दान करे प्रेमधन॥ १९॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१९॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु—अपने प्रकाश, अपने पुरुषावतारके अवतार, अन्तरङ्गभक्त और शुद्धभक्त—सबको लेकर ही स्वयं प्रेम-आस्वादनरूप नित्य विहार और जगत्में कीर्त्तन-प्रचाररूप प्रेम दान करते हैं॥१९॥ पञ्चतत्त्वोंका मिलकर श्रीकृष्णप्रेम-रसका नित्य आस्वादन और वितरण :- सेई पञ्चतत्त्व मिलि' पृथिवी आसिया। पूर्व-प्रेमभाण्डारेर मुद्रा उघाड़िया॥ २०॥ पाँचे मिलि' लूटे प्रेम, करे आस्वादन। यत यत पिये, तृष्णा बाड़े अनुक्षण॥ २१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य॥ २०-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णका चरित्र ही प्रेमका भण्डार है। वह भण्डार इस जगत्में आया तो था, किन्तु उसका द्वार बन्द था और उसमें ताला लगा हुआ था। श्रीचैतन्यावतारके पञ्चतत्त्वने मिलकर उस तालेको तोड़ दिया। तब उन्होंने द्वार खोलकर उस भण्डारको लूटपाट करते हुए उस प्रेमका आस्वादन किया। उन्होंने जितना उस प्रेमका पान किया, उतनी ही उनकी तृष्णा प्रतिक्षण बढ़ने लगी॥२१॥ पुनः पुनः पियाइया हय महामत्त। नाचे, कान्दे, हासे, गाय, यैछे मदमत्त॥ २२॥ अनुवाद—बार-बार उस प्रेमको पीकर वे मत्त हो गये और मदमत्तकी भाँति नाचने, रोने, हँसने तथा [श्रीकृष्ण नाम-रूप-लीलादिका] गान करने लगे॥२२॥ श्रीकृष्णप्रेम-वितरणमें पात्रापात्रके विचारका अभाव :- पात्रापात्र विचार नाहि, नाहि स्थानास्थान। येई याँहा पाय, ताँहा करे प्रेमदान॥ २३॥
[ ७/२३-२६ प्रेम-वितरणके फलसे हासके बदले वृद्धि :- लुटिया, खाइया, दिया, भाण्डार उजाड़े। आश्चर्य भाण्डार, प्रेम शतगुन बाड़े॥ २४॥ अनुवाद—उस प्रेमको वितरण करनेमें उन्होंने योग्य-अयोग्य पात्र अथवा उचित-अनुचित स्थानका भी विचार नहीं किया अर्थात् उन्हें जहाँ जो भी मिला, उसे प्रेमका मुक्त हस्तसे दान किया। इस प्रेमके भण्डारको श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा उनके पार्षदोंने लूटा और लुटाया, खाया और सभीको खिलाया तथा वितरण करके भण्डारको उजाड़ दिया। किन्तु आश्चर्यकी बात यह है कि वह भण्डार खाली होनेके बदले सैकड़ों गुणा बढ़ गया॥ २३-२४॥ प्रेमकी बाढ़में जगत् मग्न :- उछलिल प्रेमवन्या, चौदिके बेड़ाय। स्त्री, वृद्ध, बालक, युवा, सकलि डुबाय॥ २५॥ सज्जन, दुर्जन, पङ्गु, जड़, अन्धगण। प्रेमवन्याय डुबाइल जगतेर जन॥ २६॥ अनुवाद—उस प्रेमकी बाढ़ उछलकर चारों ओर फैल गयी। उस प्रेमबाढ़में स्त्री, बूढ़े, बालक, युवा, सज्जन, दुर्जन, पङ्गु, जड़, अन्धे—जगत्के सभी लोग डूब गये॥ २५-२६॥ अमृतानुकणिका—जब गङ्गामें बाढ़ आती है, तब उसका जल तटप्रदेशका अतिक्रम करके, पक्के ऊँचे बाँधकी भी उपेक्षा करके दूर-दूर तक फैलकर अगम्य स्थानपर भी भूमिको जलमग्न कर देता है। परन्तु बाढ़ कब आयेगी, इसे कोई नहीं जानता। तभी नाविक भी पूर्व सावधान नहीं हो पाते, वणिक अपनी दुकानसे सामानको किसी सुरक्षित स्थानपर नहीं ले जा पाते। अचानक ही कहींसे बाढ़का जल प्रबल वेगसे आकर नौकाको डुबो देता है, वणिकके सामानको बहाकर ले जाता है। केवल यही नहीं, उद्वेलित तरङ्ग सभीको ही अपनेमें डुबो लेती है—महत्के साथ क्षुद्रकी युद्धमें कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, इसलिये सभी अपने प्रयास छोड़कर महत्के शरणागत हो जाते हैं। जो केवल बाढ़के भयसे बहुत पूर्व ही किसी अति उच्च स्थानपर जाकर वास करते हैं अथवा नदीसे बहुत दूर किसी मरुभूमि सदृश स्थानपर जाकर वास करते हैं, उन्हें बाढ़का जल स्पर्श नहीं करता। मर्त्य-जगत्की बाढ़की हेयता है—वह बड़े-बड़े पुलोंको नहीं तोड़ पाती है; प्रेम-बाढ़में हेयता नहीं है। प्रेम-बाढ़ बहुत शक्तिशाली पुलोंको भी तोड़ देती है, किन्तु उसके कारण जीव मरते नहीं, अपितु अमर हो जाते हैं। अमर होकर नित्यानन्द-निकेतनमें आनन्दमयके नवनवायमान सेवानन्दमें, प्रेमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं। केवल वे ही मरते हैं जो इस प्रेम-बाढ़के भयसे वृक्षके ऊपर चढ़कर निज बलसे आत्मरक्षा करना चाहते हैं अर्थात् जो इस प्रेम-बाढ़से बचना चाहते हैं, वे इसी मृत्युलोकमें पुनः-पुनः जन्म लेकर मृत्युको प्राप्त होते हैं। प्रेम तरल-निर्मल-स्वच्छ होनेपर भी गाढ़ा है। कर्मकी हेयता, ज्ञानकी कठोरता प्रेममें नहीं है। प्रेम अप्राकृत सरल सहज वस्तु है। यह निर्मल कृष्णप्रेम-बाढ़ सभीको डुबो लेती है—यह स्त्री-पुरुषका विचार नहीं करती, बालक-युवाको देखकर अपेक्षा नहीं करती। यह प्रेमकी बाढ़ ३८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/२५-२८ ] साधुको भी डुबोती है, और जगाइ-मधाइ जैसे वैष्णवापराध-शून्य दुर्जनोंको भी खींचकर अपनेमें समा लेती है॥ २५-२६॥ श्रीकृष्णप्रीतिरसमें डूबनेके कारण जीवोंके कर्मबीजका नाश :- जगत् डुबिल, जीवेर हइल बीज नाश। ताहा देखि' पाँचजनेर परम उल्लास॥ २७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रेम-भण्डारका द्वार खुल गया और प्रेम-रसकी बाढ़ने प्रबलवेगसे समस्त जगत्को डुबो दिया। उससे बद्धजीवोंकी श्रीकृष्णदास्य-विस्मृतिरूप अविद्या-बन्धन-बीज नष्ट हो गया। इसे देखकर पञ्चतत्त्वको परम उल्लास हुआ॥ २६-२७॥ अनुभाष्य-भगवान्की तटस्था नामक जीवशक्तिमें श्रीकृष्णोन्मुखी चेष्टाके साथ-साथ श्रीकृष्ण-विमुखतारूप भोगवासनाका बीज भी अव्यक्त रूपसे रहता है। संसार-वृक्षसे उत्पन्न वासना-बीज कालके प्रवाहसे सिञ्चित होकर नानाप्रकार भोगबन्धनोंके द्वारा बद्धजीवको दिन-रात त्रितापोंसे जला रहा है। जिस प्रकार मिट्टीमें लगाया बीज जलमग्न होनेपर उससे अङ्कुर निकलनेकी सम्भावना नहीं रहती, उसी प्रकार भगवत्सेवा-समुद्रकी अथाह जलराशिमें श्रीकृष्णसेवासे इतर भोगवासनाका बीज प्रेमकी बाढ़में डूबकर नष्ट हो गया और उससे और वासनारूपी अङ्कुर निकलनेकी सम्भावना नहीं रही। श्रीचैतन्यचन्द्रका पञ्चतत्त्वरूपमें अवतीर्ण होनेका उद्देश्य सफल हुआ देखकर सभी उल्लसित हुए। श्रीमद् प्रबोधानन्द सरस्वती त्रिदण्डिपादने ‘श्रीचैतन्यचन्द्रामृत’ ग्रन्थमें उसका इस प्रकार वर्णन किया है— “स्त्री-पुत्रादि-कथां जहुर्विषयिनः शास्त्रप्रवादं बुधा, योगीन्द्रा विजहुर्मरुन्नियमज-क्लेशं तपस्तापसाः। ज्ञानाभ्यासविधिं जहुश्च यतयश्चैतन्यचन्द्रे परामाविष्कुर्वति भक्तियोगपदवीं नैवान्य आसीद्रसः॥” अर्थात् “जबसे श्रीचैतन्यचन्द्रने शुद्धा प्रेमाभक्तिके पथको प्रकाशित किया है, तबसे विषयी लोगोंने अपनी स्त्री-पुत्रादिकी बातें करना बन्द कर दिया है, विद्वानोंने शास्त्रोंका वाद-विवाद बन्द कर दिया है, योगियोंने प्राणायामके द्वारा श्वासको नियन्त्रित करनेके कष्टका परित्याग कर दिया है, तपस्वियोंने कठोर तपस्याका त्याग कर दिया है, ज्ञान-मार्गावलम्बियोंने निर्विशेष ब्रह्ममें लीन होनेके दुश्विचारका त्याग कर दिया है। अब केवल सर्वत्र श्रीकृष्णप्रेमका ही माधुर्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी रसमय (मधुर) नहीं है।”॥ २७॥ प्रेमवर्षणके कारण प्रेमरसकी वृद्धि :— यत यत प्रेमवृष्टि करे पञ्चजन। तत तत बाड़े जल, व्यापे त्रिभुवन॥ २८॥ अनुवाद-इन पञ्चतत्त्वोंने मिलकर जितनी प्रेमकी वर्षा की, उतना ही (प्रेमरूपी) जल बढ़ता गया और उसने त्रिभुवनको व्याप्त कर लिया॥ २८॥ सातवाँ अध्याय | ३८७
[ ७/२९-३३ श्रीकृष्णप्रेमरससे वञ्चित :- मायावादी, कर्मनिष्ठ कुतार्किकगण। निन्दक, पाषण्डी, यत पड़ुया अधम॥ २९॥ सेइ सब महादक्ष धाञा पलाइल। सेइ वन्या ता-सबारे छुँइते नारिल॥ ३०॥ अनुवाद-अपनी-अपनी वृत्तिमें महादक्ष अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमके विरोधी-मायावादी, सकामकर्मी, कुतार्किक, निन्दक, पाषण्डी और जितने पढ़नेवालोंमें अधम, ये सभी वहाँसे दूर भाग गये, इसलिये उनको यह प्रेमकी बाढ़ स्पर्श नहीं कर पायी अर्थात् वे प्रेमाभक्तिसे वञ्चित रह गये॥ २९-३०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘मायावादी’-प्रकाशानन्दादि संन्यासी मायावादी हैं। वे लोग सभी सद्-विषयोंमें ‘माया’ को लेकर वाद उठाते हैं। ‘ब्रह्म’ को ‘मायासे अतीत’ कहकर ‘ईश्वर’ को ‘मायासङ्गी’ कर देते हैं और ईश्वरके सभी अवतारोंके शरीरको ‘मायिक’ कहते हैं। वे कहते हैं कि जीवके गठनमें मायाका कार्य है अर्थात् जीवकी सभी प्रकारकी अहं-बुद्धि मायासे निर्मित है। इसलिये उनका यह सिद्धान्त है कि जीवके मुक्त होनेपर ‘शुद्धजीव’ नामक और कोई अवस्था नहीं रहती है। अर्थात् मुक्त होनेपर जीव ब्रह्मके साथ एक हो जाता है, वे इस प्रकारकी शिक्षा देते हैं। ‘कर्मनिष्ठ’-देवानन्दादि भक्तिहीन कर्मी लोग। कर्मजड़ स्मार्त्तलोग अर्थात् जो कर्म और कर्मफलको ही जीवका मुख्य उद्देश्य कहते हैं। ‘कुतार्किकगण’-सार्वभौमादि निरीश्वर तार्किक लोग। ‘निन्दक’-जिनको महाप्रभुने अपना दण्ड लेकर ताड़न किया था और गोपाल-चापालादि प्रभु और प्रभुके भक्तोंके निन्दक लोग। ‘पाषण्डी’-भगवान्के साथ अन्य-अन्य देवताओंकी समता-व्याख्या करनेवाले। ‘अधम पड़ुआ’-वे सभी पढ़े-लिखे लोग जो विद्याको तर्कका कारण मानते हैं और विद्या ईश्वर-प्राप्तिका उपाय है, यह नहीं जानते॥ २९॥ अहैतुकी-कृपासिन्धुके द्वारा उन सबके उद्धारकी चिन्ता :- ताहा देखि' महाप्रभु करेन चिन्तन। जगत् डुबाइते आमि करिलूँ यतन॥ ३१॥ केह केह एड़ाइल, प्रतिज्ञा हइल भङ्ग। ता-सबा डुबाइते पातिब किछु रङ्ग॥ ३२॥ पतित वञ्चित जीवोंके उद्धारके लिये संन्यास-ग्रहण :- एत बलि' मने किछु कोरिया विचार। संन्यास-आश्रम प्रभु कैला अङ्गीकार॥ ३३॥ अनुवाद-यह देखकर अर्थात् मायावादी, कर्मियों आदिको भागते हुए देखकर महाप्रभु चिन्ता करने लगे कि मैंने जगत्को प्रेमकी बाढ़में डुबोनेके लिये इतना यत्न किया, किन्तु कोई-कोई ३८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत