भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 425

'वदान्य' हैं, किन्तु महाप्रभु शिक्षकोंके भी शिक्षक होनेके कारण 'महावदान्य' हैं। श्रीकृष्ण सेवासे ही सन्तुष्ट होते हैं—यह बात ही महाप्रभु कहते हैं। श्रीकृष्णसेवाका त्याग करनेसे ही सभी असुविधाएँ आती हैं। महाप्रभुका आशीर्वाद है—"कृष्णे मतिरस्तु"। श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके मनोभिलाषानुसार कार्य करके उन्हें नित्य निरन्तर आनन्द प्रदान करते हैं। उनमें नित्य आनन्द है। श्रीनित्यानन्द प्रभु भगवत्स्वरूप-स्वयंरूप नहीं होनेपर भी स्वयंप्रकाश हैं। स्वयंप्रकाश-तत्त्व स्वयंरूपको आनन्द प्रदान करते हैं। महाप्रभु अपनी लीलाकी सहायताके लिये अपने स्वयंरूपको प्रकाश करते हैं। श्रीअद्वैत प्रभु भी विष्णुतत्त्व हैं। सृष्टिके उपादान कारण श्रीअद्वैत प्रभु हैं; उपादान और निमित्त, दोनों कारणोंके मूल स्वयंप्रकाश श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैत प्रभु, दोनों ही महाप्रभुकी सेवा करते हैं और उनकी लीलाके सहायक हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु दस-देह धारणकर महाप्रभुकी सेवा करते हैं॥१४॥ तीन तत्त्व-आराध्य, और चौथे तथा पाँचवें तत्त्व-आराधक :- एइ तिन तत्त्व,–'सर्वाराध्य' करि' मानि। चतुर्थ ये भक्ततत्त्व,—'आराधक' करि' जानि॥१५॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु-ये तीन तत्त्व सभीके आराध्य हैं। चौथे तत्त्व जो भक्ततत्त्व हैं, वे 'आराधक' के रूपमें जाने जाते हैं॥१५॥ अनुभाष्य-पञ्चतत्त्वके स्वरूप-वर्णनमें हम लोग श्रीमन्महाप्रभुको ही सर्वश्रेष्ठ परतत्त्व और श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीअद्वैत प्रभु-इन दोनोंको उनके अधीन 'ईश्वर-तत्त्व' जान सकते हैं। परमेश्वर और दो ईश्वर-प्रकाश,-सभी परतत्त्व होनेके कारण अन्य सभी तत्त्वोंके आराध्य हैं। चौथे शुद्धभक्त-तत्त्व और पाँचवें अन्तरङ्गभक्त-तत्त्व-ये दोनों ही 'आराधक'-तत्त्व हैं। 'आराध्य' (श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु) सेवकरूपी ये दो तत्त्व 'आराधक' (श्रीवासादि शुद्धभक्तों और श्रीगदाधरादि अन्तरङ्ग भक्तों) के पूज्य होनेपर भी सेव्य श्रीगौराङ्गकी सेवावृत्तिमें अवस्थित हैं॥१४-१५॥ श्रीवासादि-भक्ततत्त्व :- श्रीवासादि यत कोटि कोटि भक्तगण। 'शुद्धभक्त'-तत्त्वमध्ये ताँ-सबार गणन॥१६॥ गदाधरादि-शक्तितत्त्व :- गदाधर-पण्डितादि प्रभुर 'शक्ति'-अवतार। 'अन्तरङ्ग-भक्त' करि' गणन याँहार॥१७॥ अनुवाद-श्रीवास ठाकुरादि जितने असंख्य भक्त हैं, उन सभीकी 'शुद्धभक्त'-तत्त्वके रूपमें गणना होती है। श्रीगदाधर पण्डितादि महाप्रभुके 'शक्ति' अवतार हैं; 'अन्तरङ्ग-भक्त' के रूपमें उनकी गिनती की जाती है॥१६-१७॥ अनुभाष्य-अन्तरङ्ग-भक्त और शुद्धभक्तके तत्त्वोंकी अपनी-अपनी विशेषता इस प्रकार है-शक्तितत्त्व मधुररसमें, वात्सल्यरसमें, सख्यरसमें और दास्यरसमें अवस्थित है। तटस्थ होकर