श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/१०-१४ इसलिये श्रीचैतन्य-विग्रहको केवल प्रपञ्चके अन्तर्गत साधक-विग्रह नहीं कहा गया है। विशुद्धसत्त्वमें प्रकटित होनेके कारण उस रस-विग्रहका वास्तविक परिचय सत्त्वसे उज्ज्वल हृदयके द्वारा ही हो सकता है। श्रीचैतन्यदेवने स्वयं परमेश्वर होनेपर भी सेवकोचित लीलाका प्रदर्शन किया है—भोक्ताकी लीलाका नहीं। तमोमय दर्शनसे उनकी श्रीमूर्तिको इन्द्रिय-तर्पणरत कोई यन्त्रविशेष मानना निषिद्ध हुआ है॥१०॥ स्वमाधुर्य्यास्वादनके लिये ही श्रीकृष्णका ‘भक्तरूपमें’ श्रीगौरावतार :— कृष्णमाधुर्य्येर एक अद्भुत स्वभाव। आपना आस्वादिते कृष्ण करे भक्तभाव ॥ ११ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमाधुर्य्यका एक अद्भुत स्वभाव है, जिसका आस्वादन करनेके लिये स्वयं श्रीकृष्ण भी ललायित हो जाते हैं, परन्तु भक्तभावके बिना उसका आस्वादन सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णने भक्तभावको अङ्गीकार किया॥११॥ अनुभाष्य—समस्त माधुर्य्यके आश्रय श्रीकृष्णकी एक अपूर्व चित्तवृत्ति यह है कि वे स्वयं विषय-विग्रह होकर भी आश्रय अथवा पूजकका भाव ग्रहण करके विषय-विग्रहकी सेवाके आस्वादनमें रत हैं। तो भी, श्रीचैतन्यदेव केवल आश्रयभावमय-विग्रह मात्र नहीं है, अपितु वे स्वयंरूप वस्तु हैं॥११॥ श्रीनिताइ—‘भक्तस्वरूप’, श्रीअद्वैत—‘भक्तावतार’ :— इथे भक्तभाव धरे चैतन्य गोसाञि। ‘भक्तस्वरूप’ ताँर नित्यानन्द भाइ ॥ १२ ॥ ‘भक्त-अवतार’ ताँर आचार्य गोसाञि। एइ तिन तत्त्व सबे प्रभु करि’ गाइ ॥ १३ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण भक्तभावको अङ्गीकारकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं और उनके भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीकृष्णके ‘भक्तस्वरूप’ हैं। श्रीअद्वैताचार्य प्रभु श्रीकृष्णके ‘भक्तावतार’ हैं। [श्रीकृष्णचैतन्य—भक्तरूप तत्त्व, श्रीनित्यानन्द—भक्तस्वरूप तत्त्व और श्रीअद्वैताचार्य—भक्तावतार तत्त्व]—इन तीनों तत्त्वोंको सभी प्रभु कहते हैं॥१२-१३॥ श्रीनिताइ एवं श्रीअद्वैत,—दोनों ईश्वरोंके भी ईश्वर श्रीगौर :— एक महाप्रभु, आर प्रभु दुइजन। दुइ प्रभु सेवे महाप्रभुर चरण ॥ १४ ॥ अनुवाद—इनमें एक श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं भगवान् होनेके कारण महाप्रभु हैं और अन्य दो—श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैत, प्रभु हैं। वे दोनों प्रभु महाप्रभुके चरणोंकी सेवा करते हैं॥१४॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभुको प्रणाम करते हुए श्रीरूपगोस्वामी कहते हैं— “नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते। कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥” महाप्रभु स्वयंरूप श्रीकृष्ण हैं। महावदान्य-लीलाका उनका नाम श्रीकृष्णचैतन्य है। सर्वापेक्षा श्रेष्ठ शिक्षक होनेसे महाप्रभु महावदान्य हैं। अन्यान्य शिक्षक अनुग्रह प्रकाश करनेके कारण ३८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत