श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/६-१० ] श्रीवासादि), भक्तशक्तिकं (गदाधर-दामोदर-रामानन्दादि) पञ्चतत्त्वात्मकं (पञ्चानां तत्त्वानां आत्मा स्वरूपं यस्य तं) कृष्णं (कृष्णचैतन्यदेवं) नमामि। श्लोक-भावानुवाद-भक्तभावमय, शुद्ध कलेवर और अपने माधुर्यके आस्वादक श्रीगौर और भ्राताका स्वरूप धारणकर श्रीनित्यानन्द प्रभु क्रमशः रूप और स्वरूप हैं जिनके वे, भक्तावतार (श्रीअद्वैताचार्य), भक्त (शान्त-दास्यादि रसाश्रित श्रीवासादि) और भक्तशक्ति (गदाधर पण्डित, स्वरूपदामोदर, रायरामानन्दादि)-इस प्रकार पञ्चतत्त्व जिनका आत्म स्वरूप है, उन श्रीकृष्णचैतन्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥ स्वयंरूप श्रीनन्दनन्दन ही सर्वेश्वर हैं; जितने भी विष्णु, वैष्णव और धाम-सेवोपकरण हैं, जीव एवं प्रधान हैं, सभी श्रीकृष्णके सेवक हैं :- स्वयं भगवान् कृष्ण एकले ईश्वर। अद्वितीय, नन्दात्मज, रसिकशेखर ॥७॥ अनुवाद-रसिकशेखर श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् और सबके एकमात्र नियन्ता हैं। वे अद्वितीय हैं अर्थात् उनसे बड़ा अथवा उनके समान दूसरा कोई नहीं है, तो भी वे नन्दमहाराजके पुत्रके रूपमें नरलीला करते हैं॥७॥ रासादि-विलासी, व्रजललना-नागर। आर यत सब देख, -ताँर परिकर ॥८॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण रासादि लीलामें विलास करते हैं और व्रजगोपियोंके प्रियतम हैं। और सभी जितने हैं, वे सभी उनके परिकर हैं॥८॥ वही श्रीकृष्ण ही श्रीगौर :- सेइ कृष्ण अवतीर्ण श्रीकृष्णचैतन्य। सेइ परिकरगण सङ्गे सब धन्य ॥९॥ अनुवाद-वही श्रीकृष्ण अब श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें अपने उन परिकरोंके साथ अवतीर्ण हुए हैं। वे परिकर भी उनके समान महिमाशाली हैं॥९॥ श्रीकृष्णचैतन्य ही सर्वेश्वर होकर भी वश्यभावमय :- एकले ईश्वर-तत्त्व चैतन्य-ईश्वर। भक्तभावमय ताँर शुद्ध कलेवर ॥ १० ॥ अनुवाद-केवल श्रीचैतन्य महाप्रभु ही ईश्वर-तत्त्व (स्वयं भगवान्) हैं। वे स्वयं ही अपने चिदानन्दमय शुद्ध कलेवरमें भक्तभावको अङ्गीकार करके प्रकट हुए हैं॥१०॥ अनुभाष्य-“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्”-इस श्रुतिमन्त्रमें उद्दिष्ट असंख्य चिद्वस्तुओंमें एकमात्र परमेश्वर-श्रीचैतन्यदेव हैं। मायावादी लोग अणुचित् शक्तिसमूह (जीवों) का विभुचित् (ब्रह्म) के साथ समन्वय करनेपर जिस प्रकारसे भ्रान्त हुए हैं, उसे दूर करनेके लिये इस पद्यकी अवतारणा हुई है। श्रीचैतन्यदेव व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णसे अभिन्न होकर भी श्रीकृष्णको भजनीय-वस्तु मानकर उन्हींका ही सेवाभावमय विग्रह धारण करते हैं। इस भगवद्विग्रहको कोई जड़भोगके विषय-विग्रहकी भावना करके प्रपञ्चके अन्तर्गत जीवश्रेणीमें नहीं मानना चाहिये। सातवाँ अध्याय | ३८१