भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ७/३-६ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रथम अध्यायमें दीक्षागुरु और शिक्षागुरुके भेदसे गुरुतत्त्वका वर्णन कर चुका हूँ। “वन्दे गुरुनीशभक्तान्” श्लोकमें छह तत्त्व कहे हैं। अब इस श्लोकमें गुरुतत्त्वके बाद अन्य पाँच तत्त्वोंका विचार कर रहा हूँ॥३॥ पञ्चतत्त्व अवतीर्ण चैतन्येर सङ्गे। पञ्चतत्त्व लञा करेन सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥४॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके साथ कुल पाँच तत्त्व अवतीर्ण हुए हैं और श्रीमन्महाप्रभु इन पाँच तत्त्वोंको लेकर ही आनन्दपूर्वक सङ्कीर्तन करते हैं॥४॥ पञ्चतत्त्व-एक वस्तु, नाहि किछु भेद। रस आस्वादिते तत्त्व विविध विभेद॥५॥ अनुवाद-वास्तवमें ये पाँचों तत्त्व एक ही वस्तु हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। केवल रस-वैचित्रीका आस्वादन करनेके लिये एक ही तत्त्व इन पाँच भेदोंसे प्रकट होते हैं॥५॥ अनुभाष्य-शक्तिमान् वस्तु (भगवान्) की पाँच विभिन्न प्रकारकी लीलाओंका परिचय पञ्चतत्त्वमें प्रकाशित होता है। भगवान्‌में द्वैतभाव नहीं होनेके कारण एक होनेपर भी उनमें पाँच प्रकारकी विचित्रताएँ हैं। ये विचित्रताएँ नीरस भावको त्यागकर सरस बनानेके उद्देश्यसे उनका लीलावैशिष्ट्य है। “परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते"-इस श्रुतिवाक्यसे यह जाना जाता है कि अद्वयज्ञानवस्तुका विविध-शक्तिभेद नित्यकाल अवस्थित है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य प्रभु, श्रीगदाधर पण्डित और श्रीवासादि पञ्चतत्त्वमें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, परन्तु रसास्वादनके उद्देश्यसे विचित्रलीलामय तत्त्व ही 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप', 'भक्तावतार', 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-इन पाँच प्रकारके विविध-भेदोंसे युक्त हैं। इन पञ्चतत्त्वमें 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप' और 'भक्तावतार' ही क्रमशः 'स्वयं', 'प्रकाश' और 'अंश' के रूपमें प्रभु-विष्णुतत्त्व हैं। 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-विष्णुतत्त्वके अन्तर्गत उनके आश्रित अभिन्न-शक्तितत्त्व हैं। वे वस्तुसे अभिन्न रसके उपकरण-रूपमें रसमयविग्रहसे युक्त हैं, इसलिये उनमें परस्पर भेद नहीं है। 'आराधक' और 'आराध्य'-दोनोंमें किसी एकके अभावमें लीलाका रसास्वादन नहीं होता॥५॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकामें अन्तिम श्लोककी व्याख्या :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूप-स्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके भक्तरूप, भक्तस्वरूप, भक्तावतार, भक्त और भक्तशक्ति-इन पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥ अनुभाष्य-भक्त-रूप-स्वरूपकं (भक्तभावमयः शुद्धकलेवरः निजास्वादकपरः श्रीगौर, भ्रातृस्वरूपधृक् नित्यानन्दश्च क्रमेण रूपं स्वरूपञ्च यस्य सः तं), भक्तावतारं (अद्वैतं), भक्ताख्यं (शान्तदास्यादिरसाश्रितं ३८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत