श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 421, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय सातवें अध्यायका कथासार—इस सातवें अध्यायमें पञ्चतत्त्वका महात्म्य वर्णित हुआ है। पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णचैतन्यने अवतीर्ण होकर जगत्में नाम-प्रेमदान करके प्रेमकी महाबाढ़ ला दी। मायावादी, निन्दकादि कुछ प्रकारके कुतार्किक उस बाढ़से दूर भाग गये। उनका भी उद्धार करनेकी इच्छासे महाप्रभुने संन्यास ग्रहणकर शुद्धभक्तिका प्रचार करते हुए उन सभी लोगोंको भी अपने श्रीचरणोंमें आकर्षित किया। काशीवासी मायावादी संन्यासियोंका उद्धार करनेकी इच्छासे वाराणसी धाममें भक्तोंके द्वारा अनुरोध किये जानेपर किसी ब्राह्मणके घरपर उन सब संन्यासियोंको एकत्रित देखकर पहले अपने स्वरूपके ऐश्वर्यको दिखाकर उनकी श्रद्धा आकर्षित की। उसके बाद उनके द्वारा जिज्ञासा किये जानेपर मायावाद-सिद्धान्तके निराधार अर्थ प्रदर्शित करके श्रीशङ्कराचार्यके मतके सब प्रकारके दोष दिखलाये। भगवद्दर्शनरूप सुकृतिके बलपर उनको भक्तिपथमें लाकर अपनी कृपा दान की। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णचैतन्यकी महावदान्यताका वर्णन :— अगत्येकगतिं नत्वा हीनार्थ्याधिकसाधकम्। श्रीचैतन्यं लिख्यतेऽस्य प्रेमभक्तिवदान्यता ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अगति अथवा अकिञ्चनोंकी गति, परमार्थहीन व्यक्तिके महत्-अर्थसाधक श्रीचैतन्यको नमस्कार करके, उनकी प्रेमभक्तिकी वदान्यता वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ अनुभाष्य—अगत्येकगतिम् (अगतीनाम् आश्रयान्तर-रहितानाम् एका अनन्यगतिः शरणं तथाभूतं) हीनार्थ्याधिकसाधकं (अर्थेन परमार्थेन हीनाः वञ्चिताः हीनार्थाः, प्रयोजनानि धर्मार्थकाममोक्षादयो वा, तेभ्यः अधिकं महत्तरं पञ्चम-पुरुषार्थ-रूपं कृष्णप्रेम तस्य साधकं प्रदातारं) श्रीचैतन्यं नत्वा (प्रणम्य) अस्य (भगवतः श्रीकृष्णचैतन्यस्य) प्रेमभक्ति-वदान्यता (कृष्णप्रेमभक्ति-प्रदानरूप-महाकारुण्यं) लिख्यते (वर्ण्यते)। श्लोक-भावानुवाद—आश्रयरहित व्यक्तिकी एकमात्र शरण, परमार्थहीनको धर्म-अर्थ-काम-मोक्षसे भी अधिक महत्तर पञ्चम-पुरुषार्थरूप प्रेमको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यको प्रणाम करके, उनकी श्रीकृष्णप्रेमभक्ति प्रदानरूपी महाकरुणाका वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। ताँहार चरणाश्रित, सेइ बड़ धन्य॥ २॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। उनके चरणोंका आश्रय करनेवाले व्यक्ति भी परम धन्य हैं॥ २॥ 'वन्दे गुरून्' श्लोकके छः तत्त्वोंमें 'गुरु'-तत्त्वके अतिरिक्त पञ्चतत्त्वका विचार आरम्भ; अभेद होनेपर भी रसास्वादनके लिये पाँच भेद :— पूर्वे गुर्वादि छय तत्त्वे कैल नमस्कार। गुरुतत्त्व कहियाछि, एबे पाँचरे विचार॥ ३॥