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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

सातवाँ अध्याय सातवें अध्यायका कथासार—इस सातवें अध्यायमें पञ्चतत्त्वका महात्म्य वर्णित हुआ है। पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णचैतन्यने अवतीर्ण होकर जगत्में नाम-प्रेमदान करके प्रेमकी महाबाढ़ ला दी। मायावादी, निन्दकादि कुछ प्रकारके कुतार्किक उस बाढ़से दूर भाग गये। उनका भी उद्धार करनेकी इच्छासे महाप्रभुने संन्यास ग्रहणकर शुद्धभक्तिका प्रचार करते हुए उन सभी लोगोंको भी अपने श्रीचरणोंमें आकर्षित किया। काशीवासी मायावादी संन्यासियोंका उद्धार करनेकी इच्छासे वाराणसी धाममें भक्तोंके द्वारा अनुरोध किये जानेपर किसी ब्राह्मणके घरपर उन सब संन्यासियोंको एकत्रित देखकर पहले अपने स्वरूपके ऐश्वर्यको दिखाकर उनकी श्रद्धा आकर्षित की। उसके बाद उनके द्वारा जिज्ञासा किये जानेपर मायावाद-सिद्धान्तके निराधार अर्थ प्रदर्शित करके श्रीशङ्कराचार्यके मतके सब प्रकारके दोष दिखलाये। भगवद्दर्शनरूप सुकृतिके बलपर उनको भक्तिपथमें लाकर अपनी कृपा दान की। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णचैतन्यकी महावदान्यताका वर्णन :— अगत्येकगतिं नत्वा हीनार्थ्याधिकसाधकम्। श्रीचैतन्यं लिख्यतेऽस्य प्रेमभक्तिवदान्यता ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अगति अथवा अकिञ्चनोंकी गति, परमार्थहीन व्यक्तिके महत्-अर्थसाधक श्रीचैतन्यको नमस्कार करके, उनकी प्रेमभक्तिकी वदान्यता वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ अनुभाष्य—अगत्येकगतिम् (अगतीनाम् आश्रयान्तर-रहितानाम् एका अनन्यगतिः शरणं तथाभूतं) हीनार्थ्याधिकसाधकं (अर्थेन परमार्थेन हीनाः वञ्चिताः हीनार्थाः, प्रयोजनानि धर्मार्थकाममोक्षादयो वा, तेभ्यः अधिकं महत्तरं पञ्चम-पुरुषार्थ-रूपं कृष्णप्रेम तस्य साधकं प्रदातारं) श्रीचैतन्यं नत्वा (प्रणम्य) अस्य (भगवतः श्रीकृष्णचैतन्यस्य) प्रेमभक्ति-वदान्यता (कृष्णप्रेमभक्ति-प्रदानरूप-महाकारुण्यं) लिख्यते (वर्ण्यते)। श्लोक-भावानुवाद—आश्रयरहित व्यक्तिकी एकमात्र शरण, परमार्थहीनको धर्म-अर्थ-काम-मोक्षसे भी अधिक महत्तर पञ्चम-पुरुषार्थरूप प्रेमको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यको प्रणाम करके, उनकी श्रीकृष्णप्रेमभक्ति प्रदानरूपी महाकरुणाका वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। ताँहार चरणाश्रित, सेइ बड़ धन्य॥ २॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। उनके चरणोंका आश्रय करनेवाले व्यक्ति भी परम धन्य हैं॥ २॥ 'वन्दे गुरून्' श्लोकके छः तत्त्वोंमें 'गुरु'-तत्त्वके अतिरिक्त पञ्चतत्त्वका विचार आरम्भ; अभेद होनेपर भी रसास्वादनके लिये पाँच भेद :— पूर्वे गुर्वादि छय तत्त्वे कैल नमस्कार। गुरुतत्त्व कहियाछि, एबे पाँचरे विचार॥ ३॥

[ ७/३-६ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रथम अध्यायमें दीक्षागुरु और शिक्षागुरुके भेदसे गुरुतत्त्वका वर्णन कर चुका हूँ। “वन्दे गुरुनीशभक्तान्” श्लोकमें छह तत्त्व कहे हैं। अब इस श्लोकमें गुरुतत्त्वके बाद अन्य पाँच तत्त्वोंका विचार कर रहा हूँ॥३॥ पञ्चतत्त्व अवतीर्ण चैतन्येर सङ्गे। पञ्चतत्त्व लञा करेन सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥४॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके साथ कुल पाँच तत्त्व अवतीर्ण हुए हैं और श्रीमन्महाप्रभु इन पाँच तत्त्वोंको लेकर ही आनन्दपूर्वक सङ्कीर्तन करते हैं॥४॥ पञ्चतत्त्व-एक वस्तु, नाहि किछु भेद। रस आस्वादिते तत्त्व विविध विभेद॥५॥ अनुवाद-वास्तवमें ये पाँचों तत्त्व एक ही वस्तु हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। केवल रस-वैचित्रीका आस्वादन करनेके लिये एक ही तत्त्व इन पाँच भेदोंसे प्रकट होते हैं॥५॥ अनुभाष्य-शक्तिमान् वस्तु (भगवान्) की पाँच विभिन्न प्रकारकी लीलाओंका परिचय पञ्चतत्त्वमें प्रकाशित होता है। भगवान्‌में द्वैतभाव नहीं होनेके कारण एक होनेपर भी उनमें पाँच प्रकारकी विचित्रताएँ हैं। ये विचित्रताएँ नीरस भावको त्यागकर सरस बनानेके उद्देश्यसे उनका लीलावैशिष्ट्य है। “परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते"-इस श्रुतिवाक्यसे यह जाना जाता है कि अद्वयज्ञानवस्तुका विविध-शक्तिभेद नित्यकाल अवस्थित है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य प्रभु, श्रीगदाधर पण्डित और श्रीवासादि पञ्चतत्त्वमें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, परन्तु रसास्वादनके उद्देश्यसे विचित्रलीलामय तत्त्व ही 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप', 'भक्तावतार', 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-इन पाँच प्रकारके विविध-भेदोंसे युक्त हैं। इन पञ्चतत्त्वमें 'भक्तरूप', 'भक्तस्वरूप' और 'भक्तावतार' ही क्रमशः 'स्वयं', 'प्रकाश' और 'अंश' के रूपमें प्रभु-विष्णुतत्त्व हैं। 'भक्तशक्ति' और 'शुद्धभक्त'-विष्णुतत्त्वके अन्तर्गत उनके आश्रित अभिन्न-शक्तितत्त्व हैं। वे वस्तुसे अभिन्न रसके उपकरण-रूपमें रसमयविग्रहसे युक्त हैं, इसलिये उनमें परस्पर भेद नहीं है। 'आराधक' और 'आराध्य'-दोनोंमें किसी एकके अभावमें लीलाका रसास्वादन नहीं होता॥५॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकामें अन्तिम श्लोककी व्याख्या :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूप-स्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके भक्तरूप, भक्तस्वरूप, भक्तावतार, भक्त और भक्तशक्ति-इन पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥ अनुभाष्य-भक्त-रूप-स्वरूपकं (भक्तभावमयः शुद्धकलेवरः निजास्वादकपरः श्रीगौर, भ्रातृस्वरूपधृक् नित्यानन्दश्च क्रमेण रूपं स्वरूपञ्च यस्य सः तं), भक्तावतारं (अद्वैतं), भक्ताख्यं (शान्तदास्यादिरसाश्रितं ३८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/६-१० ] श्रीवासादि), भक्तशक्तिकं (गदाधर-दामोदर-रामानन्दादि) पञ्चतत्त्वात्मकं (पञ्चानां तत्त्वानां आत्मा स्वरूपं यस्य तं) कृष्णं (कृष्णचैतन्यदेवं) नमामि। श्लोक-भावानुवाद-भक्तभावमय, शुद्ध कलेवर और अपने माधुर्यके आस्वादक श्रीगौर और भ्राताका स्वरूप धारणकर श्रीनित्यानन्द प्रभु क्रमशः रूप और स्वरूप हैं जिनके वे, भक्तावतार (श्रीअद्वैताचार्य), भक्त (शान्त-दास्यादि रसाश्रित श्रीवासादि) और भक्तशक्ति (गदाधर पण्डित, स्वरूपदामोदर, रायरामानन्दादि)-इस प्रकार पञ्चतत्त्व जिनका आत्म स्वरूप है, उन श्रीकृष्णचैतन्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥ स्वयंरूप श्रीनन्दनन्दन ही सर्वेश्वर हैं; जितने भी विष्णु, वैष्णव और धाम-सेवोपकरण हैं, जीव एवं प्रधान हैं, सभी श्रीकृष्णके सेवक हैं :- स्वयं भगवान् कृष्ण एकले ईश्वर। अद्वितीय, नन्दात्मज, रसिकशेखर ॥७॥ अनुवाद-रसिकशेखर श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् और सबके एकमात्र नियन्ता हैं। वे अद्वितीय हैं अर्थात् उनसे बड़ा अथवा उनके समान दूसरा कोई नहीं है, तो भी वे नन्दमहाराजके पुत्रके रूपमें नरलीला करते हैं॥७॥ रासादि-विलासी, व्रजललना-नागर। आर यत सब देख, -ताँर परिकर ॥८॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण रासादि लीलामें विलास करते हैं और व्रजगोपियोंके प्रियतम हैं। और सभी जितने हैं, वे सभी उनके परिकर हैं॥८॥ वही श्रीकृष्ण ही श्रीगौर :- सेइ कृष्ण अवतीर्ण श्रीकृष्णचैतन्य। सेइ परिकरगण सङ्गे सब धन्य ॥९॥ अनुवाद-वही श्रीकृष्ण अब श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें अपने उन परिकरोंके साथ अवतीर्ण हुए हैं। वे परिकर भी उनके समान महिमाशाली हैं॥९॥ श्रीकृष्णचैतन्य ही सर्वेश्वर होकर भी वश्यभावमय :- एकले ईश्वर-तत्त्व चैतन्य-ईश्वर। भक्तभावमय ताँर शुद्ध कलेवर ॥ १० ॥ अनुवाद-केवल श्रीचैतन्य महाप्रभु ही ईश्वर-तत्त्व (स्वयं भगवान्) हैं। वे स्वयं ही अपने चिदानन्दमय शुद्ध कलेवरमें भक्तभावको अङ्गीकार करके प्रकट हुए हैं॥१०॥ अनुभाष्य-“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्”-इस श्रुतिमन्त्रमें उद्दिष्ट असंख्य चिद्वस्तुओंमें एकमात्र परमेश्वर-श्रीचैतन्यदेव हैं। मायावादी लोग अणुचित् शक्तिसमूह (जीवों) का विभुचित् (ब्रह्म) के साथ समन्वय करनेपर जिस प्रकारसे भ्रान्त हुए हैं, उसे दूर करनेके लिये इस पद्यकी अवतारणा हुई है। श्रीचैतन्यदेव व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णसे अभिन्न होकर भी श्रीकृष्णको भजनीय-वस्तु मानकर उन्हींका ही सेवाभावमय विग्रह धारण करते हैं। इस भगवद्विग्रहको कोई जड़भोगके विषय-विग्रहकी भावना करके प्रपञ्चके अन्तर्गत जीवश्रेणीमें नहीं मानना चाहिये। सातवाँ अध्याय | ३८१

[ ७/१०-१४ इसलिये श्रीचैतन्य-विग्रहको केवल प्रपञ्चके अन्तर्गत साधक-विग्रह नहीं कहा गया है। विशुद्धसत्त्वमें प्रकटित होनेके कारण उस रस-विग्रहका वास्तविक परिचय सत्त्वसे उज्ज्वल हृदयके द्वारा ही हो सकता है। श्रीचैतन्यदेवने स्वयं परमेश्वर होनेपर भी सेवकोचित लीलाका प्रदर्शन किया है—भोक्ताकी लीलाका नहीं। तमोमय दर्शनसे उनकी श्रीमूर्तिको इन्द्रिय-तर्पणरत कोई यन्त्रविशेष मानना निषिद्ध हुआ है॥१०॥ स्वमाधुर्य्यास्वादनके लिये ही श्रीकृष्णका ‘भक्तरूपमें’ श्रीगौरावतार :— कृष्णमाधुर्य्येर एक अद्भुत स्वभाव। आपना आस्वादिते कृष्ण करे भक्तभाव ॥ ११ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमाधुर्य्यका एक अद्भुत स्वभाव है, जिसका आस्वादन करनेके लिये स्वयं श्रीकृष्ण भी ललायित हो जाते हैं, परन्तु भक्तभावके बिना उसका आस्वादन सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णने भक्तभावको अङ्गीकार किया॥११॥ अनुभाष्य—समस्त माधुर्य्यके आश्रय श्रीकृष्णकी एक अपूर्व चित्तवृत्ति यह है कि वे स्वयं विषय-विग्रह होकर भी आश्रय अथवा पूजकका भाव ग्रहण करके विषय-विग्रहकी सेवाके आस्वादनमें रत हैं। तो भी, श्रीचैतन्यदेव केवल आश्रयभावमय-विग्रह मात्र नहीं है, अपितु वे स्वयंरूप वस्तु हैं॥११॥ श्रीनिताइ—‘भक्तस्वरूप’, श्रीअद्वैत—‘भक्तावतार’ :— इथे भक्तभाव धरे चैतन्य गोसाञि। ‘भक्तस्वरूप’ ताँर नित्यानन्द भाइ ॥ १२ ॥ ‘भक्त-अवतार’ ताँर आचार्य गोसाञि। एइ तिन तत्त्व सबे प्रभु करि’ गाइ ॥ १३ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण भक्तभावको अङ्गीकारकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं और उनके भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीकृष्णके ‘भक्तस्वरूप’ हैं। श्रीअद्वैताचार्य प्रभु श्रीकृष्णके ‘भक्तावतार’ हैं। [श्रीकृष्णचैतन्य—भक्तरूप तत्त्व, श्रीनित्यानन्द—भक्तस्वरूप तत्त्व और श्रीअद्वैताचार्य—भक्तावतार तत्त्व]—इन तीनों तत्त्वोंको सभी प्रभु कहते हैं॥१२-१३॥ श्रीनिताइ एवं श्रीअद्वैत,—दोनों ईश्वरोंके भी ईश्वर श्रीगौर :— एक महाप्रभु, आर प्रभु दुइजन। दुइ प्रभु सेवे महाप्रभुर चरण ॥ १४ ॥ अनुवाद—इनमें एक श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं भगवान् होनेके कारण महाप्रभु हैं और अन्य दो—श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैत, प्रभु हैं। वे दोनों प्रभु महाप्रभुके चरणोंकी सेवा करते हैं॥१४॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभुको प्रणाम करते हुए श्रीरूपगोस्वामी कहते हैं— “नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते। कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥” महाप्रभु स्वयंरूप श्रीकृष्ण हैं। महावदान्य-लीलाका उनका नाम श्रीकृष्णचैतन्य है। सर्वापेक्षा श्रेष्ठ शिक्षक होनेसे महाप्रभु महावदान्य हैं। अन्यान्य शिक्षक अनुग्रह प्रकाश करनेके कारण ३८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

'वदान्य' हैं, किन्तु महाप्रभु शिक्षकोंके भी शिक्षक होनेके कारण 'महावदान्य' हैं। श्रीकृष्ण सेवासे ही सन्तुष्ट होते हैं—यह बात ही महाप्रभु कहते हैं। श्रीकृष्णसेवाका त्याग करनेसे ही सभी असुविधाएँ आती हैं। महाप्रभुका आशीर्वाद है—"कृष्णे मतिरस्तु"। श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके मनोभिलाषानुसार कार्य करके उन्हें नित्य निरन्तर आनन्द प्रदान करते हैं। उनमें नित्य आनन्द है। श्रीनित्यानन्द प्रभु भगवत्स्वरूप-स्वयंरूप नहीं होनेपर भी स्वयंप्रकाश हैं। स्वयंप्रकाश-तत्त्व स्वयंरूपको आनन्द प्रदान करते हैं। महाप्रभु अपनी लीलाकी सहायताके लिये अपने स्वयंरूपको प्रकाश करते हैं। श्रीअद्वैत प्रभु भी विष्णुतत्त्व हैं। सृष्टिके उपादान कारण श्रीअद्वैत प्रभु हैं; उपादान और निमित्त, दोनों कारणोंके मूल स्वयंप्रकाश श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैत प्रभु, दोनों ही महाप्रभुकी सेवा करते हैं और उनकी लीलाके सहायक हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु दस-देह धारणकर महाप्रभुकी सेवा करते हैं॥१४॥ तीन तत्त्व-आराध्य, और चौथे तथा पाँचवें तत्त्व-आराधक :- एइ तिन तत्त्व,–'सर्वाराध्य' करि' मानि। चतुर्थ ये भक्ततत्त्व,—'आराधक' करि' जानि॥१५॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु-ये तीन तत्त्व सभीके आराध्य हैं। चौथे तत्त्व जो भक्ततत्त्व हैं, वे 'आराधक' के रूपमें जाने जाते हैं॥१५॥ अनुभाष्य-पञ्चतत्त्वके स्वरूप-वर्णनमें हम लोग श्रीमन्महाप्रभुको ही सर्वश्रेष्ठ परतत्त्व और श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीअद्वैत प्रभु-इन दोनोंको उनके अधीन 'ईश्वर-तत्त्व' जान सकते हैं। परमेश्वर और दो ईश्वर-प्रकाश,-सभी परतत्त्व होनेके कारण अन्य सभी तत्त्वोंके आराध्य हैं। चौथे शुद्धभक्त-तत्त्व और पाँचवें अन्तरङ्गभक्त-तत्त्व-ये दोनों ही 'आराधक'-तत्त्व हैं। 'आराध्य' (श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु) सेवकरूपी ये दो तत्त्व 'आराधक' (श्रीवासादि शुद्धभक्तों और श्रीगदाधरादि अन्तरङ्ग भक्तों) के पूज्य होनेपर भी सेव्य श्रीगौराङ्गकी सेवावृत्तिमें अवस्थित हैं॥१४-१५॥ श्रीवासादि-भक्ततत्त्व :- श्रीवासादि यत कोटि कोटि भक्तगण। 'शुद्धभक्त'-तत्त्वमध्ये ताँ-सबार गणन॥१६॥ गदाधरादि-शक्तितत्त्व :- गदाधर-पण्डितादि प्रभुर 'शक्ति'-अवतार। 'अन्तरङ्ग-भक्त' करि' गणन याँहार॥१७॥ अनुवाद-श्रीवास ठाकुरादि जितने असंख्य भक्त हैं, उन सभीकी 'शुद्धभक्त'-तत्त्वके रूपमें गणना होती है। श्रीगदाधर पण्डितादि महाप्रभुके 'शक्ति' अवतार हैं; 'अन्तरङ्ग-भक्त' के रूपमें उनकी गिनती की जाती है॥१६-१७॥ अनुभाष्य-अन्तरङ्ग-भक्त और शुद्धभक्तके तत्त्वोंकी अपनी-अपनी विशेषता इस प्रकार है-शक्तितत्त्व मधुररसमें, वात्सल्यरसमें, सख्यरसमें और दास्यरसमें अवस्थित है। तटस्थ होकर

[ ७/१६-१७ तारतम्य-विचारसे भक्तोंकी अपेक्षा शक्तियोंकी श्रेष्ठता देखी जाती है, इसलिये मधुररसमें नित्याश्रित भक्तलोग ही श्रीगौरसुन्दरके अन्तरङ्ग सेवक हैं। श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैतके सेवकगण साधारणतः वात्सल्य, सख्य, दास्य और शान्तरसमें अवस्थित हैं। ये शुद्धभक्तगण जब श्रीगौरसुन्दरके प्रति अत्यन्त प्रीतियुक्त होते हैं, उस समय ही वे लोग अन्तरङ्ग-भक्तोंके आश्रयमें मधुररसाश्रित होते हैं। श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशयकी ‘प्रार्थना’ के प्रारम्भमें यह बात परिस्फुट हुई है— “गौराङ्ग बलिते हवे पुलक शरीर। हरि हरि बलिते नयने ब'बे नीर॥ आर कबे निताइचाँद करुणा करिबे। संसार-वासना मोर कबे तुच्छ ह'बे॥ विषय छाड़िया कबे शुद्ध ह'बे मन। कबे हाम हेरब श्रीवृन्दावन॥ रूप-रघुनाथपदे हइबे आकुति। कबे हाम बुझब श्रीयुगल-पिरीति॥” अर्थात् “अहो! वह दिन कब आयेगा जब ‘हा गौराङ्ग’ पुकारते हुए मेरा शरीर पुलकित होगा तथा हरि-हरि बोलते हुए आँखोंसे आँसुओंकी धारा बहेगी? कब श्रीनित्यानन्दप्रभुकी कृपासे मेरे हृदयसे सांसारिक वासनाएँ दूर होंगी? विषयोंका परित्यागकर मेरा मन कब शुद्ध होगा, जिससे कि मैं श्रीवृन्दावनधामके चिन्मय स्वरूपका दर्शन करूँगा। कब श्रीरूप गोस्वामी तथा श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें मेरी प्रीति होगी कि मैं उनकी कृपासे श्रीराधाकृष्णयुगलकी प्रीतिको जान पाऊँगा। अतः नरोत्तमदास सर्वदा प्रार्थना करते हैं कि श्रीरूप गोस्वामी एवं श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके श्रीचरणोंमें ही उनकी एकमात्र आशा रहे।” ‘शुद्धभक्त’ और ‘अन्तरङ्ग-भक्त’ के वैशिष्ट्य वर्णन करते हुए श्रीरूप गोस्वामीपादने स्वरचित ‘श्रीउपदेशामृत’ ग्रन्थमें साधक-जीवका क्रमोत्कर्ष इस प्रकार लिखा है— “कर्मिभ्यः परितो हरेः प्रियतया व्यक्तिं ययुर्ज्ञानिन- स्तेभ्योज्ञानविमुक्त-भक्तिपरमाः प्रेमैकनिष्ठास्ततः। तेभ्यस्ताः पशुपालपङ्कजदृशस्ताभ्योऽपि सा राधिका, प्रेष्ठा तद्वदियं तदीयसरसी तां नाश्रयेत् कः कृती॥” अर्थात् “स्वेच्छाचार-परायण जीवोंकी अपेक्षा निष्काम कर्मी श्रेष्ठ हैं; उन सदा-सर्वदा सत्कर्मोंमें लगे हुए पुण्यवान कर्मकाण्डियोंकी अपेक्षा तीनों गुणोंसे अतीत ब्रह्मज्ञानी श्रीकृष्णके अधिक प्रिय हैं; ऐसे ब्रह्मज्ञानियोंकी अपेक्षा “ज्ञाने प्रयासमुदपास्य” (श्रीमद्भा. १०/१४/३) इस उक्तिके अनुसार ज्ञानके प्रयासको छोड़कर, केवल भक्तिको ही श्रेष्ठ माननेवाले सनकादि भक्तजन श्रीकृष्णके प्रिय हैं; तथा सब प्रकारके भक्तोंसे, केवल प्रेमकी निष्ठावाले नारदादि शुद्ध भक्तजन श्रीकृष्णके और भी अधिक प्रिय हैं; उन सब प्रेमी भक्तोंकी अपेक्षा श्रीकृष्णगत-प्राण व्रज-गोपिकाएँ श्रीकृष्णकी अतिशय प्यारी हैं; उन प्यारी गोपियोंमें भी श्रीमती राधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी सर्वाधिक-प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हैं, उसी प्रकार यह राधाकुण्ड भी श्रीकृष्णका अतिशय प्यारा है। अतः ऐसा कौन-सा भाग्यवान-सुचतुर व्यक्ति होगा, जो ३८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

श्रीराधाकुण्डमें अप्राकृत रूपमें निवास करता हुआ श्रीकृष्णका आठों याम भजन नहीं करेगा? अपितु करेगा ही।” पञ्चतत्त्वके दो तत्त्व—शक्ति और तीन तत्त्व—शक्तिमान् हैं। शुद्धभक्त और अन्तरङ्गभक्त—ये ही दो प्रकारकी शक्तियाँ हैं। जो लोग अन्याभिलाषिताशून्य होकर अपनी शुद्धा श्रीकृष्णानुशीलन-वृत्तिको कर्म या ज्ञानके आवरणसे आवृत नहीं करते हैं, वे लोग शुद्धभक्त हैं। केवल मधुररसाश्रित ऐकान्तिक भक्तगण ही अन्तरङ्गभक्त हैं। मधुर-रसमें वात्सल्य, सख्य और दास्य अन्तर्भुक्त हैं। शुद्धभक्त-विशेष ही अन्तरङ्ग भक्त हैं॥ १६-१७॥ चारों तत्त्वोंको लेकर महाप्रभुका विहार, प्रचार, आस्वादन और दान :- याँ-सबा लञा प्रभुर नित्य विहार। याँ-सबा लञा प्रभुर कीर्त्तन-प्रचार॥ १८॥ याँ-सबा लञा करेन प्रेम-आस्वादन। याँ-सबा लञा दान करे प्रेमधन॥ १९॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१९॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु—अपने प्रकाश, अपने पुरुषावतारके अवतार, अन्तरङ्गभक्त और शुद्धभक्त—सबको लेकर ही स्वयं प्रेम-आस्वादनरूप नित्य विहार और जगत्में कीर्त्तन-प्रचाररूप प्रेम दान करते हैं॥१९॥ पञ्चतत्त्वोंका मिलकर श्रीकृष्णप्रेम-रसका नित्य आस्वादन और वितरण :- सेई पञ्चतत्त्व मिलि' पृथिवी आसिया। पूर्व-प्रेमभाण्डारेर मुद्रा उघाड़िया॥ २०॥ पाँचे मिलि' लूटे प्रेम, करे आस्वादन। यत यत पिये, तृष्णा बाड़े अनुक्षण॥ २१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य॥ २०-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णका चरित्र ही प्रेमका भण्डार है। वह भण्डार इस जगत्में आया तो था, किन्तु उसका द्वार बन्द था और उसमें ताला लगा हुआ था। श्रीचैतन्यावतारके पञ्चतत्त्वने मिलकर उस तालेको तोड़ दिया। तब उन्होंने द्वार खोलकर उस भण्डारको लूटपाट करते हुए उस प्रेमका आस्वादन किया। उन्होंने जितना उस प्रेमका पान किया, उतनी ही उनकी तृष्णा प्रतिक्षण बढ़ने लगी॥२१॥ पुनः पुनः पियाइया हय महामत्त। नाचे, कान्दे, हासे, गाय, यैछे मदमत्त॥ २२॥ अनुवाद—बार-बार उस प्रेमको पीकर वे मत्त हो गये और मदमत्तकी भाँति नाचने, रोने, हँसने तथा [श्रीकृष्ण नाम-रूप-लीलादिका] गान करने लगे॥२२॥ श्रीकृष्णप्रेम-वितरणमें पात्रापात्रके विचारका अभाव :- पात्रापात्र विचार नाहि, नाहि स्थानास्थान। येई याँहा पाय, ताँहा करे प्रेमदान॥ २३॥

[ ७/२३-२६ प्रेम-वितरणके फलसे हासके बदले वृद्धि :- लुटिया, खाइया, दिया, भाण्डार उजाड़े। आश्चर्य भाण्डार, प्रेम शतगुन बाड़े॥ २४॥ अनुवाद—उस प्रेमको वितरण करनेमें उन्होंने योग्य-अयोग्य पात्र अथवा उचित-अनुचित स्थानका भी विचार नहीं किया अर्थात् उन्हें जहाँ जो भी मिला, उसे प्रेमका मुक्त हस्तसे दान किया। इस प्रेमके भण्डारको श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा उनके पार्षदोंने लूटा और लुटाया, खाया और सभीको खिलाया तथा वितरण करके भण्डारको उजाड़ दिया। किन्तु आश्चर्यकी बात यह है कि वह भण्डार खाली होनेके बदले सैकड़ों गुणा बढ़ गया॥ २३-२४॥ प्रेमकी बाढ़में जगत् मग्न :- उछलिल प्रेमवन्या, चौदिके बेड़ाय। स्त्री, वृद्ध, बालक, युवा, सकलि डुबाय॥ २५॥ सज्जन, दुर्जन, पङ्गु, जड़, अन्धगण। प्रेमवन्याय डुबाइल जगतेर जन॥ २६॥ अनुवाद—उस प्रेमकी बाढ़ उछलकर चारों ओर फैल गयी। उस प्रेमबाढ़में स्त्री, बूढ़े, बालक, युवा, सज्जन, दुर्जन, पङ्गु, जड़, अन्धे—जगत्के सभी लोग डूब गये॥ २५-२६॥ अमृतानुकणिका—जब गङ्गामें बाढ़ आती है, तब उसका जल तटप्रदेशका अतिक्रम करके, पक्के ऊँचे बाँधकी भी उपेक्षा करके दूर-दूर तक फैलकर अगम्य स्थानपर भी भूमिको जलमग्न कर देता है। परन्तु बाढ़ कब आयेगी, इसे कोई नहीं जानता। तभी नाविक भी पूर्व सावधान नहीं हो पाते, वणिक अपनी दुकानसे सामानको किसी सुरक्षित स्थानपर नहीं ले जा पाते। अचानक ही कहींसे बाढ़का जल प्रबल वेगसे आकर नौकाको डुबो देता है, वणिकके सामानको बहाकर ले जाता है। केवल यही नहीं, उद्वेलित तरङ्ग सभीको ही अपनेमें डुबो लेती है—महत्के साथ क्षुद्रकी युद्धमें कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, इसलिये सभी अपने प्रयास छोड़कर महत्के शरणागत हो जाते हैं। जो केवल बाढ़के भयसे बहुत पूर्व ही किसी अति उच्च स्थानपर जाकर वास करते हैं अथवा नदीसे बहुत दूर किसी मरुभूमि सदृश स्थानपर जाकर वास करते हैं, उन्हें बाढ़का जल स्पर्श नहीं करता। मर्त्य-जगत्की बाढ़की हेयता है—वह बड़े-बड़े पुलोंको नहीं तोड़ पाती है; प्रेम-बाढ़में हेयता नहीं है। प्रेम-बाढ़ बहुत शक्तिशाली पुलोंको भी तोड़ देती है, किन्तु उसके कारण जीव मरते नहीं, अपितु अमर हो जाते हैं। अमर होकर नित्यानन्द-निकेतनमें आनन्दमयके नवनवायमान सेवानन्दमें, प्रेमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं। केवल वे ही मरते हैं जो इस प्रेम-बाढ़के भयसे वृक्षके ऊपर चढ़कर निज बलसे आत्मरक्षा करना चाहते हैं अर्थात् जो इस प्रेम-बाढ़से बचना चाहते हैं, वे इसी मृत्युलोकमें पुनः-पुनः जन्म लेकर मृत्युको प्राप्त होते हैं। प्रेम तरल-निर्मल-स्वच्छ होनेपर भी गाढ़ा है। कर्मकी हेयता, ज्ञानकी कठोरता प्रेममें नहीं है। प्रेम अप्राकृत सरल सहज वस्तु है। यह निर्मल कृष्णप्रेम-बाढ़ सभीको डुबो लेती है—यह स्त्री-पुरुषका विचार नहीं करती, बालक-युवाको देखकर अपेक्षा नहीं करती। यह प्रेमकी बाढ़ ३८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/२५-२८ ] साधुको भी डुबोती है, और जगाइ-मधाइ जैसे वैष्णवापराध-शून्य दुर्जनोंको भी खींचकर अपनेमें समा लेती है॥ २५-२६॥ श्रीकृष्णप्रीतिरसमें डूबनेके कारण जीवोंके कर्मबीजका नाश :- जगत् डुबिल, जीवेर हइल बीज नाश। ताहा देखि' पाँचजनेर परम उल्लास॥ २७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रेम-भण्डारका द्वार खुल गया और प्रेम-रसकी बाढ़ने प्रबलवेगसे समस्त जगत्को डुबो दिया। उससे बद्धजीवोंकी श्रीकृष्णदास्य-विस्मृतिरूप अविद्या-बन्धन-बीज नष्ट हो गया। इसे देखकर पञ्चतत्त्वको परम उल्लास हुआ॥ २६-२७॥ अनुभाष्य-भगवान्की तटस्था नामक जीवशक्तिमें श्रीकृष्णोन्मुखी चेष्टाके साथ-साथ श्रीकृष्ण-विमुखतारूप भोगवासनाका बीज भी अव्यक्त रूपसे रहता है। संसार-वृक्षसे उत्पन्न वासना-बीज कालके प्रवाहसे सिञ्चित होकर नानाप्रकार भोगबन्धनोंके द्वारा बद्धजीवको दिन-रात त्रितापोंसे जला रहा है। जिस प्रकार मिट्टीमें लगाया बीज जलमग्न होनेपर उससे अङ्कुर निकलनेकी सम्भावना नहीं रहती, उसी प्रकार भगवत्सेवा-समुद्रकी अथाह जलराशिमें श्रीकृष्णसेवासे इतर भोगवासनाका बीज प्रेमकी बाढ़में डूबकर नष्ट हो गया और उससे और वासनारूपी अङ्कुर निकलनेकी सम्भावना नहीं रही। श्रीचैतन्यचन्द्रका पञ्चतत्त्वरूपमें अवतीर्ण होनेका उद्देश्य सफल हुआ देखकर सभी उल्लसित हुए। श्रीमद् प्रबोधानन्द सरस्वती त्रिदण्डिपादने ‘श्रीचैतन्यचन्द्रामृत’ ग्रन्थमें उसका इस प्रकार वर्णन किया है— “स्त्री-पुत्रादि-कथां जहुर्विषयिनः शास्त्रप्रवादं बुधा, योगीन्द्रा विजहुर्मरुन्नियमज-क्लेशं तपस्तापसाः। ज्ञानाभ्यासविधिं जहुश्च यतयश्चैतन्यचन्द्रे परामाविष्कुर्वति भक्तियोगपदवीं नैवान्य आसीद्रसः॥” अर्थात् “जबसे श्रीचैतन्यचन्द्रने शुद्धा प्रेमाभक्तिके पथको प्रकाशित किया है, तबसे विषयी लोगोंने अपनी स्त्री-पुत्रादिकी बातें करना बन्द कर दिया है, विद्वानोंने शास्त्रोंका वाद-विवाद बन्द कर दिया है, योगियोंने प्राणायामके द्वारा श्वासको नियन्त्रित करनेके कष्टका परित्याग कर दिया है, तपस्वियोंने कठोर तपस्याका त्याग कर दिया है, ज्ञान-मार्गावलम्बियोंने निर्विशेष ब्रह्ममें लीन होनेके दुश्विचारका त्याग कर दिया है। अब केवल सर्वत्र श्रीकृष्णप्रेमका ही माधुर्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी रसमय (मधुर) नहीं है।”॥ २७॥ प्रेमवर्षणके कारण प्रेमरसकी वृद्धि :— यत यत प्रेमवृष्टि करे पञ्चजन। तत तत बाड़े जल, व्यापे त्रिभुवन॥ २८॥ अनुवाद-इन पञ्चतत्त्वोंने मिलकर जितनी प्रेमकी वर्षा की, उतना ही (प्रेमरूपी) जल बढ़ता गया और उसने त्रिभुवनको व्याप्त कर लिया॥ २८॥ सातवाँ अध्याय | ३८७

[ ७/२९-३३ श्रीकृष्णप्रेमरससे वञ्चित :- मायावादी, कर्मनिष्ठ कुतार्किकगण। निन्दक, पाषण्डी, यत पड़ुया अधम॥ २९॥ सेइ सब महादक्ष धाञा पलाइल। सेइ वन्या ता-सबारे छुँइते नारिल॥ ३०॥ अनुवाद-अपनी-अपनी वृत्तिमें महादक्ष अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमके विरोधी-मायावादी, सकामकर्मी, कुतार्किक, निन्दक, पाषण्डी और जितने पढ़नेवालोंमें अधम, ये सभी वहाँसे दूर भाग गये, इसलिये उनको यह प्रेमकी बाढ़ स्पर्श नहीं कर पायी अर्थात् वे प्रेमाभक्तिसे वञ्चित रह गये॥ २९-३०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘मायावादी’-प्रकाशानन्दादि संन्यासी मायावादी हैं। वे लोग सभी सद्-विषयोंमें ‘माया’ को लेकर वाद उठाते हैं। ‘ब्रह्म’ को ‘मायासे अतीत’ कहकर ‘ईश्वर’ को ‘मायासङ्गी’ कर देते हैं और ईश्वरके सभी अवतारोंके शरीरको ‘मायिक’ कहते हैं। वे कहते हैं कि जीवके गठनमें मायाका कार्य है अर्थात् जीवकी सभी प्रकारकी अहं-बुद्धि मायासे निर्मित है। इसलिये उनका यह सिद्धान्त है कि जीवके मुक्त होनेपर ‘शुद्धजीव’ नामक और कोई अवस्था नहीं रहती है। अर्थात् मुक्त होनेपर जीव ब्रह्मके साथ एक हो जाता है, वे इस प्रकारकी शिक्षा देते हैं। ‘कर्मनिष्ठ’-देवानन्दादि भक्तिहीन कर्मी लोग। कर्मजड़ स्मार्त्तलोग अर्थात् जो कर्म और कर्मफलको ही जीवका मुख्य उद्देश्य कहते हैं। ‘कुतार्किकगण’-सार्वभौमादि निरीश्वर तार्किक लोग। ‘निन्दक’-जिनको महाप्रभुने अपना दण्ड लेकर ताड़न किया था और गोपाल-चापालादि प्रभु और प्रभुके भक्तोंके निन्दक लोग। ‘पाषण्डी’-भगवान्‌के साथ अन्य-अन्य देवताओंकी समता-व्याख्या करनेवाले। ‘अधम पड़ुआ’-वे सभी पढ़े-लिखे लोग जो विद्याको तर्कका कारण मानते हैं और विद्या ईश्वर-प्राप्तिका उपाय है, यह नहीं जानते॥ २९॥ अहैतुकी-कृपासिन्धुके द्वारा उन सबके उद्धारकी चिन्ता :- ताहा देखि' महाप्रभु करेन चिन्तन। जगत् डुबाइते आमि करिलूँ यतन॥ ३१॥ केह केह एड़ाइल, प्रतिज्ञा हइल भङ्ग। ता-सबा डुबाइते पातिब किछु रङ्ग॥ ३२॥ पतित वञ्चित जीवोंके उद्धारके लिये संन्यास-ग्रहण :- एत बलि' मने किछु कोरिया विचार। संन्यास-आश्रम प्रभु कैला अङ्गीकार॥ ३३॥ अनुवाद-यह देखकर अर्थात् मायावादी, कर्मियों आदिको भागते हुए देखकर महाप्रभु चिन्ता करने लगे कि मैंने जगत्‌को प्रेमकी बाढ़में डुबोनेके लिये इतना यत्न किया, किन्तु कोई-कोई ३८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/३१-३४ ] इससे भाग निकले और समस्त जगत्को प्रेमकी बाढ़में डुबोनेकी मेरी प्रतिज्ञा भङ्ग हो गयी। इसलिये किसी उपायसे उन सभीको प्रेमकी बाढ़में डुबोनेके लिये कुछ अद्भुत लीला करूँगा। तब उन्होंने मनमें कुछ विचार करके संन्यास-आश्रमको अङ्गीकार किया॥ ३१-३३॥ अनुभाष्य-मायातीत भगव त्तामें, भगवद्धाममें, भगवद्भक्तिमें और भक्तोंमें 'माया' है-इस प्रकार भ्रान्तविश्वासी व्यक्ति ही 'मायावादी' हैं। उपरोक्त चार तत्त्वोंमें कर्म है और वे फल-भोगके लिये बाध्य हैं, इस प्रकार भ्रान्तविश्वासी व्यक्ति ही 'कर्मनिष्ठ' हैं। इन चार तत्त्वोंमें अज्ञानके कारण तर्कका स्थान है, इस प्रकार भ्रान्त बुद्धिवाले लोग ही 'कुतार्किक' हैं। ये चार तत्त्व निन्दाके योग्य हैं, इस प्रकारकी भ्रान्त बुद्धिवाले व्यक्ति ही 'निन्दक' हैं। इन चार तत्त्वोंके साथ अन्य मायिक वस्तुओंका साम्य है, इस प्रकार भ्रान्त-मतिवाले व्यक्ति ही 'पाषण्डी' हैं। और ये चार तत्त्व दूसरे जड़भोग्य-विषयोंके तुल्य हैं, इस प्रकार भ्रान्त अध्ययनशील व्यक्ति ही 'अधम पड़ुया' हैं। प्रेममय श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रदत्त प्रेम-बाढ़का जल उन सबको किसी भी प्रकारसे स्पर्श ना कर सके, इस उद्देश्यसे भागते हुए देखकर श्रीमन्महाप्रभुने उपरोक्त श्रीकृष्णविमुख चतुर्वर्ग-अभिलाषी जड़प्रकृतिवाले मानवोंके परमश्रद्धेय चतुर्थाश्रम संन्यासको स्वीकार करनेकी इच्छा की। उन्होंने विचार किया कि पूर्वोक्त मायामुग्ध विषयी लोगोंके विश्वासमें चतुर्थाश्रम ही वह उपादेय आदर्श है॥ ३३॥ अमृताणुकणिका-परम औदार्यविग्रह प्रेममय श्रीगौरसुन्दर किसीको भी नहीं छोड़ेंगे, तभी उन्होंने कपट-संन्यासीका वेश धारण किया-स्वयं भगवान् होकर भी भक्तके भावको अङ्गीकार किया। इस बार केवल भक्त ही नहीं, आश्रमीके चिह्न भी धारण किये-मायावादीकी पोशाक भी ली। वनमें हाथियोंको पकड़नेके लिये जैसे अन्य पालतू हाथीकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मत्त-गजतुल्य बहिर्मुख मायावादियोंको आकर्षण करनेके लिये भगवान्ने सिद्धान्तपरायण कपट संन्यासीका वेश धारण किया। इस कपट संन्यासीके वेशमें द्वार-द्वार जाकर प्रेमकी वर्षा की, केवल स्वयं ही नहीं, अपने अभिन्न-विग्रह स्वयं-प्रकाश प्रेमोन्मत्त अवधूतवेशी श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देशमें भेजा। श्रीनित्यानन्द प्रभुने गौड़देशमें प्रेमकी बाढ़ प्रवाहित की॥ ३१-३३॥ चब्बिश वत्सर छिला गृहस्थ-आश्रमे। पञ्चविंशति वर्षे कैल यतिधर्मे ॥ ३४॥ अनुवाद-श्रीमन्महाप्रभु गृहस्थ-आश्रममें चौबीस वर्षतक रहे। पच्चीसवें वर्षके आरम्भमें उन्होंने संन्यास-आश्रममें प्रवेश किया॥ ३४॥ अनुभाष्य-चार प्रकारके आश्रम हैं-ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति (संन्यास)। प्रत्येक आश्रममें चार प्रकारके भेद है। श्रीमद्भागवत (३/१२/४२-४३) श्लोकमें- “सावित्रं प्राजापत्यञ्च ब्राह्मञ्चाथ बृहत्तथा। वार्ता सञ्चयशालीनशिलोञ्छ इति वै गृहे॥ सातवाँ अध्याय | ३८९

वैखानसा वालिखिल्यौडुम्बराः फेनपा वने। न्यासे कुटीचकः पूर्वं बह्दोदो हंसनिष्क्रियौ॥" अर्थात् “चार प्रकारके ब्रह्मचर्य- (१) सावित्र्य (उपनयनसे आरम्भ करके गायत्री-अध्ययनकारीका तीन रातके लिये ब्रह्मचर्य व्रत), (२) प्राजापत्य (उपनयनसे लेकर एक वर्ष तक व्रतपालनकारीका ब्रह्मचर्य व्रत), (३) ब्राह्म (उपनयनसे लेकर तीन वेदोंको ग्रहण करनेके समय तक ब्रह्मचर्य व्रत), (४) बृहत् (उपनयनसे लेकर मृत्यु पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत)। इनमेंसे प्रथम तीनोंको 'उपकुर्वाण' और चौथेको 'नैष्ठिक' नामसे जाना जाता है। चार प्रकारके गृहस्थ- (१) वार्त्ता (शास्त्र अनुमोदित कृषि आदि वृत्ति), (२) सञ्चय (याजनादि वृत्ति), (३) शालीन (किसीसे कुछ ना माँगकर जीवन निर्वाह करनेकी वृत्ति), (४) शिलोञ्छन (स्वतः गिरे हुए अन्नादिको एकत्रितकर जीवन निर्वाह करनेकी वृत्ति)। चार प्रकारके वानप्रस्थ- (१) वैखानस (कन्द-मूलादिके द्वारा जीवन निर्वाहकी वृत्ति), (२) बालिखिल्य (नया अन्न प्राप्त होनेपर पूर्व सञ्चित अन्नको जो त्याग करते हैं), (३) उडुम्बर (शय्या त्यागनेपर जिस दिशाको देखेंगे, उसी दिशासे द्रव्य ग्रहणकर जीवन निर्वाह करनेवाले), (४) फेणप (वृक्षोंसे अपने-आप गिरे हुए फलादिसे जीवन धारण करनेवाले)। चार प्रकारके संन्यासी- (१) कुटीचक (स्वाश्रमधर्म-प्रधान), (२) बहुदक (कर्म त्यागकर ज्ञानाभ्यास प्रधान), (३) हंस (ज्ञानाभ्यास-निष्ठ), (४) निष्क्रिय (तत्त्वकी उपलब्धि किये हुए अर्थात् परमहंस)। चारों प्रकारके संन्यासियोंमें कुटिचकसे बहुदक श्रेष्ठ हैं, इसी प्रकार बहुदकसे हंस और हंससे निष्क्रिय श्रेष्ठ हैं।” संन्यास भी दो प्रकारके हैं-धीर और नरोत्तम; (भाः १/१३/२६-२७)- “गतस्वार्थमिमं देहं विरक्तो मुक्तबन्धनः। अविज्ञातगतिर्जह्यात् स वै धीर उदाहृतः॥ यः स्वकात् परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्। हृदि कृत्वा हरिं गेहात् प्रव्रजेत् स नरोत्तमः॥” अर्थात् “जो विषय आदिमें आसक्तिरहित और अभिमानशून्य होकर ऐहिक (लौकिक) और पारत्रिक (पारलौकिक) सुखसाधनकी कामनासे रहित इस शरीरका दूसरोंके बिना जाने त्याग कर देते हैं, वे ही 'धीर' कहलाते हैं। आत्म-तत्त्वको जाननेवाला जो व्यक्ति अपने विवेकसे ३९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/३४-३८ ] या दूसरेके समझानेपर वैराग्यवान होकर अपने हृदयमें श्रीहरिको धारणकर संन्यासके लिये घरसे निकल जाता है, वही 'नरोत्तम' अर्थात् उत्तम मनुष्य है।" श्रीमन्महाप्रभुने १४३२ शकाब्द माघमासके शुक्लपक्षमें कटवामें श्रीशङ्करसम्प्रदायके दक्षिणभारतके शृङ्गेरीमठके अधीन श्रीकेशवभारती दण्डिस्वामीसे संन्यास ग्रहण किया॥ ३४॥ पड़ुया, पाषण्डी, तार्किक-निन्दकादि वञ्चित गुटोंका उद्धार :- संन्यास करिया प्रभु कैला आकर्षण। यतेक पालाञाछिल तार्किकादिगण॥ ३५॥ पड़ुया, पाषण्डी, कर्मी, निन्दकादि यत। तारा आसि' प्रभु-पाय हय अवनत॥ ३६॥ अनुवाद - तार्किकादि जितने लोग भाग गये थे, महाप्रभुने संन्यास ग्रहण करके उन सबका आकर्षण किया। पड़ुया, पाषण्डी, कर्मी, निन्दकादि जितने लोग थे, वे सभी आकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंमें नतमस्तक हुए॥ ३५-३६॥ अनुभाष्य - आदिलीला ७/३३ संख्याके अनुभाष्यका शेष अंश द्रष्टव्य है॥ ३६॥ उनका अपराध-मोचन और भक्तिलाभ :- अपराध क्षमाइल, डुबिल प्रेमजले। केबा एड़ाइबे प्रभुर प्रेम-महाजाले॥ ३७॥ सभी जीवोंके उद्धारके लिये उपायका आविष्कार :- सबा निस्तारिते प्रभु कृपा-अवतार। सबा निस्तारिते करे चातुरी अपार॥ ३८॥ अनुवाद - श्रीमन्महाप्रभुने सबके अपराधोंको क्षमा करके प्रेमजलमें डुबो दिया, क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो महाप्रभुके इस प्रेमरूपी महाजालसे निकलकर चला जाय। सभी जगत्वासियोंका उद्धार करनेके लिये श्रीचैतन्य महाप्रभु कृपापूर्वक आविर्भूत हुए थे, इसलिये सभीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने ऐसी चतुरायी दिखलायी॥ ३७-३८॥ अमृतानुकणिका - महाप्रभुकी अचिन्त्य महाशक्तिसे अनेक लोगोंके अपराधादि जनित चित्तके कल्मष महाप्रभुके मुखसे हरिनाम सुनने मात्र अथवा महाप्रभुके दर्शन मात्रसे दूर हो गये और उसी समय ही वे श्रीकृष्ण प्रेम प्राप्त करके कृतार्थ हो गये। परन्तु अधम पड़ुआ, पाषण्डियों आदिके प्रति महाप्रभुने उस शक्तिका प्रकाश नहीं किया, क्योंकि उन्होंने अपनी प्रकटलीलाके बादके समयमें जीवोंके मङ्गलके निमित्त उन्होंने पड़ुआ, पाषण्डी, चापाल-गोपाल आदि लोगोंके अपराध मोचनके लिये विशेष अवस्थाका अवलम्बन किया। महाप्रभुने दृष्टिमात्रसे ही जीवोंको कृतार्थ किया, उनमेंसे किसी-किसीके हृदयमें प्रेम प्राप्तिके प्रतिकूल अपराध था, यह जाननेका कोई उपाय नहीं है। चापाल-गोपाल, पड़ुआ, पाषण्डी आदि लोग अपराधी थे, इस बातको सब लोग जानते थे। उनके अपराध मोचनके लिये विशेष व्यवस्थाका अवलम्बन ना कर, केवल दृष्टि आदिके द्वारा ही यदि उनको प्रेम दान करके प्रभु कृतार्थ करते, तब परवर्तीकालके लोगोंके मनमें यह भाव होता कि प्रेम प्राप्तिके विषयमें अपराध कोई बड़ी बाधा नहीं है। यह सातवाँ अध्याय | ३९१

[ ७/३७-३९ अपराध प्रेम प्राप्तिमें गुरुतर बाधा है—ऐसा मानकर आने वाले समयमें लोग अपराधको दूर करनेके लिये सचेष्ट रहेंगे, इसलिये महाप्रभुने उनको प्रेम नहीं दिया। दूसरोंकी बात तो दूर रहे, शचीमाताको उपलक्ष्य करके भी महाप्रभुने अपराधके गुरुत्वकी जीवोंको शिक्षा दी है। उन्होंने पड़ुया, पाषण्डी, निन्दकादिके अपराध ग्रहण नहीं किये और कर भी नहीं सकते, क्योंकि उनका उद्देश्य तो सबको प्रेमदान करना है। यदि वे अपराध ग्रहण करेंगे तो वो किस प्रकारसे प्रेमदान करेंगे? अपितु अपराधीके चित्तकी अवस्था परिवर्त्तन करनेके निमित्त ही वे उत्कण्ठित हो उठे। किसीके भी चित्तका परिवर्तन केवल बाहरसे अन्य किसीके द्वारा साधित नहीं होता। भीतरसे परिवर्तनके निमित्त अपने दोषकी सम्पूर्ण अनुभूति और उसके लिये तीव्र अनुताप एकान्त प्रयोजनीय है। महाप्रभुके अपूर्व त्यागको देखकर अपराधियोंको अपना दोष स्पष्ट रूपसे समझ आ गया और अनुतापसे उनके चित्तकी मलिनता जब सम्पूर्ण रूपसे दग्धीभूत हो गयी, तभी उनके अपराधका बीज नष्ट हुआ तथा तभी चित्तमें प्रेमभक्तिके आविर्भावकी योग्यता प्राप्त की। महाप्रभुके शरणागत होनेके द्वारा उनका अनुताप ही प्रकाशित हुआ है। महाप्रभुने जब देखा कि उनका चित्त प्रेमभक्ति ग्रहण करनेके योग्य हो गया है, तभी उन्होंने उनको प्रेमभक्ति प्रदान की ॥ ३७-३८ ॥ काशीके मायावादियोंके अतिरिक्त सभी मनुष्योंका उद्धार :- तबे निज भक्त कैल यत म्लेच्छ आदि। सबे एड़ाइल मात्र काशीर मायावादी ॥ ३९ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ३९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करने मात्रसे ही कुतार्किक, कर्मनिष्ठ, निन्दक, पाषण्डी और अधम पड़ुया लोगोंने धीरे-धीरे उनका चरणाश्रय ग्रहण किया तथा अनेक म्लेच्छ लोगोंने भी उनका आनुगत्य स्वीकार किया। केवल वाराणसीके मायावादी लोग उस प्रेमबाढ़से दूर रह गये थे ॥ ३९ ॥ अनुभाष्य—'काशीके मायावादी'—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञानको ही सत्य माननेवाले व्यक्ति इन्द्रियोंके द्वारा जो जगत् दर्शन करते हैं, उसे इन्द्रियज्ञानके द्वारा माप लिये जानेके कारण 'माया-रचित' कहते हैं। 'तत्त्ववस्तु मायातीत होनेपर भी उसमें नित्य चित्-वैचित्र्य अथवा चिद्विलास नहीं है, यह केवल चिन्मात्र है'—इस प्रकारके विचारोंमें निपुण व्यक्ति ही “काशीके मायावादी" हैं। 'सारनाथके मायावादी' या 'बोधगयाके मायावादी' ब्रह्मकी मायाको स्वीकार नहीं करते हैं। उनके विचारसे अचिन्मात्रवाद ही सिद्ध है। 'काशीके मायावादी' और उनके अतिरिक्त दूसरे स्थानोंके मायावादी,—सभी प्रकृतिवादी हैं—वे लोग कोई भी 'ब्रह्म अथवा तत्त्ववादी' नहीं हैं। काशीके मायावादीगण स्वयंको ब्रह्मवादी कहनेपर भी ब्रह्मप्रकृतिका वैशिष्ट्य स्वीकार नहीं करते। समन्वयवादसूत्रसे ब्रह्म और मायाको अभिन्नरूपसे जानते हैं। मायावादीगण भक्ति-योगमायाका सन्धान ना रखनेके कारण अभक्त अथवा श्रीकृष्णभक्ति-विमुख हैं। मायावादियोंका हृद्गत अनुभाव यह है कि 'नित्या भक्तिकी सभी कथाएँ, भजनीय वस्तु और भक्त—ये सभी उनके इन्द्रियजात ज्ञानके अधीन हैं, किन्तु वस्तुतः वास्तव-सत्य-विचारसे इन सभी कथाओंका कोई मूल्य नहीं है।' मायावादीगण परस्पर जितने भी कुतर्क अथवा विवाद क्यों ना करें, वास्तव ३९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/३९-४५ ] सत्यके निकट अभिगमन ना करनेपर तत्त्ववस्तु और उसका चित्-वैचित्र्य उनके काल्पनिक विचारके अधीन नहीं होता है॥३९॥ वृन्दावन याइते प्रभु रहिला काशीते। मायावादिगण ताँरे लागिला निन्दिते॥४०॥ अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावन जाते समय काशीमें कुछ दिन रहे। उस समय मायावादी लोग उनकी निन्दा करने लगे॥४०॥ मायावादियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा :— संन्यासी हइया करेन गायन, नाचन। ना करे वेदान्त-श्रवण, करे सङ्कीर्त्तन॥४१॥ अनुवाद—वे कहने लगे कि देखो यह संन्यासी होकर भी वेदान्त श्रवण ना करके नाचता, गाता और सङ्कीर्तन करता है॥४१॥ अनुभाष्य—“संन्यासी तौर्यत्रिक अर्थात् ‘गान’, ‘नर्तन’ तथा ‘वादन’-कार्य परित्याग करेंगे एवं सर्वदा वेदान्तानुशीलन करेंगे”—इस स्मृतिशास्त्रीय विधिके अनुकूलसे, महाप्रभुको शाङ्कर-मायावाद श्रवण ना करते हुए देखकर अपितु श्रीकृष्णकीर्त्तनमें मत्त होकर प्रेमसे नृत्य करते हुए देखकर काशीके संन्यासी उनको संन्यास-धर्ममें अनभिज्ञ सोचने लगे। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा कथित “वेदान्त वाक्येषु सदा रमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः” अर्थात् “जो कौपीन धारण करके वेदान्तके वाक्योंमें सदा रमण करते हैं, वे निश्चय ही भाग्यवान् हैं”—इस लक्षणको ना देखकर मायावादी संन्यासी और गृहस्थ महाप्रभुकी निन्दा करने लगे। काशीके मायावादी संन्यासियोंके उद्धार प्रसङ्गके सम्बन्धमें, मध्यलीला, २५/५-१६९ संख्या विशेषरूपसे द्रष्टव्य है॥४१॥ मूर्ख संन्यासी निज-धर्म नाहि जाने। भावुक हइया फेरे भावुकेर सने॥४२॥ एसब शुनिया प्रभु हासे मने मने। उपेक्षा करिया कारो ना कैल सम्भाषणे॥४३॥ महाप्रभुके द्वारा उनकी उपेक्षा और मथुरा गमन :— उपेक्षा करिया कैल मथुरा गमन। मथुरा देखिया पुनः कैल आगमन॥४४॥ अनुवाद—‘यह मूर्ख संन्यासी अपना धर्म भी नहीं जानता है। भावुकोंके साथ भावुक बनकर घूमता रहता है’—ये सब बातें सुनकर महाप्रभु मन-ही-मनमें हँसने लगे और उन्होंने उनकी बातका कोई उत्तर ना देकर उनकी उपेक्षा की। महाप्रभु उन मायावादियोंकी उपेक्षा करके मथुरा चले गये और मथुरा दर्शन करनेके बाद वे पुनः काशीमें आये॥४२-४४॥ चन्द्रशेखरके घरमें अवस्थान :— काशीते लेखक शूद्र-श्रीचन्द्रशेखर। ताँर घरे रहिला प्रभु स्वतन्त्र ईश्वर॥४५॥ सातवाँ अध्याय | ३९३

[ ७/४५-४८ मायावादी संन्यासियोंका त्यागकर तपन मिश्रके घरमें भिक्षा :- तपन-मिश्रेर घरे भिक्षा-निर्वाहण। संन्यासीर सङ्गे नाहि माने निमन्त्रण ॥ ४६ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४५-४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैद्य चन्द्रशेखर शूद्रवर्णके थे। संन्यासियोंका शूद्रवर्णके घरमें रातमें ठहरना उचित नहीं है, किन्तु उनके प्रति कृपा करके महाप्रभु उनके घरमें रहे, क्योंकि वे स्वतन्त्र ईश्वर हैं। ब्राह्मण, शूद्र-सभी उनकी कृपाके समान पात्र हैं। महाप्रभु तपन मिश्रके घरमें भिक्षा अर्थात् भोजन ग्रहण करते थे, किन्तु कहीं भी किसी दूसरे संन्यासीके साथ निमन्त्रण स्वीकार नहीं करते थे॥४५-४६॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीचन्द्रशेखरका 'शौक्र-वैद्य' के रूपमें उल्लेख किया गया है। उस समय शौक्र-वैद्यगण और शौक्र-ब्राह्मणोंके अतिरिक्त सभी वर्ण ही 'शूद्र' नामसे परिचित होते थे। बादमें पिछली शताब्दीसे व्रात्य-संस्कारका आश्रयकर कायस्थोंने क्षत्रियोंके और वैश्योंने वैश्योंके संस्कारोंको ग्रहण किया और कर रहे हैं। श्रीगौड़ीय वैष्णवाचार्य-वंशसमूहमें वैष्णव-विश्वासके अनुगमनसे ठाकुर रघुनन्दनके वंशमें ठाकुर कृष्णदास और नवनी होड़के वंशमें एवं श्यामानन्दप्रभुके शिष्य श्रीरसिकानन्ददेवके वंशमें ब्राह्मणोंका आदर्श उपनयन-संस्कार आजसे तीन-चार सौ वर्ष पहलेसे चलता आ रहा है, ये लोग अभी भी ब्राह्मणादि सभी वर्णोंकी दीक्षा तथा गुरुका कार्य और शालग्रामादिका अर्चन करते आ रहे हैं॥४५॥ अमृताणुकणिका-महाप्रभु मायावादी ब्राह्मण-संन्यासियोंका निमन्त्रण स्वीकार नहीं करते थे। संन्यासी लोग ब्राह्मण, त्यागी, तपस्वी और शुद्धाचार थे, तथापि महाप्रभु उनके साथ भोजन नहीं करते थे। तब महाप्रभु जो चन्द्रशेखरके घर अन्न ग्रहण ना करके तपनमिश्रके घर भिक्षा निर्वाह करते थे, वह तपनमिश्र और चन्द्रशेखरके प्रति जाति बुद्धि रखकर नहीं था। मायावादी संन्यासियोंका उद्धार ही महाप्रभुका काशीमें आनेका मुख्य उद्देश्य था, इसलिये उन्होंने मायावादी संन्यासीके वेशग्रहणका अभिनय किया था। वस्तुतः उन्होंने मायावाद और कर्मजड़स्मार्त्त-धर्मका (सुबुद्धि राय सम्बन्धी दृष्टान्तमें) सभी प्रकारसे खण्डन किया था। उनका मायावादी संन्यासीका वेश धारण करना छद्मवेशी गुप्तचरके समान है। गुप्तचर जैसे चोर और अपराधीके वेशमें उनके दलमें मिलकर उनका उद्धार करते हैं अथवा जैसे कभी चिकित्सकका वेश धारणकर उनके जैसे बाह्य क्रियामुद्रा प्रदर्शित करते हैं, परन्तु वह आत्यन्तिक सत्य नहीं, केवल अभिनय मात्र है। उसी प्रकार महाप्रभुने भी व्यवहारिक विचार पालनका अभिनय प्रदर्शित किया॥४५-४६॥ श्रीसनातनको शिक्षा :- सनातन गोसाञि आसि' ताँहाइ मिलिला। ताँर शिक्षा लागि' प्रभु दु-मास रहिला ॥ ४७ ॥ ताँरे शिखाइल सब वैष्णवेर धर्म। श्रीभागवत-आदि शास्त्रेर यत गूढ़ मर्म ॥ ४८ ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी काशीमें श्रीमन्महाप्रभुसे मिले और महाप्रभु उनको शिक्षा देनेके ३९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/४७-५६ ] लिये वहाँ दो मास तक रहे। श्रीमन्महाप्रभुने उनको वैष्णवधर्म और श्रीमद्भागवतादि शास्त्रोंके सभी गूढ़ अर्थोंकी शिक्षा दी॥४७-४८॥ चन्द्रशेखर और तपन मिश्रके द्वारा निवेदन :- इथमध्ये चन्द्रशेखर, मिश्र-तपन। दुःखी हञा प्रभु-पाय कैल निवेदन॥४९॥ “कतेक शुनिब प्रभु, तोमार निन्दन। ना पारि सहिते, एबे छाड़िब जीवन॥५०॥ तोमाके निन्दये यत संन्यासीर गण। शुनिते ना पारि, फाटे हृदय-श्रवण॥”५१॥ अनुवाद—उन दो मासके बीचमें श्रीचन्द्रशेखर और तपन मिश्रने अत्यन्त दुःखी होकर महाप्रभुके चरणोंमें ऐसे निवेदन किया—"हे महाप्रभु! हम आपकी और कितनी निन्दा सुनेंगे, यह हमसे सहन नहीं हो रही है और अब हम अपने प्राण छोड़ देंगे। मायावादी संन्यासी आपकी जो निन्दा करते हैं, हम उसे अधिक सुन नहीं पायेंगे। उसे सुनकर हमारे हृदय और कान फट रहे हैं॥” ४९-५१॥ इहा शुनि रहे प्रभु ईषत् हासिया। सेइकाले एक विप्र मिलिल आसिया॥५२॥ ब्राह्मणकी प्रार्थना :- आसि' निवेदन करे चरणे धरिया। “एक वस्तु मागों, देह प्रसन्न हइया॥५३॥ सकल संन्यासी मुञि कैनु निमन्त्रण। तुमि यदि आइस, पूर्ण हय मोर मन॥५४॥ ना याह संन्यासि-गोष्ठी, इहा आमि जानि। मोरे अनुग्रह कर निमन्त्रण मानि'॥” ५५॥ अनुवाद—उनकी विनती सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द मुसकाये। उसी समय एक ब्राह्मण वहाँपर आया। उस ब्राह्मणने महाप्रभुके चरण पकड़कर कहा—"हे प्रभु! मैं आपसे एक वस्तु माँगना चाहता हूँ, आप कृपा करके वह मुझे प्रसन्न होकर प्रदान करें। मैंने सभी संन्यासियोंको निमन्त्रण दिया है, किन्तु यदि आप भी आयेंगे, तभी मेरे मनकी अभिलाषा पूर्ण होगी। मैं जानता हूँ कि आप संन्यासियोंकी गोष्ठीमें नहीं जाते हैं, किन्तु मेरे प्रति अनुग्रहकर आप मेरे निमन्त्रणको स्वीकार कीजिये ॥” ५२-५५॥ महाप्रभुका निमन्त्रण-ग्रहण :- प्रभु हासि' निमन्त्रण कैल अङ्गीकार। संन्यासीरे कृपा लागि' ए भङ्गी ताँहार॥५६॥ अनुवाद—महाप्रभुने हँसकर उस ब्राह्मणके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया। मायावादी संन्यासियोंपर कृपा करनेके लिये महाप्रभुकी यह एक लीला है॥५६॥ सातवाँ अध्याय | ३९५

[ ७/५७-६१ से विप्र जानेन, प्रभु ना या'न का'र घरे। ताँहार प्रेरणाय ताँरे अत्याग्रह करे॥ ५७॥ अनुवाद—ऐसे किसीके घर जहाँ मायावादी संन्यासियोंको निमन्त्रण दिया हो, महाप्रभु वहाँ नहीं जाते हैं—यह बात वह ब्राह्मण भली-भाँति जानता था, किन्तु स्वयं महाप्रभुकी प्रेरणासे ही उसने उनको अति आग्रहके साथ निमन्त्रण दिया॥ ५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तथापि महाप्रभुने संन्यासियोंपर कृपा करनेके लिये ही उस ब्राह्मणके हृदयमें प्रेरणा दी, जिसके कारण उसने अत्यन्त आग्रहके साथ उस प्रकार प्रार्थना की॥ ५७॥ संन्यासी मण्डलीके बीच महाप्रभुका गमन :— आर दिने गेला प्रभु से विप्र-भवने। देखिलेन, बसियाछेन संन्यासीर-गणे॥ ५८॥ महाप्रभुकी दीनता :— सबा नमस्करि' गेला पाद-प्रक्षालने। पाद-प्रक्षालिया बसिला सेइ स्थाने॥ ५९॥ अनुवाद—दूसरे दिन महाप्रभु उस ब्राह्मणके घर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सभी संन्यासी पहलेसे ही उपस्थित हैं। महाप्रभु उन सभीको प्रणामकर अपने चरण धोनेके लिये गये और चरण धोकर उसी स्थानपर बैठ गये॥ ५८-५९॥ महाप्रभुका ऐश्वर्य-प्रकाश और पाषण्ड-मोहन :— बसिया करिला किछु ऐश्वर्य प्रकाश। महातेजोमय वपु कोटिसूर्याभास॥ ६०॥ प्रभावे आकर्षिल सब संन्यासीर मन। उठिला संन्यासी सब छाड़िया आसन॥ ६१॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस स्थानपर बैठकर अपने ऐश्वर्यका कुछ प्रकाश किया। उनके शरीरसे इतना तेज निकला जो करोड़ों सूर्योंकी भाँति था। उनके प्रभावको देखकर वहाँ उपस्थित सभी मायावादी संन्यासियोंका मन उनके प्रति आकर्षित हो गया और वे सभी अपना-अपना आसन छोड़कर खड़े हो गये॥ ६०-६१॥ अमृतानुकणिका—विद्याके गर्वसे, साधनके गर्वसे, मान-सम्मानके गर्वसे संन्यासियोंका चित्त कुछ अधिक गर्वित था, इसलिये वे महाप्रभुकी निन्दा करते थे। कुछ ऐश्वर्य प्रकाश करनेके अतिरिक्त केवल दैन्य-विनयसे ऐसा लगता है कि किसीके गर्वका नाश नहीं होता है। किसीके गर्वको नाश करनेके लिये उसके चित्तमें उसके अपने सम्बन्धमें कुछ हेयताका अनुभव जगाना आवश्यक है। इसलिये ही महाप्रभुने अपना ऐश्वर्य प्रकाश किया। उनके ऐश्वर्यको देखकर संन्यासी स्तम्भित हो गये। पहले जो मनमें सोचते थे—'यह एक मूर्ख भावुक संन्यासी मात्र है, शास्त्र, धर्म, आचार, वेदान्तादि जानता नहीं है; यह तो नितान्त साधारण व्यक्ति है।' किन्तु उनका ऐश्वर्य देखकर अब वे सोचने लगे—'ये तो साधारण व्यक्ति नहीं है। अहो! कैसा तेज है, हमारे नेत्र चौंधिया रहे हैं। इनकी निन्दा करके हमने कितना अन्याय किया है? ऐसी शक्ति ३९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/६०-६६ ] तो हमारे पास नहीं है।' तभी उनका हृदय परिवर्त्तन हो गया। यदि महाप्रभु पहलेके समान दैन्य-विनय मात्र दिखलाते, तो वे संन्यासी यही सोचते-'यह मूर्ख संन्यासी हमारी सभामें आनेका साहस ही नहीं कर पाता है। वास्तवमें हमारी सभामें आनेकी योग्यता भी इसमें नहीं है।' गर्वित लोग विनयसे मुग्ध नहीं होते। महाप्रभु जब दैन्यवशतः चरण धोनेके स्थानपर बैठे, तब उनकी महिमा संन्यासियोंके हृदयको स्पर्श नहीं कर पा रही थी, तब वे अपनी सभामें उनको आमन्त्रित नहीं कर रहे थे। किन्तु जब उनका ऐश्वर्य देखा, तब श्रद्धासे सभी एक साथ आसन छोड़कर उठ खड़े हुए॥६०-६१॥ प्रकाशानन्द-सरस्वतीकी उक्ति :- प्रकाशानन्द-नामे संन्यासी-प्रधान। प्रभुके कहिल किछु करिया सम्मान॥६२॥ “इहाँ आइस, गोसाई, शुनह श्रीपाद। अपवित्र स्थाने बैस, किवा अवसाद॥”६३॥ अनुवाद-उन मायावादी संन्यासियोंमें प्रधान प्रकाशानन्द सरस्वती महाप्रभुको सम्मानपूर्वक कुछ कहने लगे-“हे गोसाईं! आप यहाँ आइये। सुनिये श्रीपाद! आप ऐसे अपवित्र स्थानमें क्यों बैठे हैं? क्या हमसे कोई अप्रसन्नता है?”॥६२-६३॥ महाप्रभुकी दैन्योक्ति :- प्रभु कहे,-“आमि हइ हीन-सम्प्रदाय। तोमा-सबार सम्प्रदाये बसिते ना युयाय॥”६४॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा-“मैं हीन-सम्प्रदायका हूँ, इसलिये मैं आपके सम्प्रदायमें बैठनेके योग्य नहीं हूँ॥”६४॥ अनुभाष्य-श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित दशनामी दण्डि (एकदण्डी) संन्यासियोंमें से 'तीर्थ', 'आश्रम' और 'सरस्वती', ये तीन सम्प्रदाय सदाचार और सम्मानमें भी दूसरे साम्प्रदायिक संन्यासियोंसे श्रेष्ठ हैं। महाप्रभुने 'भारती'-सम्प्रदायसे संन्यास ग्रहण करनेके कारण प्रकाशानन्द सरस्वतीको उच्चसम्प्रदायमें स्थित मानकर विचार किया; अथवा ब्रह्मसंन्यासियोंकी सामाजिक-मर्यादामें वे अपने आपको उच्च मानते हैं। इसलिये महाप्रभुने वैष्णव संन्यासियोंको अमानित्व (अपने लिये सम्मानकी आशा नहीं) और मानदत्व (सभीको सम्मान देना), इस धर्मको सिखलानेके लिये उन्होंने स्वयंको हीन-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त कहा। शाङ्कर-साम्प्रदायिक संन्यासीगण अभी भी अन्य संन्यासियोंको 'संन्यासी' कहना नहीं चाहते, उन्हें केवल 'ब्रह्मचारी' संज्ञा देकर स्वयंमें 'गुरु' अभिमान रखते हैं॥६४॥ प्रकाशानन्दकी जिज्ञासा :- आपने प्रकाशानन्द हातेते धरिया। बसाइला सभामध्ये सम्मान करिया॥६५॥ पूँछिल,-“तोमार नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य'। केशव-भारतीर शिष्य, ताते तुम धन्य॥६६॥ सातवाँ अध्याय | ३९७

[ ७/६५-७० साम्प्रदायिक संन्यासी तुमि, रह एइ ग्रामे। कि कारणे आमा-सबार ना कर दर्शने॥ ६७॥ संन्यासी हइया कर नर्त्तन-गायन। भावुक सब सङ्गे लञा करह कीर्त्तन॥ ६८॥ वेदान्त-पठन, ध्यान, — संन्यासीर धर्म। ताहा छाड़ि' कर केने भावुकेर कर्म॥ ६९॥ प्रभावे देखिये तोमा साक्षात् नारायण। हीनाचार कर केने, इथे कि कारण॥” ७०॥ अनुवाद-यह सुनकर स्वयं प्रकाशानन्द महाप्रभुका हाथ पकड़कर सम्मानपूर्वक उन्हें सभाके बीच लाये और सम्मानपूर्वक उन्हें वहाँ बैठाया और उन्होंने पूछा- “तुम्हारा नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' है और केशव-भारतीके शिष्य हो, तुम धन्य हो। तुम हमारे शाङ्कर-सम्प्रदायके संन्यासी हो और इस वाराणसीमें रह रहे हो। किस कारणसे हमसे मिलते भी नहीं हो? तुम संन्यासी होकर नाचते-गाते हो और भावुकोंको साथमें लेकर सङ्कीर्तन करते हो। संन्यासीका धर्म वेदान्त-पठन और ध्यान है। इसे छोड़कर तुम यह भावुकका कार्य क्यों करते हो? तुम्हारा प्रभाव देखकर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तुम साक्षात् नारायण हो, किन्तु तुम ऐसा अनुचित हीन-आचरण क्यों कर रहे हो? इसका क्या कारण है?॥” ६५-७०॥ अनुभाष्य-केशव-भारतीके विषयमें जाननेके लिये वैष्णवमञ्जुषा-समाहृति (दूसरी संख्या) द्रष्टव्य है। आदिलीला ७/४१ संख्याका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ ६६-६९॥ अमृतानुक्रमणिका - महाप्रभुने श्रीशङ्करसम्प्रदायके श्रीकेशव भारतीसे संन्यास तो ग्रहण किया, परन्तु श्रीशङ्कराचार्यके मतको ग्रहण नहीं किया। महाप्रभु संन्यासके बाद प्रेममें आविष्ट होकर वृन्दावनकी ओर जाने लगे, परन्तु आवेशमें भागवतीय त्रिदण्डी भिक्षुकका गीत गाते-गाते राढ़देशमें भ्रमण करते रहे- “एतां समास्थाय परात्मनिष्ठामुपासितां पूर्वतमैर्महद्भिः। अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥” “प्राचीनकालमें महत् लोगों द्वारा उपासित इस परात्म-निष्ठारूप भिक्षुक-आश्रमका आश्रय करके मैं श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा इस दुस्तर संसाररूप तमः (अज्ञान) से तर जाऊँगा।” महाप्रभुके इस उपरोक्त वाक्यसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उन्होंने भागवतीय वैष्णव त्रिदण्डी भिक्षुकका वेश ग्रहण किया था। शङ्कराचार्यके मतमें संन्यास-जिसमें सेव्य-सेवकका भाव तिरोहित होता है, अपनेको ब्रह्म कल्पना करते हैं, उस प्रकारका संन्यास महाप्रभुका उद्देश्य नहीं था। यदि उनका वैसा उद्देश्य होता, तो उन्होंने काशी जाकर मायावादी-संन्यासियोंसे सम्भाषण क्यों नहीं किया? उनका मुखतक दर्शन क्यों नहीं किया? श्रीशङ्कराचार्य-मतवादीय संन्यासियोंके कृत्य मायावाद-भाष्य पठन-पाठन, ध्यान-धारणा आदिका त्यागकर 'भावुकके कर्म', 'नृत्य-गीत' आदि कृत्य क्यों आरम्भ किये? और वे मायावादी संन्यासियोंकी भाँति परस्पर सम्भाषणमें 'नमो नारायणाय' ना कहकर क्यों 'कृष्णे मतिरस्तु'-वैष्णव-संन्यासके जैसे ३९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत