भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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वैखानसा वालिखिल्यौडुम्बराः फेनपा वने। न्यासे कुटीचकः पूर्वं बह्दोदो हंसनिष्क्रियौ॥" अर्थात् “चार प्रकारके ब्रह्मचर्य- (१) सावित्र्य (उपनयनसे आरम्भ करके गायत्री-अध्ययनकारीका तीन रातके लिये ब्रह्मचर्य व्रत), (२) प्राजापत्य (उपनयनसे लेकर एक वर्ष तक व्रतपालनकारीका ब्रह्मचर्य व्रत), (३) ब्राह्म (उपनयनसे लेकर तीन वेदोंको ग्रहण करनेके समय तक ब्रह्मचर्य व्रत), (४) बृहत् (उपनयनसे लेकर मृत्यु पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत)। इनमेंसे प्रथम तीनोंको 'उपकुर्वाण' और चौथेको 'नैष्ठिक' नामसे जाना जाता है। चार प्रकारके गृहस्थ- (१) वार्त्ता (शास्त्र अनुमोदित कृषि आदि वृत्ति), (२) सञ्चय (याजनादि वृत्ति), (३) शालीन (किसीसे कुछ ना माँगकर जीवन निर्वाह करनेकी वृत्ति), (४) शिलोञ्छन (स्वतः गिरे हुए अन्नादिको एकत्रितकर जीवन निर्वाह करनेकी वृत्ति)। चार प्रकारके वानप्रस्थ- (१) वैखानस (कन्द-मूलादिके द्वारा जीवन निर्वाहकी वृत्ति), (२) बालिखिल्य (नया अन्न प्राप्त होनेपर पूर्व सञ्चित अन्नको जो त्याग करते हैं), (३) उडुम्बर (शय्या त्यागनेपर जिस दिशाको देखेंगे, उसी दिशासे द्रव्य ग्रहणकर जीवन निर्वाह करनेवाले), (४) फेणप (वृक्षोंसे अपने-आप गिरे हुए फलादिसे जीवन धारण करनेवाले)। चार प्रकारके संन्यासी- (१) कुटीचक (स्वाश्रमधर्म-प्रधान), (२) बहुदक (कर्म त्यागकर ज्ञानाभ्यास प्रधान), (३) हंस (ज्ञानाभ्यास-निष्ठ), (४) निष्क्रिय (तत्त्वकी उपलब्धि किये हुए अर्थात् परमहंस)। चारों प्रकारके संन्यासियोंमें कुटिचकसे बहुदक श्रेष्ठ हैं, इसी प्रकार बहुदकसे हंस और हंससे निष्क्रिय श्रेष्ठ हैं।” संन्यास भी दो प्रकारके हैं-धीर और नरोत्तम; (भाः १/१३/२६-२७)- “गतस्वार्थमिमं देहं विरक्तो मुक्तबन्धनः। अविज्ञातगतिर्जह्यात् स वै धीर उदाहृतः॥ यः स्वकात् परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्। हृदि कृत्वा हरिं गेहात् प्रव्रजेत् स नरोत्तमः॥” अर्थात् “जो विषय आदिमें आसक्तिरहित और अभिमानशून्य होकर ऐहिक (लौकिक) और पारत्रिक (पारलौकिक) सुखसाधनकी कामनासे रहित इस शरीरका दूसरोंके बिना जाने त्याग कर देते हैं, वे ही 'धीर' कहलाते हैं। आत्म-तत्त्वको जाननेवाला जो व्यक्ति अपने विवेकसे ३९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत