श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/३१-३४ ] इससे भाग निकले और समस्त जगत्को प्रेमकी बाढ़में डुबोनेकी मेरी प्रतिज्ञा भङ्ग हो गयी। इसलिये किसी उपायसे उन सभीको प्रेमकी बाढ़में डुबोनेके लिये कुछ अद्भुत लीला करूँगा। तब उन्होंने मनमें कुछ विचार करके संन्यास-आश्रमको अङ्गीकार किया॥ ३१-३३॥ अनुभाष्य-मायातीत भगव त्तामें, भगवद्धाममें, भगवद्भक्तिमें और भक्तोंमें 'माया' है-इस प्रकार भ्रान्तविश्वासी व्यक्ति ही 'मायावादी' हैं। उपरोक्त चार तत्त्वोंमें कर्म है और वे फल-भोगके लिये बाध्य हैं, इस प्रकार भ्रान्तविश्वासी व्यक्ति ही 'कर्मनिष्ठ' हैं। इन चार तत्त्वोंमें अज्ञानके कारण तर्कका स्थान है, इस प्रकार भ्रान्त बुद्धिवाले लोग ही 'कुतार्किक' हैं। ये चार तत्त्व निन्दाके योग्य हैं, इस प्रकारकी भ्रान्त बुद्धिवाले व्यक्ति ही 'निन्दक' हैं। इन चार तत्त्वोंके साथ अन्य मायिक वस्तुओंका साम्य है, इस प्रकार भ्रान्त-मतिवाले व्यक्ति ही 'पाषण्डी' हैं। और ये चार तत्त्व दूसरे जड़भोग्य-विषयोंके तुल्य हैं, इस प्रकार भ्रान्त अध्ययनशील व्यक्ति ही 'अधम पड़ुया' हैं। प्रेममय श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रदत्त प्रेम-बाढ़का जल उन सबको किसी भी प्रकारसे स्पर्श ना कर सके, इस उद्देश्यसे भागते हुए देखकर श्रीमन्महाप्रभुने उपरोक्त श्रीकृष्णविमुख चतुर्वर्ग-अभिलाषी जड़प्रकृतिवाले मानवोंके परमश्रद्धेय चतुर्थाश्रम संन्यासको स्वीकार करनेकी इच्छा की। उन्होंने विचार किया कि पूर्वोक्त मायामुग्ध विषयी लोगोंके विश्वासमें चतुर्थाश्रम ही वह उपादेय आदर्श है॥ ३३॥ अमृताणुकणिका-परम औदार्यविग्रह प्रेममय श्रीगौरसुन्दर किसीको भी नहीं छोड़ेंगे, तभी उन्होंने कपट-संन्यासीका वेश धारण किया-स्वयं भगवान् होकर भी भक्तके भावको अङ्गीकार किया। इस बार केवल भक्त ही नहीं, आश्रमीके चिह्न भी धारण किये-मायावादीकी पोशाक भी ली। वनमें हाथियोंको पकड़नेके लिये जैसे अन्य पालतू हाथीकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मत्त-गजतुल्य बहिर्मुख मायावादियोंको आकर्षण करनेके लिये भगवान्ने सिद्धान्तपरायण कपट संन्यासीका वेश धारण किया। इस कपट संन्यासीके वेशमें द्वार-द्वार जाकर प्रेमकी वर्षा की, केवल स्वयं ही नहीं, अपने अभिन्न-विग्रह स्वयं-प्रकाश प्रेमोन्मत्त अवधूतवेशी श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देशमें भेजा। श्रीनित्यानन्द प्रभुने गौड़देशमें प्रेमकी बाढ़ प्रवाहित की॥ ३१-३३॥ चब्बिश वत्सर छिला गृहस्थ-आश्रमे। पञ्चविंशति वर्षे कैल यतिधर्मे ॥ ३४॥ अनुवाद-श्रीमन्महाप्रभु गृहस्थ-आश्रममें चौबीस वर्षतक रहे। पच्चीसवें वर्षके आरम्भमें उन्होंने संन्यास-आश्रममें प्रवेश किया॥ ३४॥ अनुभाष्य-चार प्रकारके आश्रम हैं-ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति (संन्यास)। प्रत्येक आश्रममें चार प्रकारके भेद है। श्रीमद्भागवत (३/१२/४२-४३) श्लोकमें- “सावित्रं प्राजापत्यञ्च ब्राह्मञ्चाथ बृहत्तथा। वार्ता सञ्चयशालीनशिलोञ्छ इति वै गृहे॥ सातवाँ अध्याय | ३८९