श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/२९-३३ श्रीकृष्णप्रेमरससे वञ्चित :- मायावादी, कर्मनिष्ठ कुतार्किकगण। निन्दक, पाषण्डी, यत पड़ुया अधम॥ २९॥ सेइ सब महादक्ष धाञा पलाइल। सेइ वन्या ता-सबारे छुँइते नारिल॥ ३०॥ अनुवाद-अपनी-अपनी वृत्तिमें महादक्ष अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमके विरोधी-मायावादी, सकामकर्मी, कुतार्किक, निन्दक, पाषण्डी और जितने पढ़नेवालोंमें अधम, ये सभी वहाँसे दूर भाग गये, इसलिये उनको यह प्रेमकी बाढ़ स्पर्श नहीं कर पायी अर्थात् वे प्रेमाभक्तिसे वञ्चित रह गये॥ २९-३०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘मायावादी’-प्रकाशानन्दादि संन्यासी मायावादी हैं। वे लोग सभी सद्-विषयोंमें ‘माया’ को लेकर वाद उठाते हैं। ‘ब्रह्म’ को ‘मायासे अतीत’ कहकर ‘ईश्वर’ को ‘मायासङ्गी’ कर देते हैं और ईश्वरके सभी अवतारोंके शरीरको ‘मायिक’ कहते हैं। वे कहते हैं कि जीवके गठनमें मायाका कार्य है अर्थात् जीवकी सभी प्रकारकी अहं-बुद्धि मायासे निर्मित है। इसलिये उनका यह सिद्धान्त है कि जीवके मुक्त होनेपर ‘शुद्धजीव’ नामक और कोई अवस्था नहीं रहती है। अर्थात् मुक्त होनेपर जीव ब्रह्मके साथ एक हो जाता है, वे इस प्रकारकी शिक्षा देते हैं। ‘कर्मनिष्ठ’-देवानन्दादि भक्तिहीन कर्मी लोग। कर्मजड़ स्मार्त्तलोग अर्थात् जो कर्म और कर्मफलको ही जीवका मुख्य उद्देश्य कहते हैं। ‘कुतार्किकगण’-सार्वभौमादि निरीश्वर तार्किक लोग। ‘निन्दक’-जिनको महाप्रभुने अपना दण्ड लेकर ताड़न किया था और गोपाल-चापालादि प्रभु और प्रभुके भक्तोंके निन्दक लोग। ‘पाषण्डी’-भगवान्के साथ अन्य-अन्य देवताओंकी समता-व्याख्या करनेवाले। ‘अधम पड़ुआ’-वे सभी पढ़े-लिखे लोग जो विद्याको तर्कका कारण मानते हैं और विद्या ईश्वर-प्राप्तिका उपाय है, यह नहीं जानते॥ २९॥ अहैतुकी-कृपासिन्धुके द्वारा उन सबके उद्धारकी चिन्ता :- ताहा देखि' महाप्रभु करेन चिन्तन। जगत् डुबाइते आमि करिलूँ यतन॥ ३१॥ केह केह एड़ाइल, प्रतिज्ञा हइल भङ्ग। ता-सबा डुबाइते पातिब किछु रङ्ग॥ ३२॥ पतित वञ्चित जीवोंके उद्धारके लिये संन्यास-ग्रहण :- एत बलि' मने किछु कोरिया विचार। संन्यास-आश्रम प्रभु कैला अङ्गीकार॥ ३३॥ अनुवाद-यह देखकर अर्थात् मायावादी, कर्मियों आदिको भागते हुए देखकर महाप्रभु चिन्ता करने लगे कि मैंने जगत्को प्रेमकी बाढ़में डुबोनेके लिये इतना यत्न किया, किन्तु कोई-कोई ३८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत