भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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७/२५-२८ ] साधुको भी डुबोती है, और जगाइ-मधाइ जैसे वैष्णवापराध-शून्य दुर्जनोंको भी खींचकर अपनेमें समा लेती है॥ २५-२६॥ श्रीकृष्णप्रीतिरसमें डूबनेके कारण जीवोंके कर्मबीजका नाश :- जगत् डुबिल, जीवेर हइल बीज नाश। ताहा देखि' पाँचजनेर परम उल्लास॥ २७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रेम-भण्डारका द्वार खुल गया और प्रेम-रसकी बाढ़ने प्रबलवेगसे समस्त जगत्को डुबो दिया। उससे बद्धजीवोंकी श्रीकृष्णदास्य-विस्मृतिरूप अविद्या-बन्धन-बीज नष्ट हो गया। इसे देखकर पञ्चतत्त्वको परम उल्लास हुआ॥ २६-२७॥ अनुभाष्य-भगवान्की तटस्था नामक जीवशक्तिमें श्रीकृष्णोन्मुखी चेष्टाके साथ-साथ श्रीकृष्ण-विमुखतारूप भोगवासनाका बीज भी अव्यक्त रूपसे रहता है। संसार-वृक्षसे उत्पन्न वासना-बीज कालके प्रवाहसे सिञ्चित होकर नानाप्रकार भोगबन्धनोंके द्वारा बद्धजीवको दिन-रात त्रितापोंसे जला रहा है। जिस प्रकार मिट्टीमें लगाया बीज जलमग्न होनेपर उससे अङ्कुर निकलनेकी सम्भावना नहीं रहती, उसी प्रकार भगवत्सेवा-समुद्रकी अथाह जलराशिमें श्रीकृष्णसेवासे इतर भोगवासनाका बीज प्रेमकी बाढ़में डूबकर नष्ट हो गया और उससे और वासनारूपी अङ्कुर निकलनेकी सम्भावना नहीं रही। श्रीचैतन्यचन्द्रका पञ्चतत्त्वरूपमें अवतीर्ण होनेका उद्देश्य सफल हुआ देखकर सभी उल्लसित हुए। श्रीमद् प्रबोधानन्द सरस्वती त्रिदण्डिपादने ‘श्रीचैतन्यचन्द्रामृत’ ग्रन्थमें उसका इस प्रकार वर्णन किया है— “स्त्री-पुत्रादि-कथां जहुर्विषयिनः शास्त्रप्रवादं बुधा, योगीन्द्रा विजहुर्मरुन्नियमज-क्लेशं तपस्तापसाः। ज्ञानाभ्यासविधिं जहुश्च यतयश्चैतन्यचन्द्रे परामाविष्कुर्वति भक्तियोगपदवीं नैवान्य आसीद्रसः॥” अर्थात् “जबसे श्रीचैतन्यचन्द्रने शुद्धा प्रेमाभक्तिके पथको प्रकाशित किया है, तबसे विषयी लोगोंने अपनी स्त्री-पुत्रादिकी बातें करना बन्द कर दिया है, विद्वानोंने शास्त्रोंका वाद-विवाद बन्द कर दिया है, योगियोंने प्राणायामके द्वारा श्वासको नियन्त्रित करनेके कष्टका परित्याग कर दिया है, तपस्वियोंने कठोर तपस्याका त्याग कर दिया है, ज्ञान-मार्गावलम्बियोंने निर्विशेष ब्रह्ममें लीन होनेके दुश्विचारका त्याग कर दिया है। अब केवल सर्वत्र श्रीकृष्णप्रेमका ही माधुर्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी रसमय (मधुर) नहीं है।”॥ २७॥ प्रेमवर्षणके कारण प्रेमरसकी वृद्धि :— यत यत प्रेमवृष्टि करे पञ्चजन। तत तत बाड़े जल, व्यापे त्रिभुवन॥ २८॥ अनुवाद-इन पञ्चतत्त्वोंने मिलकर जितनी प्रेमकी वर्षा की, उतना ही (प्रेमरूपी) जल बढ़ता गया और उसने त्रिभुवनको व्याप्त कर लिया॥ २८॥ सातवाँ अध्याय | ३८७