भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 428

[ ७/२३-२६ प्रेम-वितरणके फलसे हासके बदले वृद्धि :- लुटिया, खाइया, दिया, भाण्डार उजाड़े। आश्चर्य भाण्डार, प्रेम शतगुन बाड़े॥ २४॥ अनुवाद—उस प्रेमको वितरण करनेमें उन्होंने योग्य-अयोग्य पात्र अथवा उचित-अनुचित स्थानका भी विचार नहीं किया अर्थात् उन्हें जहाँ जो भी मिला, उसे प्रेमका मुक्त हस्तसे दान किया। इस प्रेमके भण्डारको श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा उनके पार्षदोंने लूटा और लुटाया, खाया और सभीको खिलाया तथा वितरण करके भण्डारको उजाड़ दिया। किन्तु आश्चर्यकी बात यह है कि वह भण्डार खाली होनेके बदले सैकड़ों गुणा बढ़ गया॥ २३-२४॥ प्रेमकी बाढ़में जगत् मग्न :- उछलिल प्रेमवन्या, चौदिके बेड़ाय। स्त्री, वृद्ध, बालक, युवा, सकलि डुबाय॥ २५॥ सज्जन, दुर्जन, पङ्गु, जड़, अन्धगण। प्रेमवन्याय डुबाइल जगतेर जन॥ २६॥ अनुवाद—उस प्रेमकी बाढ़ उछलकर चारों ओर फैल गयी। उस प्रेमबाढ़में स्त्री, बूढ़े, बालक, युवा, सज्जन, दुर्जन, पङ्गु, जड़, अन्धे—जगत्के सभी लोग डूब गये॥ २५-२६॥ अमृतानुकणिका—जब गङ्गामें बाढ़ आती है, तब उसका जल तटप्रदेशका अतिक्रम करके, पक्के ऊँचे बाँधकी भी उपेक्षा करके दूर-दूर तक फैलकर अगम्य स्थानपर भी भूमिको जलमग्न कर देता है। परन्तु बाढ़ कब आयेगी, इसे कोई नहीं जानता। तभी नाविक भी पूर्व सावधान नहीं हो पाते, वणिक अपनी दुकानसे सामानको किसी सुरक्षित स्थानपर नहीं ले जा पाते। अचानक ही कहींसे बाढ़का जल प्रबल वेगसे आकर नौकाको डुबो देता है, वणिकके सामानको बहाकर ले जाता है। केवल यही नहीं, उद्वेलित तरङ्ग सभीको ही अपनेमें डुबो लेती है—महत्के साथ क्षुद्रकी युद्धमें कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, इसलिये सभी अपने प्रयास छोड़कर महत्के शरणागत हो जाते हैं। जो केवल बाढ़के भयसे बहुत पूर्व ही किसी अति उच्च स्थानपर जाकर वास करते हैं अथवा नदीसे बहुत दूर किसी मरुभूमि सदृश स्थानपर जाकर वास करते हैं, उन्हें बाढ़का जल स्पर्श नहीं करता। मर्त्य-जगत्की बाढ़की हेयता है—वह बड़े-बड़े पुलोंको नहीं तोड़ पाती है; प्रेम-बाढ़में हेयता नहीं है। प्रेम-बाढ़ बहुत शक्तिशाली पुलोंको भी तोड़ देती है, किन्तु उसके कारण जीव मरते नहीं, अपितु अमर हो जाते हैं। अमर होकर नित्यानन्द-निकेतनमें आनन्दमयके नवनवायमान सेवानन्दमें, प्रेमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं। केवल वे ही मरते हैं जो इस प्रेम-बाढ़के भयसे वृक्षके ऊपर चढ़कर निज बलसे आत्मरक्षा करना चाहते हैं अर्थात् जो इस प्रेम-बाढ़से बचना चाहते हैं, वे इसी मृत्युलोकमें पुनः-पुनः जन्म लेकर मृत्युको प्राप्त होते हैं। प्रेम तरल-निर्मल-स्वच्छ होनेपर भी गाढ़ा है। कर्मकी हेयता, ज्ञानकी कठोरता प्रेममें नहीं है। प्रेम अप्राकृत सरल सहज वस्तु है। यह निर्मल कृष्णप्रेम-बाढ़ सभीको डुबो लेती है—यह स्त्री-पुरुषका विचार नहीं करती, बालक-युवाको देखकर अपेक्षा नहीं करती। यह प्रेमकी बाढ़ ३८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत