भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 427

श्रीराधाकुण्डमें अप्राकृत रूपमें निवास करता हुआ श्रीकृष्णका आठों याम भजन नहीं करेगा? अपितु करेगा ही।” पञ्चतत्त्वके दो तत्त्व—शक्ति और तीन तत्त्व—शक्तिमान् हैं। शुद्धभक्त और अन्तरङ्गभक्त—ये ही दो प्रकारकी शक्तियाँ हैं। जो लोग अन्याभिलाषिताशून्य होकर अपनी शुद्धा श्रीकृष्णानुशीलन-वृत्तिको कर्म या ज्ञानके आवरणसे आवृत नहीं करते हैं, वे लोग शुद्धभक्त हैं। केवल मधुररसाश्रित ऐकान्तिक भक्तगण ही अन्तरङ्गभक्त हैं। मधुर-रसमें वात्सल्य, सख्य और दास्य अन्तर्भुक्त हैं। शुद्धभक्त-विशेष ही अन्तरङ्ग भक्त हैं॥ १६-१७॥ चारों तत्त्वोंको लेकर महाप्रभुका विहार, प्रचार, आस्वादन और दान :- याँ-सबा लञा प्रभुर नित्य विहार। याँ-सबा लञा प्रभुर कीर्त्तन-प्रचार॥ १८॥ याँ-सबा लञा करेन प्रेम-आस्वादन। याँ-सबा लञा दान करे प्रेमधन॥ १९॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१९॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु—अपने प्रकाश, अपने पुरुषावतारके अवतार, अन्तरङ्गभक्त और शुद्धभक्त—सबको लेकर ही स्वयं प्रेम-आस्वादनरूप नित्य विहार और जगत्में कीर्त्तन-प्रचाररूप प्रेम दान करते हैं॥१९॥ पञ्चतत्त्वोंका मिलकर श्रीकृष्णप्रेम-रसका नित्य आस्वादन और वितरण :- सेई पञ्चतत्त्व मिलि' पृथिवी आसिया। पूर्व-प्रेमभाण्डारेर मुद्रा उघाड़िया॥ २०॥ पाँचे मिलि' लूटे प्रेम, करे आस्वादन। यत यत पिये, तृष्णा बाड़े अनुक्षण॥ २१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य॥ २०-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णका चरित्र ही प्रेमका भण्डार है। वह भण्डार इस जगत्में आया तो था, किन्तु उसका द्वार बन्द था और उसमें ताला लगा हुआ था। श्रीचैतन्यावतारके पञ्चतत्त्वने मिलकर उस तालेको तोड़ दिया। तब उन्होंने द्वार खोलकर उस भण्डारको लूटपाट करते हुए उस प्रेमका आस्वादन किया। उन्होंने जितना उस प्रेमका पान किया, उतनी ही उनकी तृष्णा प्रतिक्षण बढ़ने लगी॥२१॥ पुनः पुनः पियाइया हय महामत्त। नाचे, कान्दे, हासे, गाय, यैछे मदमत्त॥ २२॥ अनुवाद—बार-बार उस प्रेमको पीकर वे मत्त हो गये और मदमत्तकी भाँति नाचने, रोने, हँसने तथा [श्रीकृष्ण नाम-रूप-लीलादिका] गान करने लगे॥२२॥ श्रीकृष्णप्रेम-वितरणमें पात्रापात्रके विचारका अभाव :- पात्रापात्र विचार नाहि, नाहि स्थानास्थान। येई याँहा पाय, ताँहा करे प्रेमदान॥ २३॥