श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/३४-३८ ] या दूसरेके समझानेपर वैराग्यवान होकर अपने हृदयमें श्रीहरिको धारणकर संन्यासके लिये घरसे निकल जाता है, वही 'नरोत्तम' अर्थात् उत्तम मनुष्य है।" श्रीमन्महाप्रभुने १४३२ शकाब्द माघमासके शुक्लपक्षमें कटवामें श्रीशङ्करसम्प्रदायके दक्षिणभारतके शृङ्गेरीमठके अधीन श्रीकेशवभारती दण्डिस्वामीसे संन्यास ग्रहण किया॥ ३४॥ पड़ुया, पाषण्डी, तार्किक-निन्दकादि वञ्चित गुटोंका उद्धार :- संन्यास करिया प्रभु कैला आकर्षण। यतेक पालाञाछिल तार्किकादिगण॥ ३५॥ पड़ुया, पाषण्डी, कर्मी, निन्दकादि यत। तारा आसि' प्रभु-पाय हय अवनत॥ ३६॥ अनुवाद - तार्किकादि जितने लोग भाग गये थे, महाप्रभुने संन्यास ग्रहण करके उन सबका आकर्षण किया। पड़ुया, पाषण्डी, कर्मी, निन्दकादि जितने लोग थे, वे सभी आकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंमें नतमस्तक हुए॥ ३५-३६॥ अनुभाष्य - आदिलीला ७/३३ संख्याके अनुभाष्यका शेष अंश द्रष्टव्य है॥ ३६॥ उनका अपराध-मोचन और भक्तिलाभ :- अपराध क्षमाइल, डुबिल प्रेमजले। केबा एड़ाइबे प्रभुर प्रेम-महाजाले॥ ३७॥ सभी जीवोंके उद्धारके लिये उपायका आविष्कार :- सबा निस्तारिते प्रभु कृपा-अवतार। सबा निस्तारिते करे चातुरी अपार॥ ३८॥ अनुवाद - श्रीमन्महाप्रभुने सबके अपराधोंको क्षमा करके प्रेमजलमें डुबो दिया, क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो महाप्रभुके इस प्रेमरूपी महाजालसे निकलकर चला जाय। सभी जगत्वासियोंका उद्धार करनेके लिये श्रीचैतन्य महाप्रभु कृपापूर्वक आविर्भूत हुए थे, इसलिये सभीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने ऐसी चतुरायी दिखलायी॥ ३७-३८॥ अमृतानुकणिका - महाप्रभुकी अचिन्त्य महाशक्तिसे अनेक लोगोंके अपराधादि जनित चित्तके कल्मष महाप्रभुके मुखसे हरिनाम सुनने मात्र अथवा महाप्रभुके दर्शन मात्रसे दूर हो गये और उसी समय ही वे श्रीकृष्ण प्रेम प्राप्त करके कृतार्थ हो गये। परन्तु अधम पड़ुआ, पाषण्डियों आदिके प्रति महाप्रभुने उस शक्तिका प्रकाश नहीं किया, क्योंकि उन्होंने अपनी प्रकटलीलाके बादके समयमें जीवोंके मङ्गलके निमित्त उन्होंने पड़ुआ, पाषण्डी, चापाल-गोपाल आदि लोगोंके अपराध मोचनके लिये विशेष अवस्थाका अवलम्बन किया। महाप्रभुने दृष्टिमात्रसे ही जीवोंको कृतार्थ किया, उनमेंसे किसी-किसीके हृदयमें प्रेम प्राप्तिके प्रतिकूल अपराध था, यह जाननेका कोई उपाय नहीं है। चापाल-गोपाल, पड़ुआ, पाषण्डी आदि लोग अपराधी थे, इस बातको सब लोग जानते थे। उनके अपराध मोचनके लिये विशेष व्यवस्थाका अवलम्बन ना कर, केवल दृष्टि आदिके द्वारा ही यदि उनको प्रेम दान करके प्रभु कृतार्थ करते, तब परवर्तीकालके लोगोंके मनमें यह भाव होता कि प्रेम प्राप्तिके विषयमें अपराध कोई बड़ी बाधा नहीं है। यह सातवाँ अध्याय | ३९१