भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 434

[ ७/३७-३९ अपराध प्रेम प्राप्तिमें गुरुतर बाधा है—ऐसा मानकर आने वाले समयमें लोग अपराधको दूर करनेके लिये सचेष्ट रहेंगे, इसलिये महाप्रभुने उनको प्रेम नहीं दिया। दूसरोंकी बात तो दूर रहे, शचीमाताको उपलक्ष्य करके भी महाप्रभुने अपराधके गुरुत्वकी जीवोंको शिक्षा दी है। उन्होंने पड़ुया, पाषण्डी, निन्दकादिके अपराध ग्रहण नहीं किये और कर भी नहीं सकते, क्योंकि उनका उद्देश्य तो सबको प्रेमदान करना है। यदि वे अपराध ग्रहण करेंगे तो वो किस प्रकारसे प्रेमदान करेंगे? अपितु अपराधीके चित्तकी अवस्था परिवर्त्तन करनेके निमित्त ही वे उत्कण्ठित हो उठे। किसीके भी चित्तका परिवर्तन केवल बाहरसे अन्य किसीके द्वारा साधित नहीं होता। भीतरसे परिवर्तनके निमित्त अपने दोषकी सम्पूर्ण अनुभूति और उसके लिये तीव्र अनुताप एकान्त प्रयोजनीय है। महाप्रभुके अपूर्व त्यागको देखकर अपराधियोंको अपना दोष स्पष्ट रूपसे समझ आ गया और अनुतापसे उनके चित्तकी मलिनता जब सम्पूर्ण रूपसे दग्धीभूत हो गयी, तभी उनके अपराधका बीज नष्ट हुआ तथा तभी चित्तमें प्रेमभक्तिके आविर्भावकी योग्यता प्राप्त की। महाप्रभुके शरणागत होनेके द्वारा उनका अनुताप ही प्रकाशित हुआ है। महाप्रभुने जब देखा कि उनका चित्त प्रेमभक्ति ग्रहण करनेके योग्य हो गया है, तभी उन्होंने उनको प्रेमभक्ति प्रदान की ॥ ३७-३८ ॥ काशीके मायावादियोंके अतिरिक्त सभी मनुष्योंका उद्धार :- तबे निज भक्त कैल यत म्लेच्छ आदि। सबे एड़ाइल मात्र काशीर मायावादी ॥ ३९ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ३९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करने मात्रसे ही कुतार्किक, कर्मनिष्ठ, निन्दक, पाषण्डी और अधम पड़ुया लोगोंने धीरे-धीरे उनका चरणाश्रय ग्रहण किया तथा अनेक म्लेच्छ लोगोंने भी उनका आनुगत्य स्वीकार किया। केवल वाराणसीके मायावादी लोग उस प्रेमबाढ़से दूर रह गये थे ॥ ३९ ॥ अनुभाष्य—'काशीके मायावादी'—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञानको ही सत्य माननेवाले व्यक्ति इन्द्रियोंके द्वारा जो जगत् दर्शन करते हैं, उसे इन्द्रियज्ञानके द्वारा माप लिये जानेके कारण 'माया-रचित' कहते हैं। 'तत्त्ववस्तु मायातीत होनेपर भी उसमें नित्य चित्-वैचित्र्य अथवा चिद्विलास नहीं है, यह केवल चिन्मात्र है'—इस प्रकारके विचारोंमें निपुण व्यक्ति ही “काशीके मायावादी" हैं। 'सारनाथके मायावादी' या 'बोधगयाके मायावादी' ब्रह्मकी मायाको स्वीकार नहीं करते हैं। उनके विचारसे अचिन्मात्रवाद ही सिद्ध है। 'काशीके मायावादी' और उनके अतिरिक्त दूसरे स्थानोंके मायावादी,—सभी प्रकृतिवादी हैं—वे लोग कोई भी 'ब्रह्म अथवा तत्त्ववादी' नहीं हैं। काशीके मायावादीगण स्वयंको ब्रह्मवादी कहनेपर भी ब्रह्मप्रकृतिका वैशिष्ट्य स्वीकार नहीं करते। समन्वयवादसूत्रसे ब्रह्म और मायाको अभिन्नरूपसे जानते हैं। मायावादीगण भक्ति-योगमायाका सन्धान ना रखनेके कारण अभक्त अथवा श्रीकृष्णभक्ति-विमुख हैं। मायावादियोंका हृद्गत अनुभाव यह है कि 'नित्या भक्तिकी सभी कथाएँ, भजनीय वस्तु और भक्त—ये सभी उनके इन्द्रियजात ज्ञानके अधीन हैं, किन्तु वस्तुतः वास्तव-सत्य-विचारसे इन सभी कथाओंका कोई मूल्य नहीं है।' मायावादीगण परस्पर जितने भी कुतर्क अथवा विवाद क्यों ना करें, वास्तव ३९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत