भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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७/३९-४५ ] सत्यके निकट अभिगमन ना करनेपर तत्त्ववस्तु और उसका चित्-वैचित्र्य उनके काल्पनिक विचारके अधीन नहीं होता है॥३९॥ वृन्दावन याइते प्रभु रहिला काशीते। मायावादिगण ताँरे लागिला निन्दिते॥४०॥ अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावन जाते समय काशीमें कुछ दिन रहे। उस समय मायावादी लोग उनकी निन्दा करने लगे॥४०॥ मायावादियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा :— संन्यासी हइया करेन गायन, नाचन। ना करे वेदान्त-श्रवण, करे सङ्कीर्त्तन॥४१॥ अनुवाद—वे कहने लगे कि देखो यह संन्यासी होकर भी वेदान्त श्रवण ना करके नाचता, गाता और सङ्कीर्तन करता है॥४१॥ अनुभाष्य—“संन्यासी तौर्यत्रिक अर्थात् ‘गान’, ‘नर्तन’ तथा ‘वादन’-कार्य परित्याग करेंगे एवं सर्वदा वेदान्तानुशीलन करेंगे”—इस स्मृतिशास्त्रीय विधिके अनुकूलसे, महाप्रभुको शाङ्कर-मायावाद श्रवण ना करते हुए देखकर अपितु श्रीकृष्णकीर्त्तनमें मत्त होकर प्रेमसे नृत्य करते हुए देखकर काशीके संन्यासी उनको संन्यास-धर्ममें अनभिज्ञ सोचने लगे। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा कथित “वेदान्त वाक्येषु सदा रमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः” अर्थात् “जो कौपीन धारण करके वेदान्तके वाक्योंमें सदा रमण करते हैं, वे निश्चय ही भाग्यवान् हैं”—इस लक्षणको ना देखकर मायावादी संन्यासी और गृहस्थ महाप्रभुकी निन्दा करने लगे। काशीके मायावादी संन्यासियोंके उद्धार प्रसङ्गके सम्बन्धमें, मध्यलीला, २५/५-१६९ संख्या विशेषरूपसे द्रष्टव्य है॥४१॥ मूर्ख संन्यासी निज-धर्म नाहि जाने। भावुक हइया फेरे भावुकेर सने॥४२॥ एसब शुनिया प्रभु हासे मने मने। उपेक्षा करिया कारो ना कैल सम्भाषणे॥४३॥ महाप्रभुके द्वारा उनकी उपेक्षा और मथुरा गमन :— उपेक्षा करिया कैल मथुरा गमन। मथुरा देखिया पुनः कैल आगमन॥४४॥ अनुवाद—‘यह मूर्ख संन्यासी अपना धर्म भी नहीं जानता है। भावुकोंके साथ भावुक बनकर घूमता रहता है’—ये सब बातें सुनकर महाप्रभु मन-ही-मनमें हँसने लगे और उन्होंने उनकी बातका कोई उत्तर ना देकर उनकी उपेक्षा की। महाप्रभु उन मायावादियोंकी उपेक्षा करके मथुरा चले गये और मथुरा दर्शन करनेके बाद वे पुनः काशीमें आये॥४२-४४॥ चन्द्रशेखरके घरमें अवस्थान :— काशीते लेखक शूद्र-श्रीचन्द्रशेखर। ताँर घरे रहिला प्रभु स्वतन्त्र ईश्वर॥४५॥ सातवाँ अध्याय | ३९३