श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/४५-४८ मायावादी संन्यासियोंका त्यागकर तपन मिश्रके घरमें भिक्षा :- तपन-मिश्रेर घरे भिक्षा-निर्वाहण। संन्यासीर सङ्गे नाहि माने निमन्त्रण ॥ ४६ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४५-४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैद्य चन्द्रशेखर शूद्रवर्णके थे। संन्यासियोंका शूद्रवर्णके घरमें रातमें ठहरना उचित नहीं है, किन्तु उनके प्रति कृपा करके महाप्रभु उनके घरमें रहे, क्योंकि वे स्वतन्त्र ईश्वर हैं। ब्राह्मण, शूद्र-सभी उनकी कृपाके समान पात्र हैं। महाप्रभु तपन मिश्रके घरमें भिक्षा अर्थात् भोजन ग्रहण करते थे, किन्तु कहीं भी किसी दूसरे संन्यासीके साथ निमन्त्रण स्वीकार नहीं करते थे॥४५-४६॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीचन्द्रशेखरका 'शौक्र-वैद्य' के रूपमें उल्लेख किया गया है। उस समय शौक्र-वैद्यगण और शौक्र-ब्राह्मणोंके अतिरिक्त सभी वर्ण ही 'शूद्र' नामसे परिचित होते थे। बादमें पिछली शताब्दीसे व्रात्य-संस्कारका आश्रयकर कायस्थोंने क्षत्रियोंके और वैश्योंने वैश्योंके संस्कारोंको ग्रहण किया और कर रहे हैं। श्रीगौड़ीय वैष्णवाचार्य-वंशसमूहमें वैष्णव-विश्वासके अनुगमनसे ठाकुर रघुनन्दनके वंशमें ठाकुर कृष्णदास और नवनी होड़के वंशमें एवं श्यामानन्दप्रभुके शिष्य श्रीरसिकानन्ददेवके वंशमें ब्राह्मणोंका आदर्श उपनयन-संस्कार आजसे तीन-चार सौ वर्ष पहलेसे चलता आ रहा है, ये लोग अभी भी ब्राह्मणादि सभी वर्णोंकी दीक्षा तथा गुरुका कार्य और शालग्रामादिका अर्चन करते आ रहे हैं॥४५॥ अमृताणुकणिका-महाप्रभु मायावादी ब्राह्मण-संन्यासियोंका निमन्त्रण स्वीकार नहीं करते थे। संन्यासी लोग ब्राह्मण, त्यागी, तपस्वी और शुद्धाचार थे, तथापि महाप्रभु उनके साथ भोजन नहीं करते थे। तब महाप्रभु जो चन्द्रशेखरके घर अन्न ग्रहण ना करके तपनमिश्रके घर भिक्षा निर्वाह करते थे, वह तपनमिश्र और चन्द्रशेखरके प्रति जाति बुद्धि रखकर नहीं था। मायावादी संन्यासियोंका उद्धार ही महाप्रभुका काशीमें आनेका मुख्य उद्देश्य था, इसलिये उन्होंने मायावादी संन्यासीके वेशग्रहणका अभिनय किया था। वस्तुतः उन्होंने मायावाद और कर्मजड़स्मार्त्त-धर्मका (सुबुद्धि राय सम्बन्धी दृष्टान्तमें) सभी प्रकारसे खण्डन किया था। उनका मायावादी संन्यासीका वेश धारण करना छद्मवेशी गुप्तचरके समान है। गुप्तचर जैसे चोर और अपराधीके वेशमें उनके दलमें मिलकर उनका उद्धार करते हैं अथवा जैसे कभी चिकित्सकका वेश धारणकर उनके जैसे बाह्य क्रियामुद्रा प्रदर्शित करते हैं, परन्तु वह आत्यन्तिक सत्य नहीं, केवल अभिनय मात्र है। उसी प्रकार महाप्रभुने भी व्यवहारिक विचार पालनका अभिनय प्रदर्शित किया॥४५-४६॥ श्रीसनातनको शिक्षा :- सनातन गोसाञि आसि' ताँहाइ मिलिला। ताँर शिक्षा लागि' प्रभु दु-मास रहिला ॥ ४७ ॥ ताँरे शिखाइल सब वैष्णवेर धर्म। श्रीभागवत-आदि शास्त्रेर यत गूढ़ मर्म ॥ ४८ ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी काशीमें श्रीमन्महाप्रभुसे मिले और महाप्रभु उनको शिक्षा देनेके ३९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत