श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/४७-५६ ] लिये वहाँ दो मास तक रहे। श्रीमन्महाप्रभुने उनको वैष्णवधर्म और श्रीमद्भागवतादि शास्त्रोंके सभी गूढ़ अर्थोंकी शिक्षा दी॥४७-४८॥ चन्द्रशेखर और तपन मिश्रके द्वारा निवेदन :- इथमध्ये चन्द्रशेखर, मिश्र-तपन। दुःखी हञा प्रभु-पाय कैल निवेदन॥४९॥ “कतेक शुनिब प्रभु, तोमार निन्दन। ना पारि सहिते, एबे छाड़िब जीवन॥५०॥ तोमाके निन्दये यत संन्यासीर गण। शुनिते ना पारि, फाटे हृदय-श्रवण॥”५१॥ अनुवाद—उन दो मासके बीचमें श्रीचन्द्रशेखर और तपन मिश्रने अत्यन्त दुःखी होकर महाप्रभुके चरणोंमें ऐसे निवेदन किया—"हे महाप्रभु! हम आपकी और कितनी निन्दा सुनेंगे, यह हमसे सहन नहीं हो रही है और अब हम अपने प्राण छोड़ देंगे। मायावादी संन्यासी आपकी जो निन्दा करते हैं, हम उसे अधिक सुन नहीं पायेंगे। उसे सुनकर हमारे हृदय और कान फट रहे हैं॥” ४९-५१॥ इहा शुनि रहे प्रभु ईषत् हासिया। सेइकाले एक विप्र मिलिल आसिया॥५२॥ ब्राह्मणकी प्रार्थना :- आसि' निवेदन करे चरणे धरिया। “एक वस्तु मागों, देह प्रसन्न हइया॥५३॥ सकल संन्यासी मुञि कैनु निमन्त्रण। तुमि यदि आइस, पूर्ण हय मोर मन॥५४॥ ना याह संन्यासि-गोष्ठी, इहा आमि जानि। मोरे अनुग्रह कर निमन्त्रण मानि'॥” ५५॥ अनुवाद—उनकी विनती सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द मुसकाये। उसी समय एक ब्राह्मण वहाँपर आया। उस ब्राह्मणने महाप्रभुके चरण पकड़कर कहा—"हे प्रभु! मैं आपसे एक वस्तु माँगना चाहता हूँ, आप कृपा करके वह मुझे प्रसन्न होकर प्रदान करें। मैंने सभी संन्यासियोंको निमन्त्रण दिया है, किन्तु यदि आप भी आयेंगे, तभी मेरे मनकी अभिलाषा पूर्ण होगी। मैं जानता हूँ कि आप संन्यासियोंकी गोष्ठीमें नहीं जाते हैं, किन्तु मेरे प्रति अनुग्रहकर आप मेरे निमन्त्रणको स्वीकार कीजिये ॥” ५२-५५॥ महाप्रभुका निमन्त्रण-ग्रहण :- प्रभु हासि' निमन्त्रण कैल अङ्गीकार। संन्यासीरे कृपा लागि' ए भङ्गी ताँहार॥५६॥ अनुवाद—महाप्रभुने हँसकर उस ब्राह्मणके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया। मायावादी संन्यासियोंपर कृपा करनेके लिये महाप्रभुकी यह एक लीला है॥५६॥ सातवाँ अध्याय | ३९५