भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

[ ७/५७-६१ से विप्र जानेन, प्रभु ना या'न का'र घरे। ताँहार प्रेरणाय ताँरे अत्याग्रह करे॥ ५७॥ अनुवाद—ऐसे किसीके घर जहाँ मायावादी संन्यासियोंको निमन्त्रण दिया हो, महाप्रभु वहाँ नहीं जाते हैं—यह बात वह ब्राह्मण भली-भाँति जानता था, किन्तु स्वयं महाप्रभुकी प्रेरणासे ही उसने उनको अति आग्रहके साथ निमन्त्रण दिया॥ ५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तथापि महाप्रभुने संन्यासियोंपर कृपा करनेके लिये ही उस ब्राह्मणके हृदयमें प्रेरणा दी, जिसके कारण उसने अत्यन्त आग्रहके साथ उस प्रकार प्रार्थना की॥ ५७॥ संन्यासी मण्डलीके बीच महाप्रभुका गमन :— आर दिने गेला प्रभु से विप्र-भवने। देखिलेन, बसियाछेन संन्यासीर-गणे॥ ५८॥ महाप्रभुकी दीनता :— सबा नमस्करि' गेला पाद-प्रक्षालने। पाद-प्रक्षालिया बसिला सेइ स्थाने॥ ५९॥ अनुवाद—दूसरे दिन महाप्रभु उस ब्राह्मणके घर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सभी संन्यासी पहलेसे ही उपस्थित हैं। महाप्रभु उन सभीको प्रणामकर अपने चरण धोनेके लिये गये और चरण धोकर उसी स्थानपर बैठ गये॥ ५८-५९॥ महाप्रभुका ऐश्वर्य-प्रकाश और पाषण्ड-मोहन :— बसिया करिला किछु ऐश्वर्य प्रकाश। महातेजोमय वपु कोटिसूर्याभास॥ ६०॥ प्रभावे आकर्षिल सब संन्यासीर मन। उठिला संन्यासी सब छाड़िया आसन॥ ६१॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस स्थानपर बैठकर अपने ऐश्वर्यका कुछ प्रकाश किया। उनके शरीरसे इतना तेज निकला जो करोड़ों सूर्योंकी भाँति था। उनके प्रभावको देखकर वहाँ उपस्थित सभी मायावादी संन्यासियोंका मन उनके प्रति आकर्षित हो गया और वे सभी अपना-अपना आसन छोड़कर खड़े हो गये॥ ६०-६१॥ अमृतानुकणिका—विद्याके गर्वसे, साधनके गर्वसे, मान-सम्मानके गर्वसे संन्यासियोंका चित्त कुछ अधिक गर्वित था, इसलिये वे महाप्रभुकी निन्दा करते थे। कुछ ऐश्वर्य प्रकाश करनेके अतिरिक्त केवल दैन्य-विनयसे ऐसा लगता है कि किसीके गर्वका नाश नहीं होता है। किसीके गर्वको नाश करनेके लिये उसके चित्तमें उसके अपने सम्बन्धमें कुछ हेयताका अनुभव जगाना आवश्यक है। इसलिये ही महाप्रभुने अपना ऐश्वर्य प्रकाश किया। उनके ऐश्वर्यको देखकर संन्यासी स्तम्भित हो गये। पहले जो मनमें सोचते थे—'यह एक मूर्ख भावुक संन्यासी मात्र है, शास्त्र, धर्म, आचार, वेदान्तादि जानता नहीं है; यह तो नितान्त साधारण व्यक्ति है।' किन्तु उनका ऐश्वर्य देखकर अब वे सोचने लगे—'ये तो साधारण व्यक्ति नहीं है। अहो! कैसा तेज है, हमारे नेत्र चौंधिया रहे हैं। इनकी निन्दा करके हमने कितना अन्याय किया है? ऐसी शक्ति ३९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत