भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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७/६०-६६ ] तो हमारे पास नहीं है।' तभी उनका हृदय परिवर्त्तन हो गया। यदि महाप्रभु पहलेके समान दैन्य-विनय मात्र दिखलाते, तो वे संन्यासी यही सोचते-'यह मूर्ख संन्यासी हमारी सभामें आनेका साहस ही नहीं कर पाता है। वास्तवमें हमारी सभामें आनेकी योग्यता भी इसमें नहीं है।' गर्वित लोग विनयसे मुग्ध नहीं होते। महाप्रभु जब दैन्यवशतः चरण धोनेके स्थानपर बैठे, तब उनकी महिमा संन्यासियोंके हृदयको स्पर्श नहीं कर पा रही थी, तब वे अपनी सभामें उनको आमन्त्रित नहीं कर रहे थे। किन्तु जब उनका ऐश्वर्य देखा, तब श्रद्धासे सभी एक साथ आसन छोड़कर उठ खड़े हुए॥६०-६१॥ प्रकाशानन्द-सरस्वतीकी उक्ति :- प्रकाशानन्द-नामे संन्यासी-प्रधान। प्रभुके कहिल किछु करिया सम्मान॥६२॥ “इहाँ आइस, गोसाई, शुनह श्रीपाद। अपवित्र स्थाने बैस, किवा अवसाद॥”६३॥ अनुवाद-उन मायावादी संन्यासियोंमें प्रधान प्रकाशानन्द सरस्वती महाप्रभुको सम्मानपूर्वक कुछ कहने लगे-“हे गोसाईं! आप यहाँ आइये। सुनिये श्रीपाद! आप ऐसे अपवित्र स्थानमें क्यों बैठे हैं? क्या हमसे कोई अप्रसन्नता है?”॥६२-६३॥ महाप्रभुकी दैन्योक्ति :- प्रभु कहे,-“आमि हइ हीन-सम्प्रदाय। तोमा-सबार सम्प्रदाये बसिते ना युयाय॥”६४॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा-“मैं हीन-सम्प्रदायका हूँ, इसलिये मैं आपके सम्प्रदायमें बैठनेके योग्य नहीं हूँ॥”६४॥ अनुभाष्य-श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित दशनामी दण्डि (एकदण्डी) संन्यासियोंमें से 'तीर्थ', 'आश्रम' और 'सरस्वती', ये तीन सम्प्रदाय सदाचार और सम्मानमें भी दूसरे साम्प्रदायिक संन्यासियोंसे श्रेष्ठ हैं। महाप्रभुने 'भारती'-सम्प्रदायसे संन्यास ग्रहण करनेके कारण प्रकाशानन्द सरस्वतीको उच्चसम्प्रदायमें स्थित मानकर विचार किया; अथवा ब्रह्मसंन्यासियोंकी सामाजिक-मर्यादामें वे अपने आपको उच्च मानते हैं। इसलिये महाप्रभुने वैष्णव संन्यासियोंको अमानित्व (अपने लिये सम्मानकी आशा नहीं) और मानदत्व (सभीको सम्मान देना), इस धर्मको सिखलानेके लिये उन्होंने स्वयंको हीन-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त कहा। शाङ्कर-साम्प्रदायिक संन्यासीगण अभी भी अन्य संन्यासियोंको 'संन्यासी' कहना नहीं चाहते, उन्हें केवल 'ब्रह्मचारी' संज्ञा देकर स्वयंमें 'गुरु' अभिमान रखते हैं॥६४॥ प्रकाशानन्दकी जिज्ञासा :- आपने प्रकाशानन्द हातेते धरिया। बसाइला सभामध्ये सम्मान करिया॥६५॥ पूँछिल,-“तोमार नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य'। केशव-भारतीर शिष्य, ताते तुम धन्य॥६६॥ सातवाँ अध्याय | ३९७

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