श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/६५-७० साम्प्रदायिक संन्यासी तुमि, रह एइ ग्रामे। कि कारणे आमा-सबार ना कर दर्शने॥ ६७॥ संन्यासी हइया कर नर्त्तन-गायन। भावुक सब सङ्गे लञा करह कीर्त्तन॥ ६८॥ वेदान्त-पठन, ध्यान, — संन्यासीर धर्म। ताहा छाड़ि' कर केने भावुकेर कर्म॥ ६९॥ प्रभावे देखिये तोमा साक्षात् नारायण। हीनाचार कर केने, इथे कि कारण॥” ७०॥ अनुवाद-यह सुनकर स्वयं प्रकाशानन्द महाप्रभुका हाथ पकड़कर सम्मानपूर्वक उन्हें सभाके बीच लाये और सम्मानपूर्वक उन्हें वहाँ बैठाया और उन्होंने पूछा- “तुम्हारा नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' है और केशव-भारतीके शिष्य हो, तुम धन्य हो। तुम हमारे शाङ्कर-सम्प्रदायके संन्यासी हो और इस वाराणसीमें रह रहे हो। किस कारणसे हमसे मिलते भी नहीं हो? तुम संन्यासी होकर नाचते-गाते हो और भावुकोंको साथमें लेकर सङ्कीर्तन करते हो। संन्यासीका धर्म वेदान्त-पठन और ध्यान है। इसे छोड़कर तुम यह भावुकका कार्य क्यों करते हो? तुम्हारा प्रभाव देखकर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तुम साक्षात् नारायण हो, किन्तु तुम ऐसा अनुचित हीन-आचरण क्यों कर रहे हो? इसका क्या कारण है?॥” ६५-७०॥ अनुभाष्य-केशव-भारतीके विषयमें जाननेके लिये वैष्णवमञ्जुषा-समाहृति (दूसरी संख्या) द्रष्टव्य है। आदिलीला ७/४१ संख्याका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ ६६-६९॥ अमृतानुक्रमणिका - महाप्रभुने श्रीशङ्करसम्प्रदायके श्रीकेशव भारतीसे संन्यास तो ग्रहण किया, परन्तु श्रीशङ्कराचार्यके मतको ग्रहण नहीं किया। महाप्रभु संन्यासके बाद प्रेममें आविष्ट होकर वृन्दावनकी ओर जाने लगे, परन्तु आवेशमें भागवतीय त्रिदण्डी भिक्षुकका गीत गाते-गाते राढ़देशमें भ्रमण करते रहे- “एतां समास्थाय परात्मनिष्ठामुपासितां पूर्वतमैर्महद्भिः। अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥” “प्राचीनकालमें महत् लोगों द्वारा उपासित इस परात्म-निष्ठारूप भिक्षुक-आश्रमका आश्रय करके मैं श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा इस दुस्तर संसाररूप तमः (अज्ञान) से तर जाऊँगा।” महाप्रभुके इस उपरोक्त वाक्यसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उन्होंने भागवतीय वैष्णव त्रिदण्डी भिक्षुकका वेश ग्रहण किया था। शङ्कराचार्यके मतमें संन्यास-जिसमें सेव्य-सेवकका भाव तिरोहित होता है, अपनेको ब्रह्म कल्पना करते हैं, उस प्रकारका संन्यास महाप्रभुका उद्देश्य नहीं था। यदि उनका वैसा उद्देश्य होता, तो उन्होंने काशी जाकर मायावादी-संन्यासियोंसे सम्भाषण क्यों नहीं किया? उनका मुखतक दर्शन क्यों नहीं किया? श्रीशङ्कराचार्य-मतवादीय संन्यासियोंके कृत्य मायावाद-भाष्य पठन-पाठन, ध्यान-धारणा आदिका त्यागकर 'भावुकके कर्म', 'नृत्य-गीत' आदि कृत्य क्यों आरम्भ किये? और वे मायावादी संन्यासियोंकी भाँति परस्पर सम्भाषणमें 'नमो नारायणाय' ना कहकर क्यों 'कृष्णे मतिरस्तु'-वैष्णव-संन्यासके जैसे ३९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत