भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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वाक्य बोलते थे? अधिक क्या, 'नमो नारायणाय' आदि वाक्योंको पाषण्डता और प्रच्छन्न नास्तिकता कहकर क्यों प्रतिपादन करते? और यदि महाप्रभु शङ्कराचार्य-मतावलम्बी संन्यासी ही होते, तब वे क्यों उनके मतवादको 'बौद्धसे अधिक वेदाश्रया नास्तिक्यवाद' आदि क्यों कहते? कौन शङ्कर-सम्प्रदायके गुरु कहलानेवाले यह उपदेश देंगे कि हरिनामक्रे अतिरिक्त अन्य कोई साधन और साध्य नहीं है, ब्रह्मानन्द प्रेमानन्द-सिन्धुके सामने एक गोखुरके समान है। मायावादी संन्यासी लोग अपनेको 'ब्रह्म' कल्पना करते हैं!—'नमो नारायणाय' कहकर नमस्कार-प्रतिनमस्कार करते हैं। किन्तु महाप्रभुका आचरण और शिक्षा क्या थी? यहाँतक कि आचार्य-संन्यासी-लीला करनेवाले वास्तवमें स्वयं-भगवान् महाप्रभुको किसीके द्वारा 'नारायण' आदि सम्बोधन करनेपर उसे यह जतला देते कि वे किसी भी प्रकारसे शङ्कराचार्य-मतवादी संन्यासी नहीं हैं,- “लोके कहे, - 'संन्यासी तुमि जङ्गम-नारायण' ॥ प्रभु कहे, - 'विष्णु' 'विष्णु', इहा ना कहिबा। जीवाधमे 'कृष्ण'ज्ञान कभु ना करिया! संन्यासी-चित्कण जीव, किरण-कण-सम। षडैश्वर्यपूर्ण कृष्ण हय सूर्योपम ॥ जीव, ईश्वर-तत्त्व-कभु नहे 'सम'। ज्वलदग्निराशि यैछे स्फुलिङ्गेर कण ॥” अर्थात् “लोग महाप्रभुको कहते—'हे संन्यासी ! आप चल-नारायण हो।' तब महाप्रभु कहते—“'विष्णु' 'विष्णु' ! ऐसा मत कहिये। मुझ जैसे अधम जीवमें श्रीकृष्णज्ञान कभी मत कीजिये। मैं, संन्यासी एक चित्कण जीव हूँ, किरणके कणके समान और कहाँ षडैश्वर्यपूर्ण श्रीकृष्ण सूर्यके समान। जीव ईश्वर तत्त्वके समान कभी नहीं हो सकता, वह प्रज्वलित अग्निकी चिङ्गारीके समान है।” श्रीचैतन्यचरितामृतम् महाकाव्य ६५-श्लोकमें महाप्रभुकी संन्यास-ग्रहण लीलाका वेश इस प्रकार दृष्ट होता है- “ततोऽन्येद्युः श्रीमान् धृतकरकदण्डः सदरुणं बहन् वासोद्वन्द्वं बहलतड़िदचिं प्रतिकृतिः। अकस्मादेकस्मिन् पथि गुरुशिखो गैरिकमयो। व्यदर्शि स्वर्णाद्रिप्रवर इव तैर्गौरशशभृत्॥” अर्थात् “तब एक दिन सौदामिनी मालाकी कान्तिके समान मूर्तिवाले, हाथमें शोभायुक्त दण्ड-कमण्डलु और प्रशस्त दो अरुण वस्त्रोंको धारण किये हुए श्रीमान् गौरचन्द्रको उन लोगोंने अकस्मात् मार्गमें सुदीर्घ शिखायुक्त गैरिकमय स्वर्ण पर्वतके समान देखा।” 'गुरुशिखः' शब्दके द्वारा संन्यासके बाद भी महाप्रभुकी सुदीर्घ शिखाका परिचय मिलता है। त्रिदण्डी संन्यासी या वैष्णव-संन्यासीकी ही शिखा होती है। महाप्रभुने शङ्कर सम्प्रदायसे दशनामी संन्यासके नामोंमें अन्यतम 'भारती' नाम ग्रहण करनेपर भी उन्होंने 'श्रीकृष्णचैतन्य', इस ब्रह्मचारी नामका ही प्रचार किया। श्रीचैतन्यभागवत (मध्य, २८वें अध्याय) में श्रीकेशव भारतीके द्वारा 'श्रीकृष्णचैतन्य' नाम निर्देश करनेका कारण बतलाया है- सातवाँ अध्याय | ३९९