श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/६५-७१ “तबे नाम थुइबारे केशव भारती। मने मने चिन्तिते लागिल महामति॥१६९॥ चतुर्दश भुवनेते एमत वैष्णव। आमार नयने नाहि हय अनुभव॥१७०॥ अतएव कोथाओ ना थाके येइ नाम। हेन नाम थुइले मोर पूर्ण हय काम॥१७१॥ मूले भारतीर शिष्य “भारती” ये हय। इँहार-से नाम थुइबारे योग्य नय॥१७२॥ यत जगतेर तुमि कृष्ण बोलाइया। कराइला चैतन्य, कीर्त्तन प्रकाशिया॥१७५॥ एतेक तोमार नाम “श्रीकृष्णचैतन्य।” सर्वलोक तोमा हैते हैला धन्य॥१७६॥” अर्थात् ‘अब महामति श्रीकेशव भारती मन-ही-मन महाप्रभुके संन्यासके योग्य नामका चिन्तन करने लगे। चौदह भुवनोंमें मैंने ऐसा वैष्णव नहीं देखा है। अतः उनका नाम ऐसा होना चाहिये जो किसीने सुना ना हो। इससे मेरी मनोवाञ्छा पूर्ण हो जायेगी। विधिके अनुसार भारतीका शिष्य ‘भारती’ होना चाहिये, किन्तु यह नाम इनके योग्य नहीं है। तब श्रीकेशव भारती महाप्रभुके वक्षपर हाथ रखकर कहने लगे-‘कीर्तन प्रकाशित करके तुमने जगत्से कृष्ण बुलवाकर सभीको चैतन्यता प्रदान की है, इसलिये तुम्हारा नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ रखा जा रहा है। सभी लोग तुम्हारे इस नामके कारण धन्य हो जायेंगे।” महाप्रभुने कभी भी शङ्कर-सम्प्रदायको स्वीकार नहीं किया। इसलिये हम यदि वास्तवमें निरपेक्ष होकर विचार करें, तो उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वताफल, अर्थवाद और उपपत्ति-इन छह लिङ्गोंके द्वारा महाप्रभुकी संन्यासलीलाके तात्पर्यका अनुसन्धानकर यह जानेंगे कि महाप्रभु कभी भी मायावादी सम्प्रदायके अन्तर्गत नहीं थे॥६६॥ प्रकाशानन्द निर्विशेष ब्रह्मवादी हैं, वे नारायणादि सविशेष स्वरूप स्वीकार ही नहीं करते। अभी किन्तु महाप्रभुने अन्तर्यामी रूपमें प्रकाशानन्दके हृदयमें बैठकर उनकी भ्रान्ति दूर की। सविशेष स्वरूप नारायणके अस्तित्वकी अनुभूति उनके हृदयमें उत्पन्न की और वही साक्षात् नारायण ही संन्यासीरूपमें उनके सम्मुख उपस्थित हैं-इसका भी अनुभव कराया। किन्तु इस प्रकार अनुभूति कराकर साथ-ही-साथ अपने प्रभावसे उसको प्रच्छन्न करके दूर कर दिया। इसलिये प्रकाशानन्दने तब जिज्ञासा की-‘तुम ऐसा हीन आचरण क्यों कर रहे हो?’ महाप्रभुने अगर उस अनुभूतिको ढका नहीं होता, तो हीन आचरणके सम्बन्धमें यह प्रश्न प्रकाशानन्दके हृदयमें उठता ही नहीं। सम्भवतः श्रीनाम महात्म्यके प्रकाशके सुयोगके लिये ही महाप्रभुने प्रकाशानन्दके साथ इस प्रकार कौतुक किया॥६५-७०॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनाम-माहात्म्य-वर्णन :- प्रभु कहे,-“शुन, श्रीपाद, इहार कारण। गुरु मोरे मूर्ख देखि’ करिल शासन॥७१॥ ४०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत