भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

७/७१ ] अनुवाद—प्रकाशानन्दके वचन सुनकर महाप्रभु कहने लगे—“श्रीपाद, इसका कारण सुनो। मेरे गुरुदेवने मुझे मूर्ख जानकर मुझे डाँटकर कहा॥७१॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यदेव वेदान्तके एकमात्र प्रतिपाद्य वास्तव-वस्तु विग्रह (स्वयं-भगवान्) हैं। उन्होंने वेदान्तपाठके अधिकार-निर्णयमें यह प्रचार किया है कि स्वयंको तृणसे नीच माननेवाले, वृक्षकी भाँति सहनशीलता गुणसम्पन्न, स्वयं अमानी और अन्योंको मानप्रदान करनेवाले व्यक्ति ही श्रौतपथके अधिकारी हैं। श्रीगुरुदेवके श्रीमुखसे निकले वाक्योंको श्रवणकर शिष्य जब उनका कीर्तन करता है, तब उस कीर्तनरूपी अभिधेय अथवा साधनसे ही प्रयोजनरूप फल उदित होता है। श्रौतवाक्योंके जिस अंशमें भजनीय वास्तव-वस्तुके विज्ञानका वर्णन हुआ है, वही श्रौतशास्त्रोंका सर्वव्यापक मूलस्थानीय मूल अंशी है। उसी अंशीके भीतर सभी अंशोंकी प्रतीति और अप्रतीति अवस्थित है। भगवान्‌के अनुशीलनकारी भक्त अपने भजनके अवलम्बनसे भजनीय-वस्तु भगवान्‌के साथ सम्बन्धयुक्त होते हैं। जहाँ भजनवृत्तिकी शिथिलता होती है, वहाँ अंशीके अनुशीलनके बदले वस्तुका आंशिक अनुशीलन होता है। भजनवृत्तिकी शिथिलताके कारण भगवान्‌के साथ भक्तमें जो विच्छिन्न (पृथक् होनेका) भाव होता है, वही आत्मस्वरूप-विस्मृति अथवा हरिसेवाकी विमुखता है। श्रीचैतन्यदेवने भक्तके निरपेक्ष, निर्मल आचरणका उपदेश करते हुए वेदान्तकी चरम परिणतिके विषयमें जिस सर्वोत्तम आदर्शका प्रदर्शन किया, उसीके ही प्रकृष्ट उदाहरणके रूपमें (शिष्यका अभिनय करनेवाले) चौदह भुवनोंके पतिकी इस पयारमें अभिमान-शून्य उक्ति है। पाण्डित्य प्रतिभामें मत्त व्यक्ति गुरुपादपद्मकी सेवामें अनधिकारी हैं अर्थात् ब्रह्मसूत्रके पठनमें अनधिकारी हैं। देहाभिमानी अभक्त लोग भगवान्‌के अनुशीलनकी चेष्टा करते हुए गुरुकी सेवा त्याग कर देते हैं (इसलिये उन्हें अभक्त ही कहा गया है)। वहाँपर सेवककी स्व-स्वरूप निरूपणमें भ्रान्तिको दूर करनेके लिये गुरुरूपी भगवान् शिष्यके निर्मल स्वरूपका वर्णन करते समय उसकी मूर्खताको अभिव्यक्त करते हैं। श्रीगुरुदेव जिस प्रकार सरल भाषामें शिष्यके मङ्गलके लिये शिष्यकी अनधिकारिताके विषयमें कहते हैं, उसमें शिष्यको आपेक्षिक दोष स्पर्श नहीं करता। क्योंकि भगवत्-तत्त्वमें अनभिज्ञता ही शिष्यकी मूर्खता है और मूर्खका स्वाभाविक धर्म शिष्यके अन्दर नित्य वर्तमान रहता है। उस स्वरूपके साथ स्वरूप-ज्ञानके अभावके कारण हम लोग कई बार कपटतापूर्वक स्वयंमें शिष्याभिमान करके शिष्य जैसे ही व्यक्तिको मुखसे 'गुरु' कहकर छल करते हैं, इससे हमारा मङ्गल नहीं होता है। समस्त वेद जिनकी चरणसेवामें नियुक्त हैं, ऐसे वेदान्तके द्वारा जानने योग्य पुरुषमें प्राकृत ज्ञान रखनेवाला व्यक्ति वास्तवमें मूर्ख ही है। प्राकृत ज्ञानसे विमूढ़ व्यक्ति वेदशास्त्रका जो वास्तव अधिष्ठान दर्शन करते हैं, वह केवल उनकी माया मोहित बुद्धिके द्वारा चालित और अपरा विद्याके अन्तर्भुक्त है। जब तक जीवका दृश्य-जगत्का गुणमय अभिमान दूर नहीं होता, तब तक उसका जो आवृत्त, अनुपयोगी, परिवर्तनशील प्राकृत ज्ञान विराजमान है, वह मूर्खताके अन्तर्गत ही है। बृहत् और पालक विष्णुवस्तुके सेवक ही वेदान्ताधिकारी हैं। मायासे परिच्छिन्न (ढकी) वस्तु आदिकी सेवाका अतिक्रम नहीं करनेसे कोई भी ब्रह्मज्ञ नहीं हो सकता। कर्माधिकारीका ब्रह्मसूत्र और सातवाँ अध्याय | ४०१