श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/७१ ज्ञानाधिकारीका ब्रह्मसूत्रके पठन-पाठन अधिकारसे-नित्य, शुद्ध, पूर्ण, मुक्त, चैतन्यरसविग्रह अप्राकृत-चिन्तामणि स्वरूप श्रीकृष्णनाममें अधिकार नहीं होता है। इस अप्राकृत-चिन्तामणि स्वरूप श्रीकृष्णनाममें जिसका अधिकार है, उनको पुनः प्राकृत ज्ञानसे वेदान्ताधिकार प्राप्त करना नहीं होता। नामभजनमें अनधिकारी व्यक्ति नाम और नामीमें अभिन्न बुद्धिसे रहित होकर मायावादी वैदान्तिक होनेकी चेष्टा करते हैं। वे लोग ही अप्राकृत-विचारसे श्रीगुरुदेवकी भाषामें परम मूर्ख हैं। अधिरोहवादके अवलम्बनके द्वारा वेदान्तानुशीलनके फलसे मूर्खता या जाड्य आकर उपस्थित होते हैं। और वास्तविक नामके अधिकारी ही वेदान्तके उस पार नित्य अवस्थित हैं। इस प्रसङ्गमें श्रीमद्भागवतमें— “अहो वत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥” अर्थात् “हे भगवन्! जिसके मुखमें आपके नामका सदा कीर्तन होता रहता है, वह चाण्डाल कुलमें उत्पन्न होनेपर भी सर्वश्रेष्ठ है। जो आपके नामका कीर्तन करते हैं, उन्होंने ही सब प्रकारकी तपस्या की है, उन्होंने ही सब प्रकारके यज्ञ किये हैं, उन्होंने ही समस्त तीर्थोंमें स्नान किया है, इसलिये वे ही आर्योंमें गिनने योग्य हैं।” आदि श्लोक और “ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽप्यथर्वणः। अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम्॥” अर्थात् “जिसने 'हरि', इन दो अक्षरोंका उच्चारण किया है, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका अध्ययन कर लिया है।” आदि श्लोक आलोचनीय हैं। मूढ़ साहजिक सम्प्रदाय अपनेको वैष्णव मानकर वेदान्तको अहंग्रहोपासक केवलाद्वैतवादियोंकी विचरण-भूमि अर्थात् वेदान्तको केवल उनके अध्ययनका विषय मानते हैं। किन्तु 'वेदान्त' वैकुण्ठ-हरिजनोंकी ही एकमात्र विचरण भूमि है। प्राकृत सहजियागण इस सरल बातको समझ नहीं पाते कि चार सम्प्रदायोंके वैष्णवाचार्योंने ब्रह्मसूत्र-वेदान्तके भाष्य श्रीमद्भागवतके अनुगमनसे जिन सब वैदान्तिक प्रबन्धोंकी रचना की है, उन प्रबन्धोंको दुःसङ्ग मानकर परित्याग नहीं करना चाहिये। इसलिये वे लोग वास्तव शुद्धवैष्णव और वैष्णवाचार्योंको ज्ञानमिश्र और कर्ममिश्र बिद्धभक्तके रूपमें कल्पनाकर नरकगामी होते हैं तथा स्वयं मायावादी और विष्णुसेवा-रहित हो जाते हैं। प्राकृत ज्ञानके द्वारा वेदान्ताधिकारसे श्रीकृष्ण-मन्त्र जपकी सार्थकताकी उपलब्धि नहीं होती। जो लोग प्राकृत ज्ञानसे विमुग्ध हैं, वे लोग ही संसारमें सम्पूर्णरूपसे आबद्ध हैं। भोक्ता और भोग्य—ये दो तत्त्व (स्वयंको भोक्ता और संसारकी समस्त वस्तुओंको अपनी भोग्य वस्तु माननेका विचार) उन लोगोंको संसारमें बद्ध करनेमें समर्थ हैं और ये बाह्य विषयोंसे उनकी मननवृत्तिको संयत करने नहीं देते॥७१॥ अमृतानुकणिका—महाप्रभुको साधारण मनुष्य मानकर प्रकाशानन्दने जो कुछ प्रश्न किये, महाप्रभु एक-एक करके उनके उत्तर दे रहे हैं। प्रकाशानन्दकी धारणा थी—श्रीकृष्णचैतन्य मूर्ख संन्यासी है; इसलिये महाप्रभुने भी स्वयंको मूर्ख कहकर उनका उत्तर देना प्रारम्भ किया। ४०२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत